राजमोहन गांधी के पटेल: नेहरू के साथ राजनीतिक मतभेदों से आगे बढ़ना होगा, दोनों के संबंध-साझा संकल्प देखना जरूरी
सरदार वल्लभभाई पटेल को समझने के लिए नेहरू के साथ उनके राजनीतिक मतभेदों से आगे बढ़कर संबंधों और साझा संकल्पों को देखना जरूरी है। राजमोहन गांधी की पुस्तक ‘पटेल : ए लाइफ’ इसी ऐतिहासिक रिश्ते को सामने लाती है।
विस्तार
वर्ष 1991 में राजमोहन गांधी की पुस्तक 'पटेल : ए लाइफ’ आई थी। अप्रैल 1990 में लिखी गई इस पुस्तक की प्रस्तावना में राजमोहन गांधी लिखते हैं, “स्वतंत्र भारत की स्थापना में महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल का महत्वपूर्ण योगदान रहा। लेकिन इन तीनों के योगदान को स्वीकार करने के मामले में नेहरू की तारीफ खुले दिल से की गई, गांधी के प्रति औपचारिक कर्तव्य निभाया गया, जबकि पटेल के योगदान को बहुत कम महत्व दिया गया।” यह प्रस्तावना उस समय लिखी गई थी, जब नेहरू की जन्मशती पूरे धूमधाम और भव्यता के साथ मनाई गई थी। उस समय केंद्र में नेहरू के पोते राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार थी। राजीव गांधी से पहले उनकी मां इंदिरा गांधी लगभग डेढ़ दशक तक प्रधानमंत्री रहीं। उनके कार्यकाल में भी नेहरू की मृत्यु के बाद उनकी छवि को चमकाने और उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए काफी कोशिश की गई थी। राजमोहन गांधी की पुस्तक सरदार वल्लभभाई पटेल इसी राजनीतिक और सामाजिक माहौल में पहली बार प्रकाशित हुई थी।
35 साल बाद इस पुस्तक का नया संस्करण उस समय में आया है, जब देश का राजनीतिक वातावरण पूरी तरह बदल चुका है। राजमोहन गांधी ने इस पुस्तक को तैयार करने के लिए वल्लभभाई पटेल के पत्राचार, उनकी बेटी मणिबेन की डायरियों, उनके समकालीनों और सहयोगियों के निजी दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों, संस्मरणों, पुराने समाचार पत्रों और पटेल को जानने वाले या उनके साथ काम करने वाले लोगों से खुद लिए गए साक्षात्कारों का सहारा लिया है।
इन स्रोतों के आधार पर लेखक ने पटेल के व्यक्तित्व का एक व्यापक और संतुलित चित्र प्रस्तुत किया है। इसमें उनके शुरुआती जीवन, देर से पूरी हुई शिक्षा, पारिवारिक जीवन, सफल वकालत, स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी और जेल में बिताए लंबे समय के बारे में बताया है। साथ ही, स्वतंत्र भारत के गृह मंत्री के रूप में रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराने में उनकी भूमिका का भी जिक्र किया गया है।
पटेल का पालन-पोषण एक किसान परिवार में हुआ था। उनके शुरुआती जीवन की परिस्थितियां जवाहरलाल नेहरू, मोहनदास गांधी और सुभाषचंद्र बोस की तुलना में कहीं कम सुविधा संपन्न थीं। राजमोहन गांधी लिखते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी प्रतिष्ठा हासिल करने के बाद भी वल्लभभाई को अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर हमेशा गर्व रहा। पुस्तक में पटेल के निजी संबंधों के बारे में भी बताया गया है। लेखक ने उनके बड़े भाई विट्ठलभाई, उनकी बेटी मणिबेन और गुजराती देशभक्त महादेव देसाई के साथ उनके संबंधों का हवाला दिया है। हालांकि, पटेल के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू का था। जब महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल पहली बार मिले, तब दोनों की उम्र चालीस वर्ष से अधिक थी। गांधी ने शुरुआती मुलाकातों को याद करते हुए लिखा था, “जैसे-जैसे मैं उन्हें बेहतर ढंग से जानने लगा, मुझे उतना ही अधिक अहसास हुआ कि मुझे उनका सहयोग जरूर लेना चाहिए।” खुद पटेल ने गांधी के साथ जुड़ने के अपने निर्णय को याद करते हुए कहा था, “जब मैं गांधी के साथ आया, तो मैंने कुछ लकड़ियां इकट्ठी कीं, आग जलाई और परिवार, कॅरिअर और अपनी प्रतिष्ठा व बाकी सभी बातों को उस आग में झोंक दिया।”
राजमोहन गांधी लिखते हैं, “वल्लभभाई के लिए गांधी एक ही व्यक्तित्व में समाए तीन अलग-अलग रूप थे-एक संत, एक योद्धा और एक ऐसे मार्गदर्शक, जिन पर वे भरोसा कर सकते थे और जिनके बताए रास्ते पर चल सकते थे।” खुद नेहरू ने पटेल के साथ अपने संबंधों के बारे में लिखा था, “हमारे बीच राजनीतिक मतभेदों की तुलना में सहमति के बिंदु कहीं अधिक थे।” गांधी की हत्या के बाद, इन दोनों नेताओं ने अपने मतभेदों को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया। गांधी की हत्या के तीन दिन बाद नेहरू ने पटेल को पत्र लिखकर कहा था, “बापू के निधन के साथ सब कुछ बदल गया है और अब हमें एक बिल्कुल अलग व अधिक कठिन दुनिया का सामना करना है। पुराने विवाद अब उतने महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं। मुझे लगता है कि समय की मांग है कि हम सभी आपसी सहयोग के साथ काम करें।”
नेहरू ने आगे लिखा, “हमें एक-दूसरे का सहयोग करते और अनेक तूफानों व संकटों का मिलकर सामना करते हुए एक चौथाई सदी से भी अधिक समय बीत चुका है। मैं पूरी ईमानदारी से कह सकता हूं कि इस दौरान आपके प्रति मेरा स्नेह और सम्मान बढ़ा ही है। मुझे नहीं लगता कि कोई भी घटना इसे कम कर सकती है।” जवाब में पटेल ने नेहरू की भावनाओं के प्रति अपनी सहमति जताते हुए लिखा, “आपने जिस आत्मीयता और संवेदनशीलता के साथ अपनी भावनाएं व्यक्त की हैं, मैं उनसे पूरी तरह और हृदय से सहमत हूं... हाल की घटनाओं ने मुझे बहुत दुखी कर दिया था। मैंने बापू को पत्र लिखकर उनसे मुझे इस जिम्मेदारी से मुक्त करने की अपील भी की थी, लेकिन उनके निधन ने सब कुछ बदल दिया है। हमारे देश पर आए इस संकट को हमें यह नए सिरे से समझना चाहिए, हमने मिलकर कितनी उपलब्धियां हासिल की हैं और अपने शोकाकुल देश के हित में आगे भी मिल-जुलकर प्रयास करना कितना आवश्यक है।”
राजनीतिक सहयोगियों के बीच आदान-प्रदान किए गए पत्रों में यह शायद सबसे भावुक पत्रों में शामिल है। इसका प्रभाव दोनों नेताओं पर लंबे समय तक रहा। उन्होंने अपने मतभेदों को पीछे छोड़ देश के बिखरे हुए हिस्सों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने का काम किया। राजमोहन गांधी लिखते हैं कि गृह मंत्री के रूप में पटेल और प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू ने जिन वर्षों में साथ काम किया, उन दौरान पटेल ने नेहरू के सर्वोच्च नेतृत्व और उनकी लोकप्रियता को भली-भांति स्वीकार किया था।
14 नवंबर, 1948 को, नेहरू के 59वें जन्मदिन पर पटेल ने लिखा था, “महात्मा गांधी ने पंडित नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। गांधी के निधन के बाद हमें अहसास हुआ कि हमारे नेता का निर्णय सही था।” राजमोहन गांधी मौजूदा परिस्थितियों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं। उनके अनुसार, भारत आज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है और ऐसे समय में 'पटेल बनाम नेहरू' के विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों से भटकाने का एक तरीका है। वे कहते हैं, “पटेल और नेहरू के बीच कई बार बहुत तीखे मतभेद होते थे। निजी बातचीत में तो वे हमेशा ही अपने मतभेदों को खुलकर व्यक्त करते थे और कभी-कभी सार्वजनिक रूप से भी ऐसा करते थे। उनके मतभेदों में नाटक भी था और अर्थ भी। आखिर में हर विवाद का समापन एकता के साथ हुआ।”
पटेल और नेहरू के नेतृत्व वाली इस जोड़ी को दिशा देने में महात्मा गांधी की भूमिका का उल्लेख करने के बाद राजमोहन गांधी कहते हैं, “मुझे आशा है कि पाठक गांधी, पटेल और नेहरू के इस असाधारण त्रिकोण की विशिष्टता को भी समझेंगे। साथ ही, वे यह भी पहचानेंगे कि हर बड़े संकट और उथल-पुथल के बाद आखिरकार एक साथ आने की इन तीनों नेताओं की क्षमता और उनकी इच्छा भारत के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि थी।