फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Delhi High Court observes that live-in relationship is akin to marriage parents cannot interfere

लिव-इन रिलेशनशिप: हाईकोर्ट ने कहा- सहमति से वयस्कों का रिश्ता शादी के समान, माता-पिता भी नहीं कर सकते दखल

Thu, 20 Aug 2026 03:00 PM IST
Rahul Kumar Tiwari पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: Rahul Kumar Tiwari Updated Thu, 20 Aug 2026 03:00 PM IST
सार
Register For Event

दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि सहमति से साथ रह रहे वयस्कों के रिश्ते में माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त दखल नहीं दे सकते। परिवार की धमकियों से परेशान कपल को पुलिस सुरक्षा देते हुए कोर्ट ने इसे शादी के समान बताया।
 

विज्ञापन
Delhi High Court observes that live-in relationship is akin to marriage parents cannot interfere
दिल्ली हाईकोर्ट, Delhi High Court - फोटो : अमर उजाला GFX

विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे वयस्कों का रिश्ता शादी के समान है। माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त उनकी पसंद में दखल नहीं दे सकते और न ही उनकी जान या स्वतंत्रता को खतरा पहुंचा सकते हैं। अदालत ने परिवार की ओर से धमकियों का सामना कर रहे एक लिव-इन कपल को पुलिस सुरक्षा भी प्रदान की।
विज्ञापन


न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने 13 अगस्त को दंपती की याचिका पर यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता दंपती की उम्र 30 वर्ष से अधिक है। उन्होंने अदालत को बताया कि वे कुछ समय से साथ रह रहे हैं और एक-दूसरे से शादी करने का भी इरादा रखते हैं।
विज्ञापन

अदालत को बताया गया कि लड़की के पिता और भाई इस रिश्ते से खुश नहीं थे और वे लगातार दोनों को हिंसा की धमकी दे रहे थे। याचिकाकर्ताओं ने स्थानीय थाना प्रभारी (एसएचओ) से शिकायत भी की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

'किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं'
अदालत ने कहा, 'चूंकि याचिकाकर्ताओं ने अपनी इच्छा, सहमति और पूरी जिम्मेदारी के साथ एक-दूसरे के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया है, इसलिए कोई भी व्यक्ति, चाहे वह उनके माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त हों, उनकी पसंद में बाधा डालने या हस्तक्षेप करने का अधिकार अथवा अधिकारिता नहीं रखता। उन्हें उनकी जान या स्वतंत्रता के लिए धमकी देने का तो बिल्कुल भी अधिकार नहीं है।'

अदालत ने आगे कहा, 'याचिकाकर्ता लिव-इन रिलेशनशिप में हैं और कानूनी रूप से एक-दूसरे से विवाहित नहीं हैं, लेकिन दोनों सहमति से वयस्क हैं, इसलिए उनका रिश्ता शादी के समान है।'

 

'सामाजिक पूर्वाग्रहों से मौलिक अधिकार सीमित नहीं किए जा सकते'
न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने कहा कि सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों की शादियों को जाति, पंथ, रंग, धर्म या आस्था के आधार पर मान्यता से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों को ‘सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रहों’ के आधार पर सीमित करना व्यक्ति की स्वतंत्र पहचान से वंचित करने के समान है।
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि विवाह न होने के बावजूद वयस्कों को अपनी इच्छा के अनुसार एक-दूसरे के साथ रहने का असीमित अधिकार है। अदालत ने कहा कि अब कानून की नजर में इस अधिकार को मान्यता प्राप्त है और विधायिका ने भी इसे घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 जैसे प्रावधानों के तहत मान्यता दी है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed