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ओबीसी क्रीमी लेयर: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से मांगा दो साल का समय, कहा- तुरंत लागू हुआ फैसला तो बढ़ेगी मुश्किल

Thu, 24 Sep 2026 08:22 PM IST
शिवम गर्ग पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Thu, 24 Sep 2026 08:22 PM IST
सार
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ओबीसी क्रीमी लेयर मानदंड पर सुप्रीम कोर्ट के मार्च के फैसले को लेकर केंद्र ने दो साल का समय मांगा है। सरकार का कहना है कि फैसले को तुरंत पुराने और जारी भर्ती मामलों पर लागू करने से नियुक्ति, वरिष्ठता और कैडर आवंटन प्रभावित हो सकते हैं। 

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Centre Seeks Two-Year Window for Prospective Application of SC OBC Creamy Layer Verdict
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। केंद्र ने 11 मार्च 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भविष्य की तारीख से लागू करने की मांग की है। सरकार का कहना है कि फैसले को तत्काल पुराने और जारी भर्ती मामलों पर लागू करने से नियुक्तियों, वरिष्ठता और कैडर आवंटन से जुड़ी स्थिति प्रभावित हो सकती है।
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दो साल का समय देने की मांग
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने यह मामला रखा। सरकार ने अदालत से फैसले को लागू करने के लिए दो साल का समय देने की मांग की है। केंद्र का कहना है कि इस अवधि में प्रशासनिक स्तर पर जरूरी बदलाव किए जा सकेंगे और पुराने व जारी भर्ती मामलों को व्यवस्थित तरीके से निपटाया जा सकेगा।
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क्या था सुप्रीम कोर्ट का 11 मार्च का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में 11 मार्च को कहा था कि पीएसयू या निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता की सैलरी या आय को अकेले ओबीसी क्रीमी लेयर से बाहर रखने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत के अनुसार, क्रीमी लेयर तय करते समय माता-पिता के पद की स्थिति और 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम में निर्धारित आय या संपत्ति संबंधी मानदंडों को भी ध्यान में रखना होगा।
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इस फैसले में अदालत ने उस व्यवस्था पर सवाल उठाया था जिसमें केवल वेतन आय के आधार पर पीएसयू या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों को ओबीसी आरक्षण से बाहर माना जा सकता था।

केंद्र ने क्यों मांगी फैसले की भावी प्रभाव से लागू करने की अनुमति?
केंद्र का कहना है कि फैसले को पुराने मामलों पर तुरंत लागू करने से ऐसे कर्मचारियों या नियुक्त उम्मीदवारों पर असर पड़ सकता है, जो मूल मुकदमे का हिस्सा नहीं थे। सरकार ने आशंका जताई है कि इससे नियुक्तियां, वरिष्ठता, कैडर आवंटन और पहले से तय अधिकारों में बदलाव की स्थिति पैदा हो सकती है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 'सीमित संभावित अधिनिर्णय' की मांग की है। यानी फैसले को कमजोर करने के बजाय उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन को सीमित अवधि के लिए आगे बढ़ाने का अनुरोध किया गया है।

हाईकोर्ट में लंबित मामलों का भी मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की ओर से दी गई दलीलों पर ध्यान दिया कि अलग-अलग हाईकोर्ट में इस फैसले से जुड़े मामले भी सामने आए हैं। केंद्र ने इन मामलों को सुप्रीम कोर्ट या किसी एक हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग भी रखी है। इससे पहले अगस्त में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से मार्च के फैसले की सीएसई 2025 के उम्मीदवारों पर लागू होने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था। उस मामले में सरकार ने कहा था कि मार्च का फैसला सीएसई 2025 का अंतिम परिणाम घोषित होने के कुछ दिन बाद आया था, जिससे भर्ती प्रक्रिया और सेवा आवंटन प्रभावित हो सकता है।


फैसले को बदलने की मांग नहीं
केंद्र की मौजूदा याचिका में मार्च के फैसले को कमजोर या खत्म करने की मांग नहीं की गई है। सरकार का कहना है कि फैसले के संचालन को कुछ समय के लिए टालने से प्रशासन को भर्ती प्रक्रियाओं और इससे जुड़े अधिकारों को व्यवस्थित करने का अवसर मिलेगा।
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