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नीट PG में बड़े बदलाव की तैयारी: पर्सेंटाइल की जगह लागू हो सकती है रैंक आधारित व्यवस्था, केंद्र ने दी जानकारी

Tue, 03 Nov 2026 05:15 PM IST
आकाश कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: आकाश कुमार Updated Tue, 03 Nov 2026 05:15 PM IST
सार
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नीट पीजी और सुपर स्पेशियलिटी प्रवेश परीक्षा में अब पर्सेंटाइल के बजाय रैंक के आधार पर दाखिले की व्यवस्था लागू हो सकती है। विशेषज्ञ समिति ने खाली मेडिकल सीटों, फीस और काउंसलिंग में देरी जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए कई अहम सुझाव दिए हैं। यह जानकारी केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दी है। जानें क्या है तैयारी...
 

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NEET PG Admission 2025: Rank-Based Merit System Proposed, Expert Panel Suggests Major Changes
Rank-Based Merit System Proposed In NEET PG - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

मेडिकल की स्नातकोत्तर (पीजी) सीटों पर दाखिले की व्यवस्था में बड़ा बदलाव हो सकता है। नीट पीजी प्रवेश प्रणाली की समीक्षा के लिए गठित 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने मौजूदा पर्सेंटाइल आधारित पात्रता व्यवस्था को खत्म कर रैंक आधारित मेरिट व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया है। समिति ने यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की है। इसमें बताया गया है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने नीट पीजी और सुपर स्पेशियलिटी प्रवेश परीक्षा (नीट एसएस) दोनों के लिए इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।

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जल्द ही इस संबंध में मसौदा नियम जारी किए जाने की उम्मीद है। इसके बाद संबंधित पक्षों से सुझाव और राय मांगी जाएगी। समिति का मानना है कि दाखिला व्यवस्था में सुधार के साथ मेडिकल की पढ़ाई के न्यूनतम मानकों को भी बनाए रखना जरूरी है।

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नीट पीजी की पर्सेंटाइल घटाने वाले फैसले से जुड़ा है मामला

यह पूरा मामला नीट पीजी 2025 की पात्रता के लिए निर्धारित कटऑफ पर्सेंटाइल में भारी कमी किए जाने के बाद सामने आया था। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने खाली पीजी मेडिकल सीटों को भरने के लिए पात्रता अंक में बड़ी कटौती की थी।

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  • सामान्य वर्ग का क्वालिफाइंग स्कोर 276 से घटाकर 103 कर दिया गया था।

  • अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए यह स्कोर 235 से घटाकर -40 कर दिया गया था।

इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए थे। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने पात्रता पर्सेंटाइल में इतनी बड़ी कमी पर चिंता जताई थी। पीठ ने कहा था कि इस तरह की कटौती से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती दिखाई देती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि भले ही यह सरकार का नीतिगत फैसला हो, लेकिन वह इसकी जांच करेगी।

 

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को मौजूदा नीट दाखिला व्यवस्था का व्यापक ऑडिट करने, उसकी कमियों की पहचान करने और व्यावहारिक समाधान सुझाने का निर्देश दिया था। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट इसी निर्देश के तहत पेश की गई है।

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मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर समिति ने क्या चिंता जताई?

केंद्र सरकार की ओर से अदालत में दाखिल हलफनामे में विशेषज्ञ समिति ने कहा कि खाली सीटों की संख्या को देखते हुए सक्षम अधिकारियों ने पात्रता पर्सेंटाइल में कमी की है, लेकिन पीजी मेडिकल शिक्षा के न्यूनतम मानकों को बनाए रखना जरूरी है। समिति ने स्पष्ट किया कि प्रतियोगी परीक्षाओं के महत्व को केवल प्रशासनिक औपचारिकता तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

खाली पीजी मेडिकल सीटें भरने के लिए क्या सुझाव दिए गए?

विशेषज्ञ समिति ने पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों की खाली सीटों की समस्या दूर करने के लिए कई उपाय सुझाए हैं।

1. गैर-क्लिनिकल पाठ्यक्रमों की फीस कम करने का सुझाव
समिति ने राज्य की फीस निर्धारण समितियों और सक्षम अधिकारियों से क्लिनिकल तथा गैर-क्लिनिकल विषयों के लिए अलग-अलग फीस व्यवस्था पर विचार करने को कहा है। इसके तहत गैर-क्लिनिकल पाठ्यक्रमों की फीस कम रखने का सुझाव दिया गया है, ताकि उम्मीदवार इन विषयों में दाखिला लेने के लिए प्रोत्साहित हों।

2. प्री-क्लिनिकल और पैरा-क्लिनिकल विषयों में सेवा बंधन से छूट
समिति ने सुझाव दिया है कि प्री-क्लिनिकल और पैरा-क्लिनिकल विषयों में दाखिला लेने वाले उम्मीदवारों को सेवा बंधन से छूट दी जाए। इससे इन विषयों की सीटें खाली रहने की समस्या कम हो सकती है।

3. काउंसलिंग के अतिरिक्त चरण आयोजित करने का सुझाव
समिति ने बताया कि सीटें खाली रहने से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद काउंसलिंग के अतिरिक्त चरण आयोजित किए जा रहे हैं। हालांकि, समिति ने यह भी आगाह किया कि अतिरिक्त चरणों से काउंसलिंग की पूरी प्रक्रिया में लगने वाला समय बढ़ जाता है।

4. सीट रोकने वाले उम्मीदवारों पर लगाम लगाने की तैयारी
समिति ने सुझाव दिया है कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाएं राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) और आयुर्विज्ञान में राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एनबीईएमएस) पहचान सत्यापन और बायोमेट्रिक जांच की व्यवस्था पर विचार करें। इसका उद्देश्य ऐसे उम्मीदवारों को रोकना है, जो दाखिला लेने के बजाय केवल सीट रोकने के इरादे से प्रवेश परीक्षाओं में शामिल होते हैं।

5. डेंटल और नर्सिंग की खाली सीटों पर भी विचार
समिति ने डेंटल और नर्सिंग के स्नातकों के लिए रोजगार के अधिक अवसर पैदा करने का सुझाव दिया है। इसके अलावा, दो से तीन साल लगातार खाली रहने वाली सीटों को बंद करने पर विचार करने और इन पाठ्यक्रमों की फीस कम करने का भी सुझाव दिया गया है।

मेडिकल काउंसलिंग में देरी रोकने के लिए क्या बदलाव हुए?

मेडिकल काउंसलिंग समिति (एमसीसी) ने विशेषज्ञ पैनल को बताया कि 2026-27 की काउंसलिंग प्रक्रिया में कई बदलाव किए गए हैं। इनका उद्देश्य देरी और उम्मीदवारों की परेशानी कम करना है।

फ्रीज और फ्लोट श्रेणी की व्यवस्था
नई व्यवस्था के तहत उम्मीदवारों को उनकी पसंद के आधार पर दो श्रेणियों में बांटा गया है।

  • फ्रीज: इसमें उम्मीदवार अपनी आवंटित सीट को बरकरार रखना चाहता है।
  • फ्लोट: इसमें उम्मीदवार आवंटित सीट स्वीकार करने के साथ बेहतर सीट मिलने पर उसे अपग्रेड कराना चाहता है।

फ्लोट विकल्प चुनने वाले उम्मीदवार ऑनलाइन अपनी आवंटित सीट स्वीकार कर सकते हैं। साथ ही सीट अपग्रेड के लिए आवेदन भी कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें संबंधित संस्थान में व्यक्तिगत रूप से जाने की जरूरत नहीं होगी।

दाखिले से जुड़ी दूसरी प्रक्रियाएं भी ऑनलाइन
सीट अपग्रेड होने के बाद उम्मीदवार को उसकी पहले आवंटित सीट से मुक्त करने की प्रक्रिया भी ऑनलाइन कर दी गई है। इसके अलावा:

  • उम्मीदवार को फीस केवल एक बार जमा करनी होगी।
  • फीस उसी संस्थान में जमा होगी, जहां वह अंततः दाखिला लेने का फैसला करेगा।
  • दस्तावेज ऑनलाइन अपलोड किए जा सकेंगे।
  • संस्थानों के नोडल अधिकारी ऑनलाइन दस्तावेजों का सत्यापन करेंगे।

मेडिकल कॉलेजों की सीटों के आंकड़ों में कैसे आया सुधार?

  • राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को एमसीसी के काउंसलिंग पोर्टल से जोड़ दिया गया है।
  • इससे मेडिकल कॉलेजों की सीटों का विवरण सीधे साझा करने और उसका सत्यापन करने में मदद मिलेगी।
  • पहले मेडिकल कॉलेज अपनी सीटों का विवरण सीधे एमसीसी को भेजते थे।
  • इसके बाद एमसीसी को इन आंकड़ों का एनएमसी के रिकॉर्ड से मैन्युअल तरीके से मिलान करना पड़ता था।
  • नई व्यवस्था में एनएमसी को सीधे काउंसलिंग पोर्टल से जोड़ दिया गया है।

समिति के मुताबिक, इससे सीटों के विवरण में दोहराव की समस्या खत्म हुई है। साथ ही काउंसलिंग का कार्यक्रम व्यवस्थित करने में भी मदद मिली है।

आने वाले वर्षों में काउंसलिंग के लिए क्या नई व्यवस्था बनाने का सुझाव है?

विशेषज्ञ समिति ने भविष्य की काउंसलिंग प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए पांच प्रमुख सुझाव दिए हैं।

  1. एनएमसी, एनबीईएमएस और एनटीए को काउंसलिंग शुरू होने से काफी पहले सत्यापित सीटों का विवरण उपलब्ध कराना चाहिए।
  2. एमसीसी को हर शैक्षणिक वर्ष और पाठ्यक्रम के लिए काउंसलिंग का निश्चित कार्यक्रम तैयार करना चाहिए और उसे मंजूरी के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने रखना चाहिए।
  3. काउंसलिंग को व्यवस्थित बनाने के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं तैयार की जाएं और हर साल उन्हें अपडेट किया जाए।
  4. काउंसलिंग से पहले और बाद में संबंधित पक्षों के साथ नियमित बैठकें आयोजित की जाएं, ताकि कमियों और बार-बार सामने आने वाली समस्याओं की पहचान हो सके।
  5. नीट के परिणाम सीधे राज्य की काउंसलिंग अथॉरिटी तक पहुंचाने के लिए ऑनलाइन व्यवस्था विकसित की जाए।

 

समिति की रिपोर्ट पर याचिकाकर्ता के वकील ने क्या सवाल उठाया?

सुप्रीम कोर्ट में समिति की रिपोर्ट पेश होने के बाद याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वकील सत्यम सिंह राजपूत ने इस प्रस्ताव पर सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि पात्रता कटऑफ अंकों में भारी कमी के फैसले को सही ठहराने के बजाय समिति ने अब अंक निर्धारण की व्यवस्था में ही बदलाव करने का प्रस्ताव दे दिया है।

राजपूत ने कहा, "अब विडंबना यह है कि वे पर्सेंटाइल से रैंक आधारित व्यवस्था की ओर जा रहे हैं। इसमें अंतर क्या है?"

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय दे दिया। इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।

 

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