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हिमाचल पुलिस: एआई के जरिये डेटा विश्लेषण कर नशा तस्करों पर होगी कार्रवाई, तकनीक पर काम करने के निर्देश

Fri, 18 Sep 2026 07:10 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 18 Sep 2026 07:10 AM IST
सार
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 नेशनल एंटी-नार्कोटिक्स टास्क फोर्स (एएनटीएफ) की ओर से राज्यों को नशा तस्करी के पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके तहत हिमाचल में डिजिटल फॉरेंसिक, डार्क वेब मॉनिटरिंग, वित्तीय लेनदेन की जांच और विभिन्न मामलों के डेटा को आपस में जोड़कर तस्करी नेटवर्क की पहचान करने पर काम किया जाएगा।

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Action to be taken against drug smugglers using AI-based data analysis; instructions issued to work on the tec
अशोक तिवारी, डीजीपी, हिमाचल - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

 हिमाचल में चिट्टा और दूसरे मादक पदार्थों के नेटवर्क को तोड़ने के लिए पुलिस की जांच में अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डेटा विश्लेषण की भूमिका बढ़ाने की तैयारी है। नेशनल एंटी-नार्कोटिक्स टास्क फोर्स (एएनटीएफ) की ओर से राज्यों को नशा तस्करी के पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके तहत हिमाचल में डिजिटल फॉरेंसिक, डार्क वेब मॉनिटरिंग, वित्तीय लेनदेन की जांच और विभिन्न मामलों के डेटा को आपस में जोड़कर तस्करी नेटवर्क की पहचान करने पर काम किया जाएगा। तकनीकी जांच का मुख्य उद्देश्य किसी आरोपी के पास से बरामद नशे तक कार्रवाई सीमित रखने के बजाय उसके पीछे मौजूद सप्लायर और नेटवर्क तक पहुंचना होगा।

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अलग-अलग मामलों में सामने आए मोबाइल नंबर, संपर्क, वाहनों, बैंकिंग लेनदेन और अन्य डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण कर यह पता लगाने की कोशिश होगी कि किन आरोपियों के बीच लगातार संपर्क रहा है। एआई आधारित डेटा विश्लेषण से बड़ी मात्रा में उपलब्ध जानकारी में आपस में जुड़ी कड़ियों और संदिग्ध पैटर्न की पहचान करने में मदद मिल सकती है। गिरफ्तार आरोपियों से बरामद मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जांच का अहम हिस्सा होंगे।
डिजिटल फॉरेंसिक के जरिये कानून के तहत प्राप्त डेटा का विश्लेषण कर संपर्क, डिजिटल संचार और अन्य प्रासंगिक साक्ष्यों की जांच की जा सकती है।

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अलग-अलग आरोपियों के उपकरणों से मिलने वाले समान संपर्क या डिजिटल कड़ियां सामने आने पर पुलिस को नेटवर्क की संरचना समझने में मदद मिल सकती है। इससे बैकवर्ड लिंकेज के जरिये राज्य से बाहर बैठे सप्लायरों तक जांच ले जाने में भी मदद मिलेगी। नशे की ऑनलाइन खरीद-फरोख्त के लिए इंटरनेट के छिपे हिस्से और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल की आशंका को देखते हुए डार्क वेब मॉनिटरिंग पर भी जोर है। विशेष साइबर टीमें संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधियों और उपलब्ध डिजिटल संकेतों का विश्लेषण कर सकती हैं। ऑनलाइन सामने आने वाली जानकारी को दूसरे डिजिटल और भौतिक साक्ष्यों से मिलाकर यह पता लगाने का प्रयास होगा कि इसके पीछे वास्तविक व्यक्ति या नेटवर्क कौन है।

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अंतरजिला-राज्य ड्रग नेटवर्क की कड़ियां जोड़ेगा एआई
एआई और डेटा विश्लेषण से हिमाचल के अलग-अलग जिलों में दर्ज एनडीपीएस मामलों का एक साथ विश्लेषण किया जा सकेगा। मोबाइल संपर्क, वित्तीय लेनदेन और अन्य समानताओं के आधार पर शिमला, कांगड़ा, कुल्लू, सोलन व ऊना के मामलों में संभावित नेटवर्क की पहचान होगी। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से जुड़ी कड़ियों का भी विश्लेषण किया जा सकेगा। तकनीक जांच की दिशा तय करने में मदद करेगी, लेकिन एआई से मिले संकेत अपराध का प्रमाण नहीं होंगे। कानूनी कार्रवाई के लिए स्वतंत्र जांच और सत्यापित साक्ष्य जरूरी होंगे।

एआई और डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल नशा तस्करी के मामलों में अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाली सूचनाओं को जोड़कर सप्लाई नेटवर्क की पहचान में किया जाएगा। तकनीक जांचकर्ताओं को संभावित कड़ियों तक पहुंचने में मदद करेगी, जबकि कार्रवाई कानून के तहत सत्यापित साक्ष्यों के आधार पर ही होगी। बैकवर्ड लिंकेज की पहचान पर पहले ही काम हो रहा है और इसके अच्छे परिणाम भी मिल रहे हैं।- अशोक तिवारी, डीजीपी, हिमाचल
 

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