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पर्यावरण: घोषणाओं की असल परीक्षा बाकी, यूएनजीए में नेपाल पर एलान; अब तुर्किये के कॉप-31 सम्मेलन पर नजरें
नेपाल त्रासदी के संदर्भ में यूएनजीए में हुई घोषणाओं के बाद असली परीक्षा तुर्किये के अंताल्या में होने वाले अगले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कॉप-31 में होगी।
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नेपाल में बाढ़ से त्रासदी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के 81वें सत्र में जलवायु परिवर्तन के हिमालय पर गहराते असर और उससे होने वाली तबाही एक सवाल बन कर पहुंची कि जलवायु संकट का नुकसान कौन उठाएगा? नेपाल में आई विनाशकारी आपदा ने इस बहस को उन लोगों से भी जोड़ दिया है, जो जलवायु संकट में सबसे कम योगदान देने के बावजूद उसका सबसे ज्यादा असर झेल रहे हैं। यह मुद्दा अब लॉस एंड डैमेज, क्लाइमेट फाइनेंस और हिमालयी देशों के बीच सहयोग से जुड़ी बड़ी बहस बन चुका है।
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नेपाल का दावा है कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उसका योगदान 0.1 फीसदी से भी कम है। फिर भी, जलवायु परिवर्तन से होने वाली बड़ी आपदाएं उसके वर्षों के विकास पर पानी फेर रही हैं। आकलन के अनुसार, आपदा के बाद पुनर्निर्माण की लागत नेपाल की जीडीपी का करीब 10 प्रतिशत होगी। इसके लिए नेपाल को पांच अरब डॉलर से अधिक की जरूरत है। नेपाल यूएनएफसीसीसी के लॉस एंड डैमेज फंड से दो करोड़ डॉलर मिलने की उम्मीद कर रहा है। हालांकि, इसमें अभी करीब 30 करोड़ डॉलर ही हैं, जबकि विभिन्न देशों ने 82 करोड़ डॉलर देने का वादा किया है। ऐसे में, क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। पृष्ठभूमि में कई सवाल भी उभर रहे हैं, मसलन, क्या अमीर देश अपने कर्ज के जाल में फंसे गरीब देशों को राहत देंगे? क्या जलवायु परियोजनाओं में निवेश जारी रहेगा या राजनीतिक दबाव के आगे रुक जाएगा? और, हर साल 13 खरब डॉलर की जलवायु वित्त व्यवस्था, जिस पर दुनिया ने उम्मीदें लगाई हैं, क्या वास्तव में हकीकत बन पाएगी?
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भारत के लिए इस पूरी कहानी का एक सीधा पहलू है। हिमालय में जोखिमों का भूगोल राजनीतिक सीमाओं से अलग है। किसी ग्लेशियर के पिघलने, झील के फटने, भूस्खलन या बाढ़ का असर कई पहाड़ी देशों को झेलना पड़ता है। ऐसे में, जलवायु लक्ष्यों को इन देशों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से जोड़कर देखना होगा। जब किसी देश का विकास बार-बार जलवायु आपदाओं से प्रभावित होता है, तो अनुकूलन की लागत केवल बाढ़ रोधी ढांचे, समयपूर्व चेतावनी प्रणालियों और आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं रहती। वह विकास को बार-बार शुरू करने की लागत बन जाती है। जलवायु न्याय (क्लाइमेट जस्टिस) को तीन सवालों से जोड़कर देखना होगा-नुकसान कौन उठाता है, फैसले की मेज पर किसकी आवाज होती है और भावी पीढ़ियों के हितों को कितना महत्व दिया जाता है।
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अगर तापमान बढ़ने के साथ पहाड़ों में जोखिम की प्रकृति बदल रही है, तो इसके लिए, वैज्ञानिक निगरानी, सीमा-पार समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियों, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे और ऐसी जलवायु वित्त व्यवस्था की जरूरत होगी, जो प्रभावित देशों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हो। और, जो संकट के बाद वर्षों तक इंतजार न करवाए। अब यह देखना बाकी है कि यूएनजीए में उठी आवाज कितनी दूर तक जाती है। यूएनजीए में हुई घोषणाओं के बाद असली परीक्षा नौ से 20 नवंबर, 2026 तक तुर्किये के अंताल्या में होने वाले अगले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कॉप-31 में होगी।