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विचार: सार्वजनिक जीवन में शुचिता, सामान्य शिष्टाचार और नैतिक सीमाओं का होता पतन
Wed, 02 Sep 2026 07:07 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
डॉ. अनूप मिश्रा
डॉ. अनूप मिश्रा
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 02 Sep 2026 07:07 PM IST
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सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
- फोटो : amar ujala
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राजनीतिक बहसों में मतभेद और तीखे हमले भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा रहे हैं, लेकिन जब विरोध का माध्यम व्यक्तिगत आक्षेप और किसी की गरिमा व धार्मिक आस्था को आहत करने वाले फर्जी आधुनिक साधनों तक पहुंच जाए, तो यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। डीपफेक और एआई की मदद से किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति अथवा किसी धार्मिक पीठ के प्रमुख का विकृत रूप पेश करना केवल एक राजनीतिक विरोधी पर प्रहार भर नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन में शुचिता, सामान्य शिष्टाचार और नैतिक सीमाओं के पतन को भी दर्शाता है।
राजनीतिक विरोध की अपनी सीमाएं होती हैं। नीतियों, कानून-व्यवस्था, विकास और भ्रष्टाचार पर सवाल पूछना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है। किंतु, एआई तकनीक के जरिए किसी के चरित्र और आस्था से जुड़ी तस्वीरें गढ़ना सार्वजनिक विमर्श के गिरते स्तर का प्रतीक है।
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राजनीतिक विरोध की अपनी सीमाएं होती हैं। नीतियों, कानून-व्यवस्था, विकास और भ्रष्टाचार पर सवाल पूछना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है। किंतु, एआई तकनीक के जरिए किसी के चरित्र और आस्था से जुड़ी तस्वीरें गढ़ना सार्वजनिक विमर्श के गिरते स्तर का प्रतीक है।
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तकनीक का दुरुपयोग और डीपफेक का खतरा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का मुख्य उद्देश्य समाज को सशक्त बनाना, शासन-प्रशासन में पारदर्शिता लाना और दैनिक जीवन को सुगम बनाना है। लेकिन जब राजनीतिक दल इस तकनीक का उपयोग अपने विरोधियों का चरित्र-हनन करने या भ्रामक नैरेटिव बनाने के लिए करने लगते हैं, तो यह सीधे तौर पर समाज के लिए, लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाता है। आने वाले समय में चुनावी स्पर्धा और राजनीतिक जंग में डीपफेक तथा फेक मीडिया का दुरुपयोग बढ़ सकता है। अगर ज़िम्मेदार नेता स्वयं इस तरह की सामग्री को अपनी आधिकारिक वार्ताओं में बढ़ाना शुरू करेंगे, तो आम जनता में तकनीक के प्रति अविश्वास और समाज में वैमनस्य ही बढ़ेगा।
'शुचिता' और 'शिष्टाचार' की आवश्यकता
भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेताओं के बीच व्यक्तिगत सम्मान और शिष्टाचार बना रहता था। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को कभी भी व्यक्तिगत कटुता या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का साधन नहीं बनाया जाता था। जब शीर्ष स्तर के नेता राजनीतिक लाभ के लिए मर्यादाओं को लांघते हैं, तो इसका संदेश कार्यकर्ताओं और जनसामान्य तक नकारात्मक रूप से जाता है। राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए एक आचरण प्रस्तुत करने की व्यवस्था भी है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का मुख्य उद्देश्य समाज को सशक्त बनाना, शासन-प्रशासन में पारदर्शिता लाना और दैनिक जीवन को सुगम बनाना है। लेकिन जब राजनीतिक दल इस तकनीक का उपयोग अपने विरोधियों का चरित्र-हनन करने या भ्रामक नैरेटिव बनाने के लिए करने लगते हैं, तो यह सीधे तौर पर समाज के लिए, लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाता है। आने वाले समय में चुनावी स्पर्धा और राजनीतिक जंग में डीपफेक तथा फेक मीडिया का दुरुपयोग बढ़ सकता है। अगर ज़िम्मेदार नेता स्वयं इस तरह की सामग्री को अपनी आधिकारिक वार्ताओं में बढ़ाना शुरू करेंगे, तो आम जनता में तकनीक के प्रति अविश्वास और समाज में वैमनस्य ही बढ़ेगा।
'शुचिता' और 'शिष्टाचार' की आवश्यकता
भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेताओं के बीच व्यक्तिगत सम्मान और शिष्टाचार बना रहता था। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को कभी भी व्यक्तिगत कटुता या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का साधन नहीं बनाया जाता था। जब शीर्ष स्तर के नेता राजनीतिक लाभ के लिए मर्यादाओं को लांघते हैं, तो इसका संदेश कार्यकर्ताओं और जनसामान्य तक नकारात्मक रूप से जाता है। राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज के लिए एक आचरण प्रस्तुत करने की व्यवस्था भी है।
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की तकनीक नहीं है। यह स्वतंत्र विचार, निष्पक्ष सूचना, जनविश्वास और नागरिक के विवेकपूर्ण निर्णय पर टिका होता है। इसलिए यदि एआई का इस्तेमाल मतदाता की सोच को प्रभावित करने, झूठी सूचनाएं फैलाने, विरोधी विचारों को बदनाम करने अथवा चुनाव जीतने के लिए जनमत को कृत्रिम रूप से मोड़ने में किया जाएगा, तो चुनाव भले ही तकनीकी रूप से सफल हो जाए, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। तकनीक की शक्ति जितनी बढ़ रही है, उसके नैतिक उपयोग की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़नी चाहिए। एआई से तेज चुनाव जीता जा सकता है, लेकिन लोकतंत्र केवल सत्य, विश्वास और स्वतंत्र विवेक से ही मजबूत किया जा सकता है। एआई मानव सभ्यता के लिए एक अद्भुत अवसर है। यह शिक्षा, शोध, कृषि, स्वास्थ्य, रोजगार और शासन को अधिक सक्षम, पारदर्शी और जनोन्मुख बना सकती है। लेकिन यही तकनीक ज्ञान और विकास का साधन बनने के बजाय भ्रम, दुष्प्रचार, मनोवैज्ञानिक नियंत्रण और राजनीतिक स्वार्थ का हथियार बन जाए, तो इसके परिणाम अत्यंत गंभीर हो सकते हैं।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनसमर्थन नीतियों, विकास के विजन और जनता के मुद्दों को उठाने से मिलता है, न कि विरोधियों की विकृत छवियां प्रस्तुत करके। एआई जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का प्रयोग रचनात्मक कार्यों और विकास के मुद्दों को उठाने के लिए किया जाना चाहिए। नेताओं को चाहिए कि वे सार्वजनिक जीवन में संवाद का स्तर ऊंचा रखें, ताकि भावी पीढ़ी के समक्ष एक स्वस्थ, संयमित और लोकतांत्रिक आचरण का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके।
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक डॉ. अनूप मिश्रा डीएवी पीजी कॉलेज, वाराणसी के प्रोफ़ेसर और अर्थशास्त्री हैं।)
(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक डॉ. अनूप मिश्रा डीएवी पीजी कॉलेज, वाराणसी के प्रोफ़ेसर और अर्थशास्त्री हैं।)