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एक्सप्लेनर: अरुणाचल में ब्रह्मपुत्र पर बन रहे बांध के खिलाफ क्यों उतरे लोग, चीन के खतरे के बावजूद क्यों विरोध?

Tue, 13 Oct 2026 06:39 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 13 Oct 2026 06:39 PM IST
सार
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अरुणाचल प्रदेश में जिस प्रोजेक्ट पर विवाद की स्थिति बनी है, वह क्या है? क्यों इस प्रोजेक्ट को चीन की तरफ से ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए जाने वाले दुनिया के सबसे बडे़ बांध का जवाब माना जा रहा है? अरुणाचल प्रदेश में इस प्रोजेक्ट का विरोध क्यों हो रहा है? क्षेत्र में हिंसा क्यों फैल गई? सरकार इस प्रोजेक्ट को लेकर कैसे बात आगे बढ़ा रही है? 

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Arunachal Pradesh Dam Siang Upper Multipurpose Project Protests China Medog Dam Brahmaputra India explained
चीन के मेदोग बांध के प्रभावों को कम करने के लिए प्रस्तावित सियांग प्रोजेक्ट पर विवाद। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अरुणाचल प्रदेश में इस वक्त माहौल काफी संवेदनशील है। दरअसल, यहां सियांग जिले में एक बांध का निर्माण शुरू हो पाने से पहले ही स्थानीय लोगों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। आलम यह है कि बीते एक महीने से जारी विरोध प्रदर्शन हिंसक तक हो चुके हैं और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू की तरफ से लोगों को समझाने की कोशिश काफी हद तक बेनतीजा रही है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच अपर सियांग जिला प्रशासन ने हालात बिगड़ने की आशंका जताते हुए बीएनएसएस की धारा 163 लगाने का एलान कर दिया है। 
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इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह जानना अहम है कि आखिर अरुणाचल प्रदेश में जिस प्रोजेक्ट पर विवाद की स्थिति बनी है, वह क्या है? क्यों इस प्रोजेक्ट को चीन की तरफ से ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए जाने वाले दुनिया के सबसे बडे़ बांध का जवाब माना जा रहा है?अरुणाचल प्रदेश में इस प्रोजेक्ट का विरोध क्यों हो रहा है? क्षेत्र में हिंसा क्यों फैल गई? सरकार इस प्रोजेक्ट को लेकर कैसे बात आगे बढ़ा रही है? आइये जानते हैं...
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अरुणाचल प्रदेश में जिस प्रोजेक्ट पर विवाद की स्थिति बनी है, वह क्या है? 

अरुणाचल प्रदेश में जिस परियोजना को लेकर विवाद और विरोध की स्थिति बनी हुई है, वह ऊपरी सियांग बहुउद्देशीय परियोजना (अपर सियांग मल्टीपर्पस प्रोजेक्ट) है। यह परियोजना अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सियांग जिले में सियांग नदी (ब्रह्मपुत्र) पर प्रस्तावित है। इस परियोजना का मकसद ब्रह्मपुत्र नदी के तेज बहाव से न सिर्फ ऊर्जा पैदा करना है, बल्कि इसके पानी का भंडारण करना भी है, ताकि ज्यादा बारिश और ऊपर से पानी छोड़े जाने की स्थिति में बाढ़ के हालात न बनें। साथ ही लोगों के लिए पीने लायक शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जा सके। इसे नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (एनएचपीसी) की ओर से विकसित किए जाने की योजना है। 
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Arunachal Pradesh Dam Siang Upper Multipurpose Project Protests China Medog Dam Brahmaputra India explained
चीन के तिब्बत में बन रहे बांध से भारत चिंतित। - फोटो : अमर उजाला

चीन के किस खतरे को कम के लिए अहम है यह बांध?

अपर सियांग पर जिस बांध के निर्माण के लिए केंद्र और अरुणाचल सरकार की तरफ से कोशिशें की जा रही हैं, उसका मुख्य मकसद से चीन की ओर से तिब्बत में यारलुंग सांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदी पर बनाए जा रहे बांध से पैदा होने वाले खतरों से निपटना है। 60,000 मेगावॉट की क्षमता वाले के चीन के मेदोग बांध से पैदा होने वाले रणनीतिक और पर्यावरणीय खतरों का मुकाबला करने के लिए अपर सियांग में बन रहे बांध की अहमियत और ज्यादा बढ़ जाती है।
 

क्या-क्या खतरे पैदा कर सकता है तिब्बत में बन रहा चीन का बांध?

1. अचानक पानी छोड़े जाने और बाढ़ का खतरा
  • अगर चीन ऊपरी क्षेत्र से अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ता है या किसी और वजह से जल प्रवाह होता है, तो अरुणाचल प्रदेश और निचले असम के क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ आने का जोखिम है। 
  • राज्य के नेताओं का कहना है कि चीन का यह विशाल बांध एक संभावित वॉटर बम की तरह काम कर सकता है। भारत की सियांग परियोजना इसी खतरे को रोकने और नियंत्रित करने के लिए 'सुरक्षा बफर' का काम करेगी।
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2. पानी रोकने या मोड़ने से सूखे का हो सकता है खतरा
  • अंतरराष्ट्रीय जल सम्मेलनों के तहत किसी संधि या समझौते से बाध्य न होने के कारण चीन पर जल साझा करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। 
  • आशंका है कि चीन अपने बांध के जरिए पानी को तिब्बत के शुष्क क्षेत्रों में मोड़ सकता है या बिजली उत्पादन की दैनिक जरूरतों के आधार पर जल प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है। 
  • ऐसे में भारत में बन रहा बांध अपनी बड़ी भंडारण क्षमता के चलते शुष्क महीनों के दौरान निचले क्षेत्रों के लिए लगातार जल प्रवाह और जल सुरक्षा बनाए रखेगा।

3. प्राकृतिक आपदाओं  का जोखिम
यह हिमालयी क्षेत्र भूकंप-संवेदनशील है। अगर तिब्बत में भूकंप, भूस्खलन या ग्लेशियर झील टूटने जैसी घटनाओं से ऊपरी बांध को नुकसान पहुंचता है, तो अचानक आने वाले भारी जल प्रवाह को सुरक्षित रूप से संभालने के लिए निचले क्षेत्र में एक बड़े बफर जलाशय की जरूरत है।

4. जल भंडारण क्षमता का रणनीतिक अंतर
चीन के मेदोग बांध की बिजली उत्पादन क्षमता- 60,000 मेगावॉट भारत की सियांग परियोजना- 11,000–11,200 मेगावॉट से करीब छह गुना है। हालांकि, जल भंडारण के मामले में भारत की परियोजना का आकार बड़ा प्रस्तावित है।

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अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर प्रस्तावित बांध। - फोटो : अमर उजाला

अरुणाचल प्रदेश में इस प्रोजेक्ट का विरोध क्यों हो रहा है?

अरुणाचल प्रदेश में ऊपरी सियांग परियोजना का विरोध स्थानीय लोगों की तरफ से ही हो रहा है। इन लोगों की तरफ से बड़े पैमाने पर विस्थापन और अपनी पारंपरिक-पैतृक जमीन को खोने का डर जताया गया है। इसके अलावा बांध के बनने से पर्यावरण से जुड़े खतरों को लेकर भी कई संगठन ने चेतावनी दी है। 

1. किसानों की नाराजगी
  • स्थानीय किसान संगठन- सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम (एसआईएफएफ) के मुताबिक, इस बांध के जलाशय में लगभग 27 गांव डूब सकते हैं। साथ ही कई और गांव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे।
  • इस परियोजना से एक लाख से डेढ़ लाख लोगों के विस्थापित होने की आशंका जताई जा रही है। ग्रामीणों को डर है कि उनकी उपजाऊ कृषि भूमि, खेत, बागान और आजीविका के साधन खत्म हो जाएंगे।

ये भी पढ़ें: चीन बना रहा विश्व का सबसे बड़ा बांध: 14 लाख करोड़ के डैम से भारत क्यों चिंतित, निपटने की क्या योजना?

2. जनजातीय समुदाय को निवास स्थान खोने का डर 
  • यह क्षेत्र मुख्य रूप से आदि जनजातीय समुदाय का निवास स्थान है, जो सियांग नदी को अने सियांग (देवी सियांग) मानते हैं और इस भूमि को अपने पूर्वज आबो तानी से जुड़ा मानते हैं।
  • स्थानीय समुदायों का मानना है कि इतने बड़े बांध के निर्माण से उनकी सदियों पुरानी पारंपरिक जीवनशैली, सांस्कृतिक पहचान और स्व-निर्णय का अधिकार प्रभावित होगा।

3. पर्यावरण और भूकंप से जुड़े जोखिम
सियांग घाटी पूर्वी हिमालय के अत्यधिक भूकंप-संवेदनशील क्षेत्रमें स्थित है। स्थानीय कार्यकर्ताओं और छात्र संगठनों का तर्क है कि भूकंप, भूस्खलन और जबरदस्त बारिश वाले इस संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्र में इतना विशाल बांध बनाना बड़े पर्यावरणीय और सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है।

4. स्थानीय लोगों की सहमति के बिना सर्वे पर नाराजगी 
स्थानीय लोगों और संगठनों का आरोप है कि अपर सियांग में परियोजना के लिए जो प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट और ड्रिलिंग सर्वे होना था, उसके लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) की तैनाती की गई। इससे स्थानीय लोगों में गहरा असंतोष फैला है।

ग्रामीणों और किसान संगठनों का कहना है कि उनकी पारंपरिक निर्णय संस्थाओं- केबांग और प्रभावित समुदायों से सीधे संवाद और सहमति के बिना सर्वे कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है, जो कि ठीक नहीं है। 

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चीन के मेदोग बांध की लोकेशन। - फोटो : अमर उजाला

कैसे अरुणाचल में इस प्रोजेक्ट का विरोध हिंसा में बदला?

28 सितंबर: सुरक्षा बलों की तैनाती और पहली झड़प 
  • परियोजना के लिए प्रारंभिक तकनीकी सर्वे और ड्रिलिंग का काम शुरू करने के लिए सियांग जिले में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) को तैनात किया गया। 
  • ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सर्वे उनकी पूर्व सहमति के बिना बलपूर्वक कराया जा रहा है। 28 सितंबर को गेकू गांव में ग्रामीणों और जवानों के बीच पहली झड़प हुई।
  • इस झड़प में सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचा। पुलिस ने चार लोगों को हिरासत में लिया। हालांकि, इन्हें बाद में रिहा कर दिया गया।

29-30 सितंबर: मुख्यमंत्री के दौरे का विरोध और सड़क नाकाबंदी
  • मुख्यमंत्री पेमा खांडू, उप मुख्यमंत्री चाउना मीन, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों का दल स्थानीय लोगों और संगठनों से बातचीत के लिए यिंगकियोंग पहुंचा। 
  • प्रदर्शनकारियों में इस बात को लेकर गुस्सा था कि सरकार प्रभावित ग्रामीणों से सीधे वार्ता करने के बजाय बंद कमरों में अधिकारियों के साथ बैठकें आयोजित कर रही थी। 
  • सैकड़ों ग्रामीणों ने 'नो सर्वे' और 'गो बैक सीएम' के बैनर लेकर यिंगकियोंग-कोमकार-गेकू मार्ग और दिते दिमे जाने वाली मुख्य सड़कों को जाम कर दिया।
  • देखते ही देखते यिंगकियोंग में उग्र प्रदर्शनकारी स्थानीय विधायक अलो लिबांग के आवास परिसर में घुस गए और वहां तोड़फोड़ की। यहां कई मंत्री-विधायक ठहरे थे।
  • प्रदर्शनकारियों ने दिते दिमे पुल के पास एक पुलिस वाहन को आग के हवाले कर दिया गया और अलग-अलग स्थानों पर सरकारी और पुलिस वाहनों को क्षतिग्रस्त किया गया।
  • शहर में बने गंभीर तनाव और विरोध की वजह से मुख्यमंत्री पेमा खांडू को अपना दौरा बीच में ही खत्म कर हेलीकॉप्टर से यिंगकियोंग छोड़ना पड़ा।

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भारत और चीन में बन रहे बांध का फर्क। - फोटो : अमर उजाला
4 अक्तूबर: लाठीचार्ज, आंसू गैस और कड़े कानून
  • सियांग जिले में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच फिर हिंसक टकराव हुआ। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिससे कई पुलिसकर्मी और ग्रामीण घायल हुए।
  • प्रशासन ने यिंगकियोंग में बीएनएसएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की और 10 अक्तूबर को विरोध प्रदर्शन कर रहे चार लोगों को अरुणाचल प्रदेश यूएपीए के तहत हिरासत में ले लिया।


सरकार इस प्रोजेक्ट को लेकर कैसे बात आगे बढ़ा रही है? 

1. राज्य सरकार की तरफ से क्या प्रयास?
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने स्पष्ट किया है कि सरकार के दरवाजे संवाद के लिए हमेशा खुले हैं। उन्होंने कहा कि सरकार जनता के सभी सवालों और आशंकाओं का जवाब देने के लिए तैयार है और जरूरत पड़ने पर कई दिनों तक जमीनी स्तर पर रुककर संवाद करने को तत्पर है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि अगर परियोजना तकनीकी रूप से उपयुक्त नहीं पाई जाती या जनहित के विरुद्ध होती है, तो इसे जबरन लागू नहीं किया जाएगा।

इस बीच राज्य मंत्रिमंडल ने ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री ओजिंग तासिंग की अध्यक्षता में एक सशक्त उच्च-स्तरीय समिति को मंजूरी दी है। यह समिति प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट की प्रक्रिया की निगरानी, सर्वेक्षण कार्यों का समन्वय और स्थानीय समुदायों और विरोध कर रहे संगठनों के साथ संवाद कायम करेगी।

सरकार ने स्थानीय अधिकारियों, कर्मचारियों और पंचायत प्रतिनिधियों से अपील की है कि वे आदि समुदाय के ग्रामीणों के बीच जाकर परियोजना के महत्व और जल सुरक्षा के फायदों के बारे में जागरूकता फैलाएं। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि प्रोजेक्ट का विरोध करने या अशांति फैलाने वाले सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए, क्योंकि वे सरकारी नीतियों का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

2. केंद्र सरकार की तरफ से कोशिशें?
  • दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी आदि समुदाय के वरिष्ठ सदस्यों और नेताओं से अपील की है कि सभी मुद्दों को तकनीकी रूप से समझने और सुलझाने के लिए सीधे बैठकर चर्चा की जाए।
  • सरकार जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि मौजूदा ड्रिलिंग और सर्वे केवल तीन महीने का प्री-फिजिबिलिटी सर्वे है, जो बांध निर्माण की अंतिम स्वीकृति नहीं है।
  • सरकार के मुताबिक, अगर पीएफआर में परियोजना तकनीकी रूप से ठीक पाई जाती है, तभी आगे सामाजिक प्रभाव, पर्यावरण पर प्रभाव, डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट और जनसुनवाई जैसी प्रक्रियाएं होंगी।
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