हिमनद झीलों की होगी निगरानी: वसुंधरा ताल में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, सीएस ने वैज्ञानिक दल को किया रवाना
यह पहला वैज्ञानिक दल है, जो उत्तराखंड की किसी ग्लेशियल झील में निगरानी एवं पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्र में जा रहा है।
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उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लॉफ) के जोखिम को कम करने और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की निगरानी एवं पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल शुरू हो गई है। चमोली जिले में स्थित वसुंधरा ताल से प्रदेश की ग्लेशियल झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की शुरुआत की जा रही है।
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने मंगलवार को सचिवालय से वसुंधरा ताल में निगरानी एवं पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए रवाना हो रहे वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाई और अभियान के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि यह पहल भविष्य में ग्लॉफ के खतरों को कम करने और जोखिम को वैज्ञानिक तरीके से समझने में महत्वपूर्ण साबित होगी। अत्याधुनिक सेंसर, उपग्रह संचार और रियल टाइम आंकड़ों की निगरानी से ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।
यह पहला वैज्ञानिक दल है, जो उत्तराखंड की किसी ग्लेशियल झील में निगरानी एवं पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्र में जा रहा है। अभियान 29 सितंबर से 15 अक्तूबर 2026 तक प्रस्तावित है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी अभियान में शामिल वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और सुरक्षा बलों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित होने के कारण ग्लेशियल झीलों की निगरानी और उनसे जुड़े संभावित जोखिमों के प्रति सतर्कता बेहद महत्वपूर्ण है। वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम की स्थापना राज्य की आपदा तैयारियों को तकनीक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। राज्य सरकार का प्रयास है कि वैज्ञानिक संस्थानों, विशेषज्ञों और आपदा प्रबंधन से जुड़े विभागों के समन्वय से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आधुनिक निगरानी एवं पूर्व चेतावनी तंत्र को और मजबूत किया जाए।
सीबीआरआई और वाडिया के विशेषज्ञ करेंगे स्थापना
उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) की ओर से राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत यह अभियान संचालित किया जा रहा है। अभियान दल में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक एवं तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं।
उच्च हिमालयी और दुर्गम क्षेत्र में अभियान दल की सुरक्षा, आवागमन तथा फील्ड सहयोग के लिए राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवान भी साथ रहेंगे। यूएसडीएमए की ओर से अभियान के लिए आवश्यक समन्वय एवं लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। अभियान दल को सैटेलाइट फोन और लो अर्थ ऑर्बिट डिवाइस भी उपलब्ध कराए गए हैं। इनके माध्यम से मोबाइल नेटवर्क नहीं होने की स्थिति में भी टीम का यूएसडीएमए के साथ संचार एवं समन्वय बना रहेगा।