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Rohtak News: घर में नहीं थे संसाधन...1985 में पहली बार मुक्केबाजी में जीता था कांस्य
Fri, 21 Aug 2026 03:27 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
Updated Fri, 21 Aug 2026 03:27 AM IST
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59-धर्मेंद्र सिंह यादव
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संवाद न्यूज एजेंसी
रोहतक। द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता घोषित होने के बाद मुक्केबाजी कोच धर्मेंद्र यादव ने कहा कि वे संतुष्ट हैं लेकिन खुश नहीं हैं। उन्होंने फोन पर अपने उतार-चढ़ाव भरे सफर को साझा किया।
धर्मेंद्र ने 1982 में 10 साल की उम्र में मुक्केबाजी शुरू की थी। पिता का साया हटने के बाद मां ने दिल्ली में तीन बेटों और दो बेटियों का लालन-पालन किया। परिवार बड़ा होने के कारण पर्याप्त संसाधन नहीं थे। 1985 में उन्होंने पहली बार सब जूनियर में कांस्य पदक जीता था।
1986 में वे सब जूनियर चैंपियन बने थे। 1987 में सिर में गंभीर चोट के कारण उन्हें बाहर होना पड़ा। 1988 में उन्होंने पहली बार ओलिंपिक शिविर में भाग लिया। 1989 में उन्हें सीआईएसएफ में नौकरी मिल गई। 1990 में कॉमनवेल्थ में कांस्य पदक हासिल किया था।
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कॅरिअर के महत्वपूर्ण पड़ाव
धर्मेंद्र को 1991 में 18 साल की उम्र में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1992 के बार्सिलोना ओलिंपिक के बाद उन्हें एशिया के सबसे होनहार मुक्केबाज का पुरस्कार मिला था। बाद में उन्होंने पेशेवर मुक्केबाजी शुरू की जिसके कारण उन्हें दो साल का प्रतिबंध भी झेलना पड़ा था। उन्होंने पारंपरिक मुक्केबाजी में अपना आखिरी मुकाबला 1994 में क्यूबा में लड़ा। पेशेवर मुक्केबाजी में वे आखिरी बार 1997 में रिंग में उतरे थे।
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उत्तर प्रदेश के संभल के रहने वाले हैं धर्मेंद्र यादव
साल 2002 में धर्मेंद्र ने कोच के तौर पर अपना कॅरिअर शुरू किया था। 24 साल के इस कॅरिअर में उन्होंने कई मुक्केबाज तैयार किए जिनमें विकास व कृष्ण भी शामिल हैं। विकास मुक्केबाजी में तीन बार ओलिंपिक खेलने वाले दूसरे भारतीय हैं। धर्मेंद्र पांच साल से द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए आवेदन कर रहे थे। वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के संभल जिले के हरफरी गांव के रहने वाले हैं। फिलहाल, वे रोहतक स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण के मुक्केबाजी केंद्र में मुख्य कोच हैं। उनका 15 वर्षीय बेटा वंश भी मुक्केबाजी सीख रहा है।
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रोहतक। द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता घोषित होने के बाद मुक्केबाजी कोच धर्मेंद्र यादव ने कहा कि वे संतुष्ट हैं लेकिन खुश नहीं हैं। उन्होंने फोन पर अपने उतार-चढ़ाव भरे सफर को साझा किया।
धर्मेंद्र ने 1982 में 10 साल की उम्र में मुक्केबाजी शुरू की थी। पिता का साया हटने के बाद मां ने दिल्ली में तीन बेटों और दो बेटियों का लालन-पालन किया। परिवार बड़ा होने के कारण पर्याप्त संसाधन नहीं थे। 1985 में उन्होंने पहली बार सब जूनियर में कांस्य पदक जीता था।
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1986 में वे सब जूनियर चैंपियन बने थे। 1987 में सिर में गंभीर चोट के कारण उन्हें बाहर होना पड़ा। 1988 में उन्होंने पहली बार ओलिंपिक शिविर में भाग लिया। 1989 में उन्हें सीआईएसएफ में नौकरी मिल गई। 1990 में कॉमनवेल्थ में कांस्य पदक हासिल किया था।
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कॅरिअर के महत्वपूर्ण पड़ाव
धर्मेंद्र को 1991 में 18 साल की उम्र में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1992 के बार्सिलोना ओलिंपिक के बाद उन्हें एशिया के सबसे होनहार मुक्केबाज का पुरस्कार मिला था। बाद में उन्होंने पेशेवर मुक्केबाजी शुरू की जिसके कारण उन्हें दो साल का प्रतिबंध भी झेलना पड़ा था। उन्होंने पारंपरिक मुक्केबाजी में अपना आखिरी मुकाबला 1994 में क्यूबा में लड़ा। पेशेवर मुक्केबाजी में वे आखिरी बार 1997 में रिंग में उतरे थे।
उत्तर प्रदेश के संभल के रहने वाले हैं धर्मेंद्र यादव
साल 2002 में धर्मेंद्र ने कोच के तौर पर अपना कॅरिअर शुरू किया था। 24 साल के इस कॅरिअर में उन्होंने कई मुक्केबाज तैयार किए जिनमें विकास व कृष्ण भी शामिल हैं। विकास मुक्केबाजी में तीन बार ओलिंपिक खेलने वाले दूसरे भारतीय हैं। धर्मेंद्र पांच साल से द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए आवेदन कर रहे थे। वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के संभल जिले के हरफरी गांव के रहने वाले हैं। फिलहाल, वे रोहतक स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण के मुक्केबाजी केंद्र में मुख्य कोच हैं। उनका 15 वर्षीय बेटा वंश भी मुक्केबाजी सीख रहा है।