कौन हैं हेतल वारिया? ‘रामायण’ में रणबीर की आवाज पर किया है काम? सेट पर डायलेक्ट कोच की मौजूदगी को बताया जरूरी
- बहुप्रतीक्षित फिल्म 'रामायण' में वॉइस और डायलेक्ट कोच हेतल वारिया ने रणबीर कपूर की आवाज पर काम किया है।
- उन्होंने बताया कि भगवान राम के किरदार के लिए आवाज तैयार करते समय किन बातों का ध्यान रखा गया?
- उन्होंने यह भी समझाया कि फिल्मों की शूटिंग के दौरान डायलेक्ट कोच की जरूरत क्यों पड़ती है?
विस्तार
नितेश तिवारी की फिल्म ‘रामायण’ में रणबीर कपूर भगवान राम की भूमिका निभा रहे हैं। इस किरदार के लिए उनकी आवाज और बोलने के अंदाज पर भी काम किया गया। रणबीर ने इसके लिए वॉइस और डायलेक्ट कोच हेतल वारिया के साथ छह महीने से ज्यादा समय तक अभ्यास किया। हेतल के लिए यह रणबीर के साथ पहला पेशेवर काम था। वह पिछले एक दशक से ज्यादा समय से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। ‘तरला’, ‘अ सूटेबल बॉय’, ‘शांताराम’, ‘द फेबल’, ‘द व्हील ऑफ टाइम’ और ‘सैम बहादुर’ जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुकीं हेतल ने लंदन के रॉयल सेंट्रल स्कूल ऑफ स्पीच एंड ड्रामा से वॉइस स्टडीज में मास्टर्स किया है।
अमर उजाला से बातचीत में हेतल ने बताया कि किसी किरदार की आवाज तैयार करने के लिए सिर्फ उच्चारण पर काम करना काफी नहीं है। इसमें सांस लेने का तरीका, शरीर की मुद्रा, शब्दों को बोलने का अंदाज और आवाज में उतार-चढ़ाव भी शामिल हैं।
‘रणबीर खुद को अच्छी तरह समझते हैं’
रणबीर के साथ काम करने के अनुभव पर हेतल कहती हैं, ‘रणबीर बहुत मेहनती अभिनेता हैं। उनकी एक बात मुझे सबसे अच्छी लगी। वह खुद को अच्छी तरह समझते हैं और बेहतर सीखने के लिए पुरानी आदतों को छोड़ने के लिए भी तैयार रहते हैं। वह एक अभिनेता के तौर पर खुद को समझते हैं और अपने बोलने के तरीके को लेकर भी जागरूक हैं।’
'राम’ के लिए आवाज में बदलाव, रणबीर की पहचान मिटाना नहीं था
रणबीर ने ‘रॉकस्टार’, ‘संजू’ और ‘एनिमल’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए हैं। दर्शकों के मन में इन किरदारों के साथ उनकी आवाज और बोलने के अंदाज की भी एक छवि बनी है। हेतल के मुताबिक, राम का किरदार निभाते समय उस छवि से अलग सोचने की जरूरत थी।
हेतल कहती हैं, 'किसी कलाकार की पहचान मिटाना हमारा मकसद नहीं होता। हम उसकी आवाज को किरदार की जरूरत के हिसाब से ढालने में मदद करते हैं। इसे पहचान मिटाने के बजाय उसमें कुछ नया जोड़ने की प्रक्रिया समझना चाहिए। इससे किरदार को बेहतर बनाने की मजबूत नींव तैयार होती है।
आवाज के कई पहलू होते हैं, जैसे उसकी गहराई, गूंज, लहजा, शब्दों का उच्चारण और उतार-चढ़ाव। किरदार की जरूरत के मुताबिक हम आवाज में गहराई, ठहराव या गर्माहट लाने पर काम कर सकते हैं। लेकिन सिर्फ आवाज भारी होने से अभिनय दमदार नहीं हो जाता।
राम के किरदार के लिए आवाज ऐसी होनी चाहिए, जो किरदार और निर्देशक की सोच के मुताबिक हो। वह स्वाभाविक लगे, बनावटी या जरूरत से ज्यादा भारी नहीं। दर्शकों का ध्यान किरदार पर जाना चाहिए, न कि इस बात पर कि कलाकार अपनी आवाज के साथ क्या तकनीक अपना रहा है।
इसमें स्क्रिप्ट और संवादों की भाषा भी अहम है। भाषा ऐसी होनी चाहिए, जो कहानी की दुनिया और किरदार की असलियत को बनाए रखे, साथ ही आज के दर्शकों को भी आसानी से समझ आए। संवाद ऐसे लगने चाहिए, जैसे किरदार स्वाभाविक रूप से अपनी बात कह रहा हो, न कि लिखी हुई पंक्तियां पढ़ रहा हो। इसके लिए शब्दों के उच्चारण और आवाज के उतार-चढ़ाव पर ध्यान देना जरूरी है।'
रणबीर की अलग आवाज सुनकर उलझन में पड़ गया कुत्ता
इस वॉयस ट्रेनिंग के दौरान का मजेदार वाकया सुनाते हुए हेतल ने कहा, ‘जब रणबीर राम की आवाज में बोलने का अभ्यास करते थे, तो कई तरह की आवाजें निकालते थे। इस दौरान उनका कुत्ता उलझन में पड़ जाता था। वह रणबीर की सामान्य आवाज सुनने का आदी था, इसलिए उनके बोलने का बदला हुआ अंदाज उसे हैरान करता था। यह एक मजेदार और प्यारा पल था।'
आवाज की ट्रेनिंग में क्या होता है?
हेतल बताती हैं कि ट्रेनिंग का तरीका स्क्रिप्ट और उपलब्ध समय के हिसाब से तय होता है। कभी सीधे संवादों पर काम किया जाता है, तो कभी कुछ अभ्यासों के जरिए शुरुआत होती है।
वह कहती हैं, ‘हम आम तौर पर हफ्ते में एक या दो बार मिलते थे। हर सेशन करीब एक घंटे का होता था। मेरा तरीका स्क्रिप्ट और उपलब्ध समय पर निर्भर करता है। अगर समय कम हो, तो मैं स्क्रिप्ट पर काम करती हूं। अगर ज्यादा समय हो, तो शुरुआत कुछ हल्के-फुल्के अभ्यासों से करना पसंद करती हूं। फिर धीरे-धीरे बोली और स्क्रिप्ट पर आते हैं।’
वह आगे कहती हैं, ‘आवाज पर काम करने में सांस, शरीर, शब्दों का उच्चारण, आवाज में उतार-चढ़ाव और बोलते समय अपनी मौजूदगी बनाए रखना शामिल है। मुंह का आकार, शरीर को रखने का तरीका और सांस लेने का ढंग भी आवाज पर असर डालते हैं।
इसके लिए कई तरह के अभ्यास किए जाते हैं। इनमें मुंह के आकार को बदलना, सांस पर काम करना और शब्दों को साफ बोलने का अभ्यास शामिल है। आवाज में फुर्ती लाने के लिए स्ट्रॉ का इस्तेमाल भी किया जाता है। शरीर की मुद्रा बदलकर यह समझने की कोशिश होती है कि उसका आवाज पर क्या असर पड़ता है।'
‘संवाद कागज पर ही नहीं, बोलने में भी सहज लगने चाहिए’
अभिनय का अनुभव भी हेतल के काम आता है। वह कहती हैं, ‘मैंने खुद काफी अभिनय किया है। इससे मुझे समझने में मदद मिलती है कि संवाद अभिनेता के मुंह, जीभ और शरीर के साथ सहजता से बैठना चाहिए। वह सिर्फ कागज पर अच्छा नहीं लगना चाहिए। कोई लाइन स्क्रिप्ट में खूबसूरत हो सकती है, लेकिन अभिनेता जब उसे बोले, तो वह भी उतनी ही स्वाभाविक लगनी चाहिए।’
‘क्षमा’ शब्द पर भी हुई चर्चा
हेतल बताती हैं कि कुछ शब्दों को बोलने के तरीके पर खास ध्यान देना पड़ता है। राम के किरदार की तैयारी के दौरान ‘क्षमा’ शब्द पर भी चर्चा हुई। वह कहती हैं, ‘क्षमा उन शब्दों में से एक था, जिस पर हमने चर्चा की। ऐसे शब्दों में उच्चारण अहम है। एक शब्द को एक से ज्यादा तरीकों से बोला जा सकता है। बोली की खूबसूरती भी यही है। ध्यान देना होता है कि अलग-अलग ध्वनियां किस तरह जुड़ती हैं और शब्द पूरे वाक्य में कैसे बोला जाता है।’ वह आगे कहती हैं, ‘उच्चारण का मतलब सिर्फ शब्दों को सही बोलना नहीं है। जरूरी यह भी है कि ध्वनियां सही तरीके से निकलें और शब्द संवाद, वाक्य या विचार में स्वाभाविक लगें। बोलने का अंदाज स्वाभाविक बनाने के लिए अभ्यास जरूरी है।’
डायलेक्ट कोच भी सेट पर हों, जैसे स्टंट डायरेक्टर होते हैं’
हेतल कहती हैं, 'मैं ‘रामायण’ की शूटिंग के दौरान सेट पर मौजूद नहीं थी। मेरा मानना है कि बेहतर नतीजों के लिए फिल्म इंडस्ट्री को इस पर दोबारा विचार करना चाहिए।
सेट पर स्टंट डायरेक्टर होते हैं, क्योंकि एक्शन सीन के लिए खास ट्रेनिंग और निगरानी की जरूरत होती है। स्टंट करते समय कलाकार को कोई सलाह या सुधार चाहिए, तो संबंधित विशेषज्ञ वहां मौजूद रहते हैं। मेरा मानना है कि डायलेक्ट कोच को भी इसी तरह अहमियत मिलनी चाहिए।'
‘सेट पर भी मिले कलाकारों को सही मार्गदर्शन’
वह आगे कहती है, 'कलाकार फिल्म की तैयारी के दौरान किसी बोली पर काफी काम कर सकता है, लेकिन शूटिंग का माहौल अलग होता है। वहां भावनाएं, शारीरिक गतिविधियां, अचानक किए गए बदलाव और कई दूसरी चीजें संभालनी होती हैं। ऐसे में बोली के उच्चारण में गलती होना स्वाभाविक है। कई बार कलाकार को सीन के दौरान एक छोटे से सुधार या याद दिलाने की जरूरत पड़ सकती है।
अगर डायलेक्ट कोच सेट पर मौजूद हों, तो इन छोटी-छोटी गलतियों को तुरंत ठीक किया जा सकता है। इससे किरदार के बोलने के अंदाज में एकरूपता बनी रहती है और कलाकार के अभिनय को भी मदद मिलती है।
मैं इस काम करने के तरीके में बदलाव देखना चाहती हूं। पश्चिमी देशों में फिल्म निर्माण के दौरान विशेषज्ञों की मदद जिस तरह ली जाती है, उससे भी सीखने की जरूरत है। डायलेक्ट कोचिंग को सिर्फ फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले की तैयारी तक सीमित नहीं रखना चाहिए। प्री-प्रोडक्शन से लेकर पोस्ट-प्रोडक्शन तक, कलाकार के प्रदर्शन के हर चरण में इसकी जरूरत हो सकती है।'
‘वॉइस और डायलेक्ट कोच किरदारों के डिजाइनर हैं’
हेतल कहती हैं, 'मैं चाहती हूं कि फिल्म निर्माता दो बातें समझें। पहली, डायलेक्ट कोचिंग किसी एक भाषा या बोली तक सीमित नहीं है। अगर कोच प्रशिक्षित है, तो उसे उच्चारण और बोली को समझने और उस पर काम करने का तरीका पता होता है। वह कलाकार को उस बोली में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद कर सकता है। इसलिए कोच की विशेषज्ञता को सिर्फ उसकी मातृभाषा तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए।
दूसरी बात, वॉइस और डायलेक्ट कोच को किरदारों का डिजाइनर समझना चाहिए। हम कहानियों को आकार देते हैं, किरदार गढ़ते हैं और उनकी दुनिया बनाने में मदद करते हैं। आवाज, बोलने का अंदाज और बोली चुपचाप किरदार की पहचान का अहम हिस्सा बन जाते हैं। इन पर बहुत सोच-समझकर काम करना पड़ता है, ताकि फिल्म की कहानी उस आवाज के जरिए कही जा सके, जो उस खास किरदार की अपनी हो। भाषा और बोलने के इस अनोखे अंदाज को ही ‘इडियोलेक्ट’ कहते हैं।'