आपदा प्रबंधन में बड़ी कामयाबी: दुनिया में मौतों में 65% की कमी, भारत के सामने अब भी कई चुनौतियां
दुनिया में आपदाओं से होने वाली मौतों में 65 प्रतिशत की कमी बेहतर पूर्व चेतावनी और आपदा प्रबंधन का परिणाम है। इसके बावजूद हर साल करीब 10 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं। भारत में बाढ़, भूकंप, चक्रवात और सूखे जैसे खतरों से निपटने के लिए सुरक्षित निर्माण और बेहतर तैयारी जरूरी है।
विस्तार
आपदाओं से होने वाली मौतों में 65 प्रतिशत की कमी दर्ज होना दुनिया के लिए बड़ी उपलब्धि है। बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणालियों, आपदा प्रबंधन और समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की व्यवस्था ने साबित किया है कि प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना भले संभव न हो, लेकिन उनसे होने वाली जनहानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र की आपदा जोखिम न्यूनीकरण संबंधी एजेंसी (यूएनडीआरआर) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में आपदाओं से होने वाली मौतों में 65 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। यह आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी प्रणालियों की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति का संकेत है। इसके बावजूद वर्ष 2016 से 2025 के बीच हर साल औसतन करीब 10 करोड़ लोग आपदाओं से प्रभावित हुए। अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों और पारिस्थितिकी तंत्र को होने वाली क्षति को शामिल करें, तो आपदाओं की सालाना वैश्विक लागत 2.3 लाख करोड़ डॉलर से अधिक है।
यूनाइटेड नेशंस ऑफिस फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन के अनुसार आपदा से होने वाली मौतों में कमी के पीछे समय पर खतरे की जानकारी पहुंचाने और बचाव की तैयारी को अहम माना जाता है। वर्ष 2015 में दुनिया के 55 देशों में कई तरह की आपदाओं के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियां मौजूद थीं। अब ऐसे देशों की संख्या बढ़कर 128 हो गई है। यह विस्तार आपदा जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति दर्शाता है। हालांकि, चेतावनी तभी कारगर होती है, जब वह समय पर संबंधित लोगों तक पहुंचे और उसके आधार पर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने, राहत व्यवस्था सक्रिय करने तथा जरूरी सेवाओं को बचाने के कदम उठाए जा सकें।मौतों की दर में आई कमी यह भी बताती है कि आपदा प्रबंधन में तैयारी और संस्थागत क्षमता का महत्व बढ़ा है।लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आपदाओं का खतरा या उनसे होने वाला कुल नुकसान उसी अनुपात में घट गया है। जनहानि, प्रभावित आबादी और आर्थिक क्षति अलग-अलग पैमाने हैं, जिनका आकलन अलग तरीके से किया जाना चाहिए।
भारत के सामने कई तरह के खतरे
भारत में आपदा जोखिम की चुनौती व्यापक है। देश की करीब 59 प्रतिशत भूमि भूकंप के खतरे वाले क्षेत्रों में आती है, जबकि लगभग 12 प्रतिशत क्षेत्र बाढ़ की आशंका से प्रभावित है। लंबी समुद्री तटरेखा के कारण कई इलाकों को चक्रवात और सुनामी का खतरा रहता है। हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, बादल फटने और हिमनद झीलों के फटने जैसी घटनाएं भी गंभीर चिंता का विषय हैं। दूसरी ओर, सूखा और भीषण गर्मी खेती, जल उपलब्धता, स्वास्थ्य तथा लोगों की आजीविका को प्रभावित करते हैं।इन खतरों के बीच सुरक्षित आवास और मजबूत बुनियादी ढांचे की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में घरों और सार्वजनिक इमारतों का निर्माण स्थानीय जोखिम को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। भूकंप संभावित क्षेत्रों में भवन निर्माण मानकों का पालन और पुराने असुरक्षित भवनों को मजबूत करना जरूरी है। पहाड़ी इलाकों में सड़कों, सुरंगों और दूसरी परियोजनाओं की योजना बनाते समय भूगर्भीय परिस्थितियों तथा पर्यावरणीय प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन भी आवश्यक है।
ओडिशा के अनुभव से मिली सीख
वर्ष 1999 के विनाशकारी चक्रवात में ओडिशा में करीब 10 हजार लोगों की जान गई थी। इस त्रासदी के बाद राज्य ने चक्रवात से निपटने की तैयारियों, निकासी व्यवस्था और सुरक्षित आश्रयों पर विशेष जोर दिया। वर्ष 2019 में चक्रवात फानी के दौरान बड़े पैमाने पर लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। पूर्व चेतावनी, प्रशासनिक तैयारी और स्थानीय स्तर पर समन्वय ने संभावित जनहानि को कम करने में मदद की।
यह अनुभव बताता है कि आपदा का असर केवल उसकी तीव्रता से तय नहीं होता। तैयारी, सूचना और प्रतिक्रिया की क्षमता भी परिणाम बदल सकती है। भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत संस्थागत व्यवस्था बनाई गई है, लेकिन प्रभावी प्रबंधन के लिए योजनाओं को जमीन पर लागू करना उतना ही जरूरी है।
राहत के साथ जोखिम घटाने पर भी जोर
आपदा के बाद राहत और पुनर्वास आवश्यक हैं, लेकिन केवल नुकसान होने के बाद मदद पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान, सुरक्षित आवास, मजबूत अस्पताल और स्कूल, स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण तथा नियमित मॉक ड्रिल पर भी निवेश करना होगा। गरीब और कमजोर परिवारों के लिए सुरक्षित घर तथा आर्थिक सुरक्षा की व्यवस्था विशेष रूप से जरूरी है, क्योंकि आपदा के बाद दोबारा जीवन शुरू करने के संसाधन अक्सर उन्हीं के पास सबसे कम होते हैं।दुनिया में आपदाओं की सालाना लागत 2.3 लाख करोड़ डॉलर से अधिक होना बताता है कि इसका असर केवल जनहानि तक सीमित नहीं है। इसमें बुनियादी ढांचे, आजीविका और पारिस्थितिकी तंत्र को होने वाला नुकसान भी शामिल है। इसलिए आपदा प्रबंधन की योजनाओं में पुनर्वास के साथ-साथ नुकसान की आशंका कम करने वाले उपायों को प्राथमिकता देना जरूरी है।
और मजबूत प्रयासों की जरूरत
आपदाओं से होने वाली मौतों में 65 प्रतिशत की कमी निश्चित रूप से बड़ी सफलता है। यह उपलब्धि बताती है कि वैज्ञानिक चेतावनी, बेहतर तैयारी और प्रभावी प्रबंधन से लोगों की जान बचाई जा सकती है। लेकिन हर साल करोड़ों लोगों का प्रभावित होना और वैश्विक स्तर पर भारी आर्थिक नुकसान यह याद दिलाता है कि प्रयासों को और मजबूत करने की जरूरत है। अगला लक्ष्य केवल आपदा आने पर लोगों को बचाना नहीं, बल्कि ऐसे घर, बस्तियां और