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जाट आरक्षण आंदोलन: कोर्ट का बड़ा फैसला, 17 आरोपियों को किया बरी, संदेह के आधार पर दी राहत
Wed, 16 Sep 2026 08:37 PM IST
शाहिल शर्मा
माई सिटी रिपोर्टर, हिसार
माई सिटी रिपोर्टर, हिसार
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Wed, 16 Sep 2026 08:37 PM IST
कथित तौर पर ली गई तस्वीरें कानून के अनुसार ठीक से पेश और साबित नहीं की गईं, जिससे तस्वीरों के आधार पर पहचान को विश्वसनीय नहीं माना गया।
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कोर्ट
- फोटो : सांकेतिक तस्वीर
विस्तार
जेएमआईसी की अदालत ने जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़े एक मामले में 17 आरोपियों को बरी कर दिया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अभिषेक गर्ग की अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों की पहचान और सरकारी संपत्ति को हुए नुकसान को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अग्रोहा थाना पुलिस ने वर्ष 2016 में राष्ट्रीय राजमार्ग 10 पर सड़क जाम करने और तोड़फोड़ के आरोपों में केस दर्ज किया था। जिसमें 17 लोगों को आरोपी बनाया गया था।
जेएमआईसी अभिषेक गर्ग की अदालत ने 11 सितंबर को यह फैसला सुनाया। जिसके आदेशों की प्रति बुधवार को दी गई। फैसले के अनुसार आरोपियों में जगबीर, झाबर, मणीराम, जगदीश, सचिन पवार, प्रदीप, राजेश पहाड़ी, संजय, ओम प्रकाश, रमेश, सुरेश कुमार, सुल्तान, अनिल गोदारा, राम निवास, अमित ढाका, सुरेंद्र और एक अन्य जगदीश शामिल थे। इन पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम और राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे।
अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि 20 फरवरी 2016 को 50-60 लोगों ने अग्रोहा चौक पर राष्ट्रीय राजमार्ग-10 को अवरुद्ध किया था। उन्होंने वाहनों की आवाजाही रोकी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपना मामला साबित करने में विफल रहा। आरोपियों की पहचान एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, क्योंकि घटना में 100 से 150 लोग शामिल थे।
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कथित तौर पर ली गई तस्वीरें कानून के अनुसार ठीक से पेश और साबित नहीं की गईं, जिससे तस्वीरों के आधार पर पहचान को विश्वसनीय नहीं माना गया। कई स्वतंत्र गवाह अपने बयानों से मुकर गए और अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया। सरकारी संपत्ति को हुए नुकसान की प्रकृति और सीमा को साबित करने के लिए कोई संतोषजनक सबूत नहीं था। पुलिस अधिकारियों के घटनास्थल पर पहुंचने के लिए दर्ज की गई डीडी एंट्री भी रिकॉर्ड पर नहीं थी। पंजाब पुलिस नियम, 1934 के अनुसार, पुलिस अधिकारियों के आगमन और प्रस्थान का रिकॉर्ड दर्ज करना अनिवार्य है। इन कमियों के कारण, अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ दिया और उन्हें बरी कर दिया।
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जेएमआईसी अभिषेक गर्ग की अदालत ने 11 सितंबर को यह फैसला सुनाया। जिसके आदेशों की प्रति बुधवार को दी गई। फैसले के अनुसार आरोपियों में जगबीर, झाबर, मणीराम, जगदीश, सचिन पवार, प्रदीप, राजेश पहाड़ी, संजय, ओम प्रकाश, रमेश, सुरेश कुमार, सुल्तान, अनिल गोदारा, राम निवास, अमित ढाका, सुरेंद्र और एक अन्य जगदीश शामिल थे। इन पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम और राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे।
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अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि 20 फरवरी 2016 को 50-60 लोगों ने अग्रोहा चौक पर राष्ट्रीय राजमार्ग-10 को अवरुद्ध किया था। उन्होंने वाहनों की आवाजाही रोकी और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपना मामला साबित करने में विफल रहा। आरोपियों की पहचान एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, क्योंकि घटना में 100 से 150 लोग शामिल थे।
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कथित तौर पर ली गई तस्वीरें कानून के अनुसार ठीक से पेश और साबित नहीं की गईं, जिससे तस्वीरों के आधार पर पहचान को विश्वसनीय नहीं माना गया। कई स्वतंत्र गवाह अपने बयानों से मुकर गए और अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया। सरकारी संपत्ति को हुए नुकसान की प्रकृति और सीमा को साबित करने के लिए कोई संतोषजनक सबूत नहीं था। पुलिस अधिकारियों के घटनास्थल पर पहुंचने के लिए दर्ज की गई डीडी एंट्री भी रिकॉर्ड पर नहीं थी। पंजाब पुलिस नियम, 1934 के अनुसार, पुलिस अधिकारियों के आगमन और प्रस्थान का रिकॉर्ड दर्ज करना अनिवार्य है। इन कमियों के कारण, अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ दिया और उन्हें बरी कर दिया।