Exclusive News एक्सक्लूसिव खबरें
Free E-Paper फ्री में ई-पेपर पढ़ें
ऐप डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Events Coverage ›   ayodhya deepotsav economic impact employment Cultural tourism Light from lamps

विचार: दीयों से रोशनी, रोशनी से रोजगार

Fri, 06 Nov 2026 10:25 AM IST
अमन तिवारी मनीष खेमका
मनीष खेमका Published by: अमन तिवारी Updated Fri, 06 Nov 2026 10:25 AM IST
विज्ञापन
ayodhya deepotsav economic impact employment Cultural tourism Light from lamps
अयोध्या में दीपोत्सव - फोटो : amar ujala
अयोध्या का दीपोत्सव केवल आस्था की अभिव्यक्ति या सरयू के घाटों को जगमगाने वाला एक धार्मिक आयोजन भर नहीं है। यह वास्तव में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आर्थिक स्वावलंबन का एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय बन चुका है, जिसने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन को छुआ है। सरयू के घाटों पर जब एक साथ लाखों दीपक प्रज्वलित होते हैं, तो माटी के उस एक दीये में एक कुम्हार की मेहनत, बाती कातने वाली महिलाओं का संबल, नाविकों का संघर्ष और श्रमिकों की उजली उम्मीदें भी रोशन होती हैं। 'दीपोत्सव का दशक' इस बात का सबसे बड़ा साक्षी है कि कैसे 'दीयों की रोशनी' ने 'रोजगार की रोशनी' को जन्म दिया है।
विज्ञापन


जब हम दीपोत्सव की बात करते हैं, तो सबसे पहला चित्र उन लाखों टिमटिमाते दीयों का उभरता है, जो सरयू के तट पर अलौकिक आभा बिखेरते हैं। इन दीयों की रोशनी ने माटी कला के हमारे कारीगरों और कुम्हारों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरी है। ये केवल माटी के दीये नहीं हैं, बल्कि उन कारीगरों की उम्मीदों के कलश हैं।
विज्ञापन


दीये मिट्टी से बनते हैं, लेकिन उन्हें रोशन होने के लिए बाती और तेल की भी आवश्यकता होती है। यहीं से रोजगार का एक बड़ा इकोसिस्टम जन्म लेता है, जिसके अर्थतंत्र में ग्रामीण महिलाएं अहम भूमिका निभाती हैं। लाखों-करोड़ों दीयों के लिए रुई की बातियां तैयार करने का दिखने में छोटा, लेकिन व्यापक कार्य स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (सेल्फ हेल्प ग्रुप्स) और ग्रामीण महिलाओं द्वारा किया जाता है। इससे अर्जित धनराशि उनके स्वावलंबन और आत्मसम्मान का प्रतीक है। इसी प्रकार, लाखों दीयों में डालने के लिए सरसों के तेल की आवश्यकता होती है। इससे स्थानीय कोल्हुओं और तेल मिलों को बड़ा आर्थिक लाभ मिलता है, जिससे वहां काम करने वाले मजदूरों की आजीविका सुरक्षित होती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


दीपोत्सव का यह आयोजन अब वैश्विक पर्यटन के मानचित्र पर चमकने लगा है। पिछले दस वर्षों में अयोध्या ने धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में जो ऐतिहासिक छलांग लगाई है, वह पूरी दुनिया के लिए एक केस स्टडी है। देश के कोने-कोने और विदेशों से भी लाखों की संख्या में श्रद्धालु, पर्यटक और मीडियाकर्मी इस दिव्य छटा को निहारने अयोध्या पहुंचते हैं। पर्यटकों की इस भारी भीड़ ने स्थानीय स्तर पर रोजगार की ऐसी बाढ़ ला दी है, जिसने पूरी अवध बेल्ट की अर्थव्यवस्था को बदलकर रख दिया है। अयोध्या और उसके आसपास के क्षेत्रों में होटल, गेस्ट हाउस, धर्मशालाओं और होम-स्टे का एक पूरा नेटवर्क खड़ा हो गया है। हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में आए इस उछाल ने युवाओं को रिसेप्शनिस्ट, शेफ, हाउसकीपिंग स्टाफ और मैनेजर के तौर पर रोजगार दिया है।

पर्यटन के इस बूम का सीधा असर परिवहन (ट्रांसपोर्ट) और स्थानीय आजीविका पर पड़ा है। पर्यटकों को रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट से लेकर राम की पैड़ी और मंदिरों तक पहुंचाने वाले ई-रिक्शा चालकों, सरयू नदी की लहरों पर नौका विहार कराने वाले नाविकों, शहर का इतिहास बताने वाले टूर गाइडों और टैक्सी चालकों की आय में इस दौरान कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है। सड़कों के किनारे फूल-माला बेचने वाले, चंदन-रोली और प्रसाद की छोटी दुकानें लगाने वाले, चाय-पान की गुमटी चलाने वाले, लकड़ी के खिलौने बेचने वाले और ठेले पर स्थानीय व्यंजन बेचने वाले छोटे व्यापारियों के लिए यह समय दीवाली के सच्चे अर्थों को चरितार्थ करता है। अर्थशास्त्र का नियम है कि जब धन का प्रवाह नीचे की ओर होता है, तो अर्थव्यवस्था सबसे अधिक मजबूत होती है। जब लाखों कदम अयोध्या की सड़कों पर चलते हैं, तो वे यहां के स्थानीय बाजार में करोड़ों रुपये की लिक्विडिटी छोड़ जाते हैं।

दीपोत्सव के दौरान अयोध्या की सड़कों पर निकलने वाली झांकियां, भव्य लेजर शो, रामलीला का मंचन और देश के विभिन्न राज्यों से आए लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां इस आयोजन की भव्यता को कई गुना बढ़ा देती हैं। दीपोत्सव ने अवध, ब्रज, बुंदेलखंड से लेकर देश के कोने-कोने तक के कलाकारों को एक अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान किया है। उन्हें तालियों और सम्मान के साथ आजीविका भी दी है। इस पूरे आयोजन को आकार देने वाले नेपथ्य के नायकों को भी नहीं भुलाया जा सकता। टेंट लगाने वाले मजदूर, लाइट और फूलों की सजावट करने वाले कारीगर, साउंड सिस्टम संचालित करने वाले तकनीशियन और विशाल तोरण द्वार बनाने वाले शिल्पियों के लिए यह आयोजन उनकी कला और व्यापार, दोनों का सबसे बड़ा उत्सव है।

अगर हम व्यापक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो अयोध्या का दीपोत्सव एक सफल 'इकोनॉमिक और कल्चरल मॉडल' के रूप में दिखाई देगा। इस मॉडल ने यह साबित किया है कि हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों में ही आर्थिक समृद्धि के बीज भी छिपे हैं। दीपोत्सव जैसे आयोजन को सफल बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एक बड़ी अनिवार्यता है। चौड़ी सड़कों का निर्माण, घाटों का सौंदर्यीकरण, नए रेलवे स्टेशन और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का निर्माण, ये सभी कार्य भी जरूरी हैं। इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों श्रम दिवसों का रोजगार सृजित होता है। अयोध्या के दीपोत्सव का पिछला एक दशक इस बात का सबसे ज्वलंत, प्रामाणिक और भावपूर्ण उदाहरण है कि 'दीयों की रोशनी' किस प्रकार 'रोजगार की रोशनी' में बदल सकती है। 


(अस्वीकरण: यह लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक मनीष खेमका, ग्लोबल टैक्सपेयर्स ट्रस्ट के चेयरमैन और जीएसटी ग्रीवांस रिड्रेसल कमेटी उत्तर प्रदेश के सदस्य हैं।)
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed