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'श्रमिक सुरक्षा कमजोर होने का खतरा': सुप्रीम कोर्ट ने बदली उद्योग की परिभाषा, कांग्रेस ने उठाए सवाल; क्या कहा?
Sat, 22 Aug 2026 11:36 AM IST
Devesh Tripathi
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 22 Aug 2026 11:36 AM IST
कांग्रेस ने औद्योगिक संबंधों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर चिंता जताई है। पार्टी का कहना है कि ‘उद्योग’ की परिभाषा को संकीर्ण करने से श्रमिकों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण का दायरा प्रभावित हो सकता है। जयराम रमेश ने कहा कि 1978 में स्थापित व्यवस्था ने लंबे समय तक यह तय करने में मदद की कि किन गतिविधियों और कर्मचारियों पर श्रम कानून लागू होंगे।
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कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
कांग्रेस ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर चिंता जताई, जिसमें कहा गया है कि 'उद्योग' शब्द की 1978 में दी गई श्रमिक हितैषी व्याख्या औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत नए मामलों पर लागू नहीं होगी। पार्टी ने कहा कि कानून को 'उद्योग' की व्यापक परिभाषा से सीमित करने या उससे अलग करने की कोई भी कोशिश श्रमिकों के संरक्षण को कमजोर कर सकती है।
कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने दावा किया कि मोदी सरकार की औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ने हमारे श्रमिकों के लिए जरूरी सुरक्षा उपायों को काफी कमजोर कर दिया है।
कांग्रेस ने उठाए क्या सवाल?
जयराम रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की बहुमत वाली पीठ ने 20 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय बीर सिंह मामले में अपने 1978 के चर्चित फैसले में तय 'ट्रिपल टेस्ट' को नए सिरे से तय करने की परिकल्पना की है। यह ट्रिपल टेस्ट फरवरी 1978 के बंगलूरू वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए राजप्पा मामले में तय किया गया था।
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उन्होंने कहा कि 'उद्योग' की व्याख्या का महत्व इस कानूनी स्थिति से जुड़ा है कि कौन 'कामगार' माना जाएगा और इसके आधार पर किसे श्रम कानूनों का संरक्षण मिलेगा। रमेश ने कहा, ''1978 के बंगलूरू वाटर सप्लाई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तत्व बताए थे, जो आम तौर पर किसी उद्योग की पहचान करते हैं। इनमें व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग तथा लोगों की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण शामिल है। हालांकि, पूरी तरह आध्यात्मिक या धार्मिक सेवाओं को इससे बाहर रखा गया था।''
श्रम कानूनों से क्या बदला?
रमेश ने कहा कि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि लाभ कमाना जरूरी नहीं है। धर्मार्थ संस्थाओं या सार्वजनिक निकायों की गतिविधियां भी 'उद्योग' की परिभाषा में आ सकती हैं। रमेश के मुताबिक, इसका एकमात्र अपवाद संप्रभु कार्य थे, जैसे न्यायपालिका, कानून-व्यवस्था और रक्षा से जुड़े काम।
उन्होंने कहा, ''करीब पांच दशकों तक इस ट्रिपल टेस्ट ने यह तय करने के लिए व्यापक और स्थापित व्यवस्था दी कि क्या 'उद्योग' के दायरे में आता है। इससे पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत बड़ी संख्या में श्रमिकों को श्रम कानूनों का संरक्षण मिला।''
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस को क्यों नहीं भरोसा?
रमेश ने कहा कि 2026 के बहुमत वाले फैसले ने इस व्यवस्था को दो अहम तरीकों से सीमित किया है। इसके तहत किसी गतिविधि में व्यापार या कारोबार जैसी ''स्पष्ट व्यावसायिक प्रकृति'' होना जरूरी माना गया है। यह पुरानी व्यवस्था में मौजूद अतिरिक्त शर्त नहीं थी। उन्होंने कहा कि फैसले में संप्रभु कार्यों के अपवाद का दायरा भी बढ़ाया गया है। इससे सरकार की कई अन्य गतिविधियां 'उद्योग' की परिभाषा से बाहर हो सकती हैं।
रमेश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह नई व्याख्या पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत पहले से निपट चुके या लंबित मामलों को प्रभावित नहीं करेगी। यह औद्योगिक संबंध संहिता की व्याख्या पर भी लागू नहीं होगी। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद इस ''परिकल्पना'' को फैसले में दर्ज किए जाने से व्याख्या को लेकर खाली जगह बनती है। इससे खासकर श्रम अदालतों और औद्योगिक न्यायाधिकरणों के सामने मुकदमों और अनिश्चितता का नया दौर शुरू हो सकता है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना के फैसले को कांग्रेस ने क्यों बताया साहसिक?
रमेश ने तर्क दिया कि इससे व्यवहार में 'उद्योग' की संकीर्ण परिभाषा को जगह मिल सकती है। खासकर तब, जब औद्योगिक संबंध संहिता पहले ही केंद्र सरकार को अपने दायरे से प्रतिष्ठानों की कुछ और श्रेणियों को बाहर रखने का अधिकार देती है।
कांग्रेस नेता ने कहा, ''न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना का असहमति वाला फैसला हमेशा की तरह साहसिक, स्पष्ट और प्रभावी है। उन्होंने कहा है कि बंगलूरू वाटर सप्लाई मामले में तय ट्रिपल टेस्ट पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं थी और न्यायिक निश्चितता के हित में स्थापित कानून को बदलने से बचने की चेतावनी दी है।''
कांग्रेस ने दिया क्या तर्क?
रमेश ने कहा कि न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी सही कहा है कि पुराने कानून के तहत स्थापित न्यायिक व्यवस्था नए कोड की व्याख्या में मदद कर सकती है। इसके बजाय नए कोड का इस्तेमाल पुराने कानून के तहत स्थापित व्यवस्था को फिर से खोलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगस्त 2026 का बहुमत वाला फैसला चिंता का विषय है, क्योंकि ऐसे समय में श्रम संबंधों में अनिश्चितता बढ़ रही है जब औद्योगिक शांति के लिए स्पष्टता जरूरी है।
रमेश ने कहा, ''बढ़ती निजी सेवा व्यवस्था वाली खुली अर्थव्यवस्था में कानून को 'उद्योग' की व्यापक परिभाषा से सीमित करने या उससे अलग करने की कोई भी कोशिश श्रमिक सुरक्षा को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती है, ठीक उस समय जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।''
सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था क्या फैसला?
इससे पहले गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा था कि 'उद्योग' शब्द की उसकी 48 साल पुरानी व्यापक और श्रमिक हितैषी व्याख्या औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत नए मामलों पर लागू नहीं होगी। फैसला सुनाते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि 1978 के फैसले में न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर द्वारा विकसित 'ट्रिपल टेस्ट' यह तय करने के लिए वैध रहेगा कि कोई गतिविधि 'उद्योग' है या नहीं।
उन्होंने कहा कि मौजूदा फैसले में 'ट्रिपल टेस्ट' को परिष्कृत किया गया है, लेकिन इसका इस्तेमाल अब निरस्त हो चुके औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लंबित या पहले ही तय हो चुके मामलों में नहीं किया जा सकता। बहुमत के फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि अदालत ने औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 पर विचार नहीं किया है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''2020 के कोड की धारा 2(पी) में 'उद्योग' का भविष्य 1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(जे) की व्याख्या से प्रभावित नहीं है।'' उन्होंने कहा, ''नतीजतन, 1947 के अधिनियम के तहत अदालतों, न्यायाधिकरणों, श्रम अधिकारियों या किसी अन्य मंच के सामने लंबित मामलों का फैसला बंगलूरू वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड (1978) के फैसले में धारा 2(जे) की की गई व्याख्या के अनुसार किया जाना चाहिए।''
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कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने दावा किया कि मोदी सरकार की औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ने हमारे श्रमिकों के लिए जरूरी सुरक्षा उपायों को काफी कमजोर कर दिया है।
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कांग्रेस ने उठाए क्या सवाल?
जयराम रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की बहुमत वाली पीठ ने 20 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय बीर सिंह मामले में अपने 1978 के चर्चित फैसले में तय 'ट्रिपल टेस्ट' को नए सिरे से तय करने की परिकल्पना की है। यह ट्रिपल टेस्ट फरवरी 1978 के बंगलूरू वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए राजप्पा मामले में तय किया गया था।
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उन्होंने कहा कि 'उद्योग' की व्याख्या का महत्व इस कानूनी स्थिति से जुड़ा है कि कौन 'कामगार' माना जाएगा और इसके आधार पर किसे श्रम कानूनों का संरक्षण मिलेगा। रमेश ने कहा, ''1978 के बंगलूरू वाटर सप्लाई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तत्व बताए थे, जो आम तौर पर किसी उद्योग की पहचान करते हैं। इनमें व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग तथा लोगों की जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण शामिल है। हालांकि, पूरी तरह आध्यात्मिक या धार्मिक सेवाओं को इससे बाहर रखा गया था।''
श्रम कानूनों से क्या बदला?
रमेश ने कहा कि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि लाभ कमाना जरूरी नहीं है। धर्मार्थ संस्थाओं या सार्वजनिक निकायों की गतिविधियां भी 'उद्योग' की परिभाषा में आ सकती हैं। रमेश के मुताबिक, इसका एकमात्र अपवाद संप्रभु कार्य थे, जैसे न्यायपालिका, कानून-व्यवस्था और रक्षा से जुड़े काम।
उन्होंने कहा, ''करीब पांच दशकों तक इस ट्रिपल टेस्ट ने यह तय करने के लिए व्यापक और स्थापित व्यवस्था दी कि क्या 'उद्योग' के दायरे में आता है। इससे पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत बड़ी संख्या में श्रमिकों को श्रम कानूनों का संरक्षण मिला।''
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस को क्यों नहीं भरोसा?
रमेश ने कहा कि 2026 के बहुमत वाले फैसले ने इस व्यवस्था को दो अहम तरीकों से सीमित किया है। इसके तहत किसी गतिविधि में व्यापार या कारोबार जैसी ''स्पष्ट व्यावसायिक प्रकृति'' होना जरूरी माना गया है। यह पुरानी व्यवस्था में मौजूद अतिरिक्त शर्त नहीं थी। उन्होंने कहा कि फैसले में संप्रभु कार्यों के अपवाद का दायरा भी बढ़ाया गया है। इससे सरकार की कई अन्य गतिविधियां 'उद्योग' की परिभाषा से बाहर हो सकती हैं।
रमेश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह नई व्याख्या पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत पहले से निपट चुके या लंबित मामलों को प्रभावित नहीं करेगी। यह औद्योगिक संबंध संहिता की व्याख्या पर भी लागू नहीं होगी। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद इस ''परिकल्पना'' को फैसले में दर्ज किए जाने से व्याख्या को लेकर खाली जगह बनती है। इससे खासकर श्रम अदालतों और औद्योगिक न्यायाधिकरणों के सामने मुकदमों और अनिश्चितता का नया दौर शुरू हो सकता है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना के फैसले को कांग्रेस ने क्यों बताया साहसिक?
रमेश ने तर्क दिया कि इससे व्यवहार में 'उद्योग' की संकीर्ण परिभाषा को जगह मिल सकती है। खासकर तब, जब औद्योगिक संबंध संहिता पहले ही केंद्र सरकार को अपने दायरे से प्रतिष्ठानों की कुछ और श्रेणियों को बाहर रखने का अधिकार देती है।
कांग्रेस नेता ने कहा, ''न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना का असहमति वाला फैसला हमेशा की तरह साहसिक, स्पष्ट और प्रभावी है। उन्होंने कहा है कि बंगलूरू वाटर सप्लाई मामले में तय ट्रिपल टेस्ट पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं थी और न्यायिक निश्चितता के हित में स्थापित कानून को बदलने से बचने की चेतावनी दी है।''
कांग्रेस ने दिया क्या तर्क?
रमेश ने कहा कि न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी सही कहा है कि पुराने कानून के तहत स्थापित न्यायिक व्यवस्था नए कोड की व्याख्या में मदद कर सकती है। इसके बजाय नए कोड का इस्तेमाल पुराने कानून के तहत स्थापित व्यवस्था को फिर से खोलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगस्त 2026 का बहुमत वाला फैसला चिंता का विषय है, क्योंकि ऐसे समय में श्रम संबंधों में अनिश्चितता बढ़ रही है जब औद्योगिक शांति के लिए स्पष्टता जरूरी है।
रमेश ने कहा, ''बढ़ती निजी सेवा व्यवस्था वाली खुली अर्थव्यवस्था में कानून को 'उद्योग' की व्यापक परिभाषा से सीमित करने या उससे अलग करने की कोई भी कोशिश श्रमिक सुरक्षा को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती है, ठीक उस समय जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।''
सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था क्या फैसला?
इससे पहले गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा था कि 'उद्योग' शब्द की उसकी 48 साल पुरानी व्यापक और श्रमिक हितैषी व्याख्या औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत नए मामलों पर लागू नहीं होगी। फैसला सुनाते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि 1978 के फैसले में न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर द्वारा विकसित 'ट्रिपल टेस्ट' यह तय करने के लिए वैध रहेगा कि कोई गतिविधि 'उद्योग' है या नहीं।
उन्होंने कहा कि मौजूदा फैसले में 'ट्रिपल टेस्ट' को परिष्कृत किया गया है, लेकिन इसका इस्तेमाल अब निरस्त हो चुके औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत लंबित या पहले ही तय हो चुके मामलों में नहीं किया जा सकता। बहुमत के फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि अदालत ने औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 पर विचार नहीं किया है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''2020 के कोड की धारा 2(पी) में 'उद्योग' का भविष्य 1947 के औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2(जे) की व्याख्या से प्रभावित नहीं है।'' उन्होंने कहा, ''नतीजतन, 1947 के अधिनियम के तहत अदालतों, न्यायाधिकरणों, श्रम अधिकारियों या किसी अन्य मंच के सामने लंबित मामलों का फैसला बंगलूरू वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड (1978) के फैसले में धारा 2(जे) की की गई व्याख्या के अनुसार किया जाना चाहिए।''