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अग्निवीर सेवा विस्तार: नए जवान की भर्ती से कहीं महंगा है अनुभवी जवान खोना, युद्ध के लिहाज से कुशल योद्धा जरूरी

Thu, 05 Nov 2026 05:00 AM IST
Ashutosh Bhatia आशुतोष भाटिया
Updated Thu, 05 Nov 2026 05:00 AM IST
सार
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अग्निपथ योजना के तहत चार साल की सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों को दो साल का सेवा विस्तार देने के फैसले को सेना की परिचालन जरूरतों से जोड़कर देखा जा रहा है। आधुनिक युद्ध में ड्रोन और तकनीक आधारित हथियारों के बढ़ते इस्तेमाल ने सैनिकों के प्रशिक्षण और अनुभव का महत्व बढ़ा दिया है।

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सेना की ऑपरेशनल जरूरत और अनुभवी जवानों पर फोकस - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सेना में एक जवान की भर्ती करना और उसे एक कुशल योद्धा के तौर पर तैयार करना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। भर्ती के बाद प्रशिक्षण, हथियारों में दक्षता, फील्ड का अनुभव और यूनिट के साथ तालमेल बनाने में एक लंबा समय लगता है। ऐसे में कोई प्रशिक्षित अग्निवीर जब इन सब कसौटियों पर खरा उतरने लगता है, तभी उसका सेना से बाहर हो जाना सैन्य संसाधनों के इस्तेमाल के लिहाज से एक चुनौती बन जाता है।
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अग्निपथ योजना के तहत चार साल की सेवा पूरी करने वाले अग्निवीरों को दो साल के सेवा विस्तार के ताजा फैसले को सेना की इसी जरूरत की दृष्टि से देखा जा सकता है। सेना के सूत्रों ने बताया कि यही बात उच्च स्तर पर महसूस की जा रही थी।
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सैनिकों की भूमिका क्यों हुई जटिल?
आधुनिक युद्ध में ड्रोन, स्वायत्त हथियार प्रणालियों और तकनीक-आधारित सैन्य उपकरणों ने सैनिकों की भूमिका को पहले से ज्यादा जटिल बनाया है। ऐसे में हथियारों की तकनीकी जानकारी और उनका इस्तेमाल करने का अनुभव बेहद अहम है। एक नए जवान को सहज होने और सेना की कार्यप्रणाली समझने में समय लगता है। सैनिकों के प्रशिक्षण पर किए गए निवेश का वास्तविक लाभ तब मिलता है जब प्रशिक्षित जवान लंबे समय तक अपने कौशल का इस्तेमाल सेना के लिए कर पाए। 
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यूनिट का तालमेल
सेना में किसी भी यूनिट की प्रभावशीलता जवानों के आपसी तालमेल, एक-दूसरे की कार्यशैली की गहरी समझ और सामूहिक अनुभव पर टिकी होती है। अनुभवी जवान मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन करने के अलावा नए सैनिकों को कठिन सैन्य परिस्थितियों में ढालने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।


सीडीएस ने यह घोषणा करते समय कहा कि यह निर्णय काफी गहरे विचार-विमर्श और समीक्षा के बाद लिया गया है। इस फैसले से सेना की ऑपरेशनल दक्षता और संस्थागत जरूरत दोनों साधे गए हैं। दरअसल, सेना में लंबे समय से महसूस किया जा रहा था कि अनुभवी सैनिकों का साथ रहना युद्धक क्षमताएं बनाए रखने के लिहाज से अहम है।
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