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हवा में घुला जहर दिमाग पर भी भारी: मानसिक स्वास्थ्य के लिए वायु प्रदूषण खतरनाक, बढ़ा रहा आत्मघाती विचार
Thu, 17 Sep 2026 05:08 AM IST
राकेश कुमार
अमर उजाला रिसर्च, नई दिल्ली/बेलफास्ट।
अमर उजाला रिसर्च, नई दिल्ली/बेलफास्ट।
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 17 Sep 2026 05:08 AM IST
वायु प्रदूषण का असर फेफड़ों और दिल के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के विश्लेषण में पीएम2.5, पीएम10 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड समेत कुछ प्रदूषकों के संपर्क को आत्मघाती विचारों, आत्महत्या के प्रयास और आत्महत्या के जोखिम से जोड़ा गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रदूषित कण नाक और खून के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचकर सूजन और तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे मूड और तनाव सहने की क्षमता प्रभावित होती है।
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वायु प्रदूषण का मानसिक स्वास्थ्य पर असर
- फोटो : Amarujala.com/AI
विस्तार
वायु प्रदूषण का असर श्वसन तंत्र या दिल तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका बेहद घातक असर पड़ रहा है। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से आत्महत्या के जोखिम, आत्महत्या के प्रयास और आत्मघाती विचारों में बढ़ोतरी हो सकती है।
इस शोध में क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के 29 से अधिक अध्ययनों का विश्लेषण किया है और उसके आधार पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट में यह दावा किया है। अध्ययन जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने पाया कि हवा में मौजूद कुछ खास प्रदूषक तत्वों का सीधा संबंध मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने और आत्मघाती व्यवहार से है।
सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन और ध्वनि प्रदूषण भी वजह
अध्ययन के मुताबिक हवा में मौजूद पीएम2.5 व पीएम10 जैसे छोटे कणों के अल्पकालिक और दीर्घकालिक संपर्क में आने से मानसिक स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर पड़ता है, जिससे व्यक्ति में मानसिक अवसाद व आत्महत्या का जोखिम काफी बढ़ जाता है। वहीं, मुख्य रूप से वाहनों के धुएं और जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) के जलने से पैदा होने वाली नाइट्रोजन डाइऑक्साइड गैस के लंबे समय तक संपर्क में रहने और आत्मघाती विचारों के बीच गहरा संबंध देखा गया है। इसके अलावा सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन और ध्वनि प्रदूषण को भी मानसिक तनाव और आत्महत्या के जोखिम से जुड़ा हुआ पाया गया है। अध्ययन पर और भी देशों से डाटा जुटाया जा रहा है और जल्द ही इस पर एक और रिपोर्ट पेश की जाएगी।
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नाक और खून से मस्तिष्क तक पहुंच
वैज्ञानिकों के अनुसार, वायु प्रदूषण सिर्फ फेफड़ों या दिल को ही नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि यह नाक और खून के जरिये मस्तिष्क तक पहुंच सकता है। प्रदूषित हवा के कण दिमाग में क्रॉनिक सूजन और नसों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह सूजन व्यक्ति के मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, मूड को नियंत्रित करने की क्षमता और मानसिक तनाव को सहने की शक्ति को कमजोर कर देती है।
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इस शोध में क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के 29 से अधिक अध्ययनों का विश्लेषण किया है और उसके आधार पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट में यह दावा किया है। अध्ययन जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने पाया कि हवा में मौजूद कुछ खास प्रदूषक तत्वों का सीधा संबंध मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने और आत्मघाती व्यवहार से है।
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सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन और ध्वनि प्रदूषण भी वजह
अध्ययन के मुताबिक हवा में मौजूद पीएम2.5 व पीएम10 जैसे छोटे कणों के अल्पकालिक और दीर्घकालिक संपर्क में आने से मानसिक स्वास्थ्य पर बेहद बुरा असर पड़ता है, जिससे व्यक्ति में मानसिक अवसाद व आत्महत्या का जोखिम काफी बढ़ जाता है। वहीं, मुख्य रूप से वाहनों के धुएं और जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) के जलने से पैदा होने वाली नाइट्रोजन डाइऑक्साइड गैस के लंबे समय तक संपर्क में रहने और आत्मघाती विचारों के बीच गहरा संबंध देखा गया है। इसके अलावा सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन और ध्वनि प्रदूषण को भी मानसिक तनाव और आत्महत्या के जोखिम से जुड़ा हुआ पाया गया है। अध्ययन पर और भी देशों से डाटा जुटाया जा रहा है और जल्द ही इस पर एक और रिपोर्ट पेश की जाएगी।
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नाक और खून से मस्तिष्क तक पहुंच
वैज्ञानिकों के अनुसार, वायु प्रदूषण सिर्फ फेफड़ों या दिल को ही नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि यह नाक और खून के जरिये मस्तिष्क तक पहुंच सकता है। प्रदूषित हवा के कण दिमाग में क्रॉनिक सूजन और नसों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह सूजन व्यक्ति के मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, मूड को नियंत्रित करने की क्षमता और मानसिक तनाव को सहने की शक्ति को कमजोर कर देती है।