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एक्सप्लेनर: दिल्ली में 7 दशक पहले लग गया था हवा घातक होने का अनुमान, निपटने के लिए उठे कितने कदम; कैसे नाकाम?
Tue, 27 Oct 2026 09:57 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 27 Oct 2026 09:57 AM IST
दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर पहली बार कब और क्या कहा गया? आगे के कुछ दशकों में किस तरह जहरीली हवा के इस खतरे को लेकर चेताया जाता रहा? इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों की ओर से कब और कौन से कदम उठाए गए? इनका असर कितना रहा? मौजूदा संकट की स्थिति में वायु प्रदूषण को सीमित करने के लिए आगे की क्या योजना है? आइये जानते हैं...
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कैसे सुधरेगी दिल्ली की हवा?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
दिल्ली में हर साल सर्दी का सीजन शुरू होने के साथ ही वायु प्रदूषण का खतरा लोगों में डर पैदा कर देता है। खासकर बुजुर्गों और बच्चों के लिए। दरअसल, जैसे-जैसे हवा की गुणवत्ता खराब होती है, वैसे ही सरकार, चिकित्सकों और विशेषज्ञों की तरफ से स्वास्थ्य चेतावनियां जारी कर दी जाती हैं। लोगों को मास्क पहनकर निकलने या घर पर ही रहने की सलाह दी जाती है, ताकि उनके फेफड़े हवा में मौजूद छोटे कणों (पीएम 2.5 और पीएम 10) से प्रभावित न हों। हालांकि, जो डर आज सरकार से लेकर आम लोगों तक फैला है, वह न तो आधुनिक समय का है और न ही इससे जारी जंग हालिया वक्त की है। अगर अवधि और डेटा की बात की जाए तो सामने आता है कि 1950 के दशक में ही राजधानी की हवा को लेकर चिंता जता दी गई थी और अगले कुछ साल ऐसी ही चेतावनियों और हवा ठीक करने की कोशिशों का दौर जारी रहा।
दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर पहली बार कब और क्या कहा गया? आगे के कुछ दशकों में किस तरह जहरीली हवा के इस खतरे को लेकर चेताया जाता रहा? इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों की ओर से कब और कौन से कदम उठाए गए? इनका असर कितना रहा? मौजूदा संकट की स्थिति में वायु प्रदूषण को सीमित करने के लिए आगे की क्या योजना है? आइये जानते हैं...
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दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर पहली बार कब और क्या कहा गया? आगे के कुछ दशकों में किस तरह जहरीली हवा के इस खतरे को लेकर चेताया जाता रहा? इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों की ओर से कब और कौन से कदम उठाए गए? इनका असर कितना रहा? मौजूदा संकट की स्थिति में वायु प्रदूषण को सीमित करने के लिए आगे की क्या योजना है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- दिल्ली में पहली बार वायु प्रदूषण को लेकर कब और क्या कहा गया?
दिल्ली में वायु प्रदूषण और धूल भरी आबोहवा से जुड़ा पहला अध्ययन और औपचारिक जिक्र 1954 में हुआ था। इस साल एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था- "क्या 1952 और 1953 की लगातार दो गर्मियों में मई और जून के दौरान दिल्ली में असामान्य रूप से धूल भरा मौसम रहने की घटना, इस बात का संकेत है कि राजस्थान का रेगिस्तान दिल्ली की ओर बढ़ रहा है?"इस अध्ययन में 1952 और 1953 की गर्मियों के दौरान दिल्ली में चली असामान्य धूल भरी आंधियों और मौसम का विश्लेषण किया गया था। इसमें यह सवाल उठाया गया था कि क्या राजस्थान का रेगिस्तान दिल्ली की ओर बढ़ रहा है। अध्ययन में यह सवाल तो दर्ज किया गया, लेकिन यह सिद्ध या स्थापित नहीं हो सका कि रेगिस्तान वास्तव में दिल्ली की तरफ बढ़ रहा था।
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प्रदूषण
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
आगे के कुछ दशकों में किस तरह जहरीली हवा के इस खतरे को लेकर चेताया जाता रहा?
1954 के अध्ययन के बाद के दशकों में दिल्ली में जहरीली हवा और वायु प्रदूषण के बढ़ते खतरे को लेकर विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों, अदालती चेतावनियों और सरकारी रिपोर्ट्स के जरिए लगातार आगाह किया जाता रहा।
1960 का दशक: रासायनिक बनावट की पहली चेतावनी
1960 से 1962 के बीच एकत्र किए गए वायु-कणों पर आधारित अध्ययन- 'स्टडीज ऑन एट्मोस्फेरिक पार्टिकुलेट मैटर एट दिल्ली' का 1965 में प्रकाशन हुआ। इसमें दिल्ली की हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों और उनकी रासायनिक संरचना का पहला विस्तृत ब्योरा सामने रखा। इस शोध के जरिए दिल्ली की हवा की रासायनिक बनावट का पहला और शुरुआती खाका पेश किया गया था।
1980 का दशक: स्वास्थ्य संकट और कानूनी दखल
प्रदूषण जब जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनने लगा, तो 1985 में पर्यावरण मामलों के जाने-माने वकील एमसी. मेहता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
1990 का दशक: 'स्लो मर्डर' रिपोर्ट, जिससे बढ़ी चिंताएं
1996: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने 'स्लो मर्डर: द डेडली स्टोरी ऑफ व्हीकुलर पॉल्यूशन इन इंडिया' शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें वाहनों के धुएं से होने वाले जानलेवा स्वास्थ्य जोखिमों को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई।1997: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण पर पहला आधिकारिक 'व्हाइट पेपर' और एक्शन प्लान जारी किया।
2010 का दशक: 'गैस चैंबर' की चेतावनी और ग्रैप
2014: विश्व स्वास्थ्य संगठन के डेटाबेस में पीएम2.5 के आधार पर दिल्ली को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर दर्ज किया गया।2015: दिल्ली हाई कोर्ट ने सख्त लहजे में टिप्पणी की कि ऐसा लगता है जैसे दिल्लीवासी गैस चैंबर में सांस ले रहे हैं।
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दिल्ली में प्रदूषण की सबसे बड़ी वजहें।
- फोटो : अमर उजाला
खराब होती हवा से निपटने के लिए अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए?
1985: वकील एमसी मेहता की याचिका के बाद अदालती हस्तक्षेपों का एक सिलसिला शुरू हुआ, जिसके तहत दिल्ली में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों तथा वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए सख्त निर्देश और कदम उठाए गए। इस कदम ने दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई को एक कानूनी और प्रशासनिक आधार दिया, जिसके बाद आगे चलकर सीएनजी वाहनों और उद्योगों पर कड़े नियम लागू किए गए।1998: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन बसों को सीएनजी में बदलने का आदेश दिया। इसी वर्ष प्रदूषण नियंत्रण उपायों की निगरानी के लिए ईपीसीए (पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण प्राधिकरण) गठित किया गया।
2015: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में प्रवेश करने वाले व्यावसायिक ट्रकों पर पर्यावरण शुल्क और प्रवेश संबंधी कड़े प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया।
2016: निजी वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली सरकार ने ऑड-ईवन योजना लागू की।
प्रदूषण
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
2017: वायु गुणवत्ता के खराब होने पर चरणबद्ध आपातकालीन पाबंदियां लागू करने के लिए ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) शुरू किया गया। इसी के साथ बदरपुर थर्मल पावर प्लांट को स्थायी रूप से बंद किया गया और कनॉट प्लेस में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर स्मॉग टावर लगाया गया।
2021: वायु प्रदूषण के दिल्ली की सीमाओं से परे होने की वजह से कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट- सीएक्यूएम का गठन किया गया। यह आयोग पंजाब से उत्तर प्रदेश तक वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए काम करता है। मौजूदा समय में एआई-संचालित कमांड सेंटर, एआई कैमरों और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) की नई प्रयोगशालाओं के जरिए वास्तविक समय में प्रदूषण के स्रोतों की निगरानी कर चेताया जा रहा है।
बीते वर्षों में सरकार की तरफ से दिल्ली और आसपास के मैदानी क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए कई बड़े कदम उठाए जा चुके हैं। हालांकि, रिपोर्ट्स और अलग-अलग रिसर्च के मुताबिक, दिल्ली में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए लागू किए गए कड़े और आपातकालीन कदमों के बावजूद सर्दियों की वायु गुणवत्ता में कोई लगातार या स्थायी सुधार दर्ज नहीं हुआ है।
1. वायु गुणवत्ता (एक्यूआई) पर नहीं पड़ा खास फर्क
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के एक विश्लेषण के मुताबिक, 2022 में ग्रैप (ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान) के संशोधन के बाद पिछले चार वर्षों (2022 से 2026) के दौरान एक्यूआई में उतार-चढ़ाव बना हुआ है।
2021: वायु प्रदूषण के दिल्ली की सीमाओं से परे होने की वजह से कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट- सीएक्यूएम का गठन किया गया। यह आयोग पंजाब से उत्तर प्रदेश तक वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए काम करता है। मौजूदा समय में एआई-संचालित कमांड सेंटर, एआई कैमरों और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) की नई प्रयोगशालाओं के जरिए वास्तविक समय में प्रदूषण के स्रोतों की निगरानी कर चेताया जा रहा है।
वायु प्रदूषण पर लगाम के लिए उठाए गए कदमों का कितना हुआ प्रभाव?
बीते वर्षों में सरकार की तरफ से दिल्ली और आसपास के मैदानी क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए कई बड़े कदम उठाए जा चुके हैं। हालांकि, रिपोर्ट्स और अलग-अलग रिसर्च के मुताबिक, दिल्ली में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए लागू किए गए कड़े और आपातकालीन कदमों के बावजूद सर्दियों की वायु गुणवत्ता में कोई लगातार या स्थायी सुधार दर्ज नहीं हुआ है।
1. वायु गुणवत्ता (एक्यूआई) पर नहीं पड़ा खास फर्क
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के एक विश्लेषण के मुताबिक, 2022 में ग्रैप (ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान) के संशोधन के बाद पिछले चार वर्षों (2022 से 2026) के दौरान एक्यूआई में उतार-चढ़ाव बना हुआ है।
दिल्ली में बिगड़ता एक्यूआई।
- फोटो : अमर उजाला
2. आपात पाबंदियों का भी सीमित असर
दिल्ली सरकार ने फरीदाबाद, गुरुग्राम, नोएडा, सोनीपत और बहादुरगढ़ की पुलिस तथा ट्रैफिक टीमों के साथ समन्वय स्थापित किया है।
- दिल्ली ने इन चार सर्दियों के दौरान लगभग 78% से 83% दिन यानी लगभग हर पांच में से चार दिन ग्रैप चरण II या उससे सख्त पाबंदियों के साये में बिताए।
- जब ग्रैप के कड़े चरण (चरण III और IV) लागू किए गए, तो पाबंदी लागू होने के अगले सात दिनों का औसत एक्यूआई पिछले सात दिनों की तुलना में ज्यादा ही रहा।
- कड़े कदम लागू होने के पहले दो दिनों में एक्यूआई में औसतन 25% की बढ़ोतरी देखी गई। हालांकि, इसके पीछे ग्रैप से पहले की परिस्थितियों को वजह माना गया है।
वायु प्रदूषण से निपटने के लिए इस बार की तैयारी क्या?
1. अंतर-राज्यीय समन्वय और वाहनों के उत्सर्जन पर सख्तीदिल्ली सरकार ने फरीदाबाद, गुरुग्राम, नोएडा, सोनीपत और बहादुरगढ़ की पुलिस तथा ट्रैफिक टीमों के साथ समन्वय स्थापित किया है।
दिल्ली में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने की कवायद।
- फोटो : अमर उजाला
2. धूल नियंत्रण और राजमार्ग प्रबंधन के लिए कदम
3. एआई और डिजिटल तकनीक से निगरानी
- सड़कों पर पानी के छिड़काव के लिए स्प्रिंकलर, मैकेनाइज्ड रोड स्वीपिंग और एंटी-स्मॉग गन के जरिए धूल दबाने का काम तेज किया गया है।
- एनएचएआई ने एक्सप्रेसवे पर 60 वाटर स्प्रिंकलर, 14 एंटी-स्मॉग गन, 23 स्वीपिंग मशीनें और 900 से अधिक कर्मी तैनात किए हैं।
- इसके अलावा ढांचों की निर्माण सामग्री को ढका रखना और जियो-टैग्ड फोटो के साथ हर दिन रिपोर्टिंग अनिवार्य की गई है।
3. एआई और डिजिटल तकनीक से निगरानी
- डीपीसीसी का एआई-आधारित कमांड सेंटर रियल-टाइम में वायु गुणवत्ता, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण स्थलों की सीसीटीवी लाइव फीड और नागरिक शिकायतों की निगरानी कर रहा है। इसके अलावा 13 नए मॉनिटरिंग स्टेशन जोड़कर कुल केंद्रों की संख्या 60 कर दी गई है।
- भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) की एएटीएए लैब रियल-टाइम सोर्स अपॉर्शन्मेंट के जरिए प्रदूषण के सटीक स्रोतों, जैसे- वाहन, सेकेंडरी एरोसोल, सड़क की धूल की वैज्ञानिक पहचान कर लक्षित कार्रवाई की जा रही है।
4. पराली और बायोमास का क्षेत्रीय प्रबंधन
5. दीर्घकालिक और प्राथमिक स्रोतों पर ध्यान
- पंजाब और हरियाणा में फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों की उपलब्धता और इन-सिटू/एक्स-सिटू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत की जा रही है।
- ईंट-भट्टों और थर्मल पावर प्लांटों में पराली से बनी बायोमास पेलेट्स की को-फायरिंग और कंप्रेस्ड बायोगैस संयंत्रों में पराली का उपयोग अनिवार्य किया गया है।
- उपग्रह डेटा, ड्रोन और खास एएनपीआर कैमरों से पराली जलाने पर निगरानी रखी जा रही है और उल्लंघन करने वालों पर चालान/एफआईआर की कार्रवाई हो रही है।
5. दीर्घकालिक और प्राथमिक स्रोतों पर ध्यान
- विशेषज्ञ रणनीति में केवल आपातकालीन ग्रैप पाबंदियों पर निर्भर रहने के बजाय मूल स्रोतों पर साल भर उत्सर्जन घटाने पर जोर दिया गया है।
- योजना में पीएम10 के साथ-साथ पीएम2.5 और द्वितीयक कणों (एयरोसोल) को जन्म देने वाली गैसीय गैसों- सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, अमोनिया पर ध्यान केंद्रित करने की सिफारिश शामिल है।