Explainer: चीनी के बाद प्याज के भी बढ़ने लगे दाम, त्योहारों के पहले और कितना बढ़ेगा आपकी रसोई का बजट?
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
त्योहारों का सीजन शुरू होने वाला है और इससे पहले रसोई के बजट पर महंगाई का दबाव बढ़ता दिख रहा है। प्याज और चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने सबसे ज्यादा चिंता बढ़ाई है, वहीं दाल, चावल, आटा और सब्जियों के दाम में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। ऐसे में सवाल है कि खाद्य पदार्थ के दामों में कितनी बढ़ोतरी देखने को मिली है? प्याज और चीनी समेत जरूरी खाने-पीने की चीजों के दाम क्यों बढ़ रहे हैं? त्योहारों से पहले इसका आम लोगों की जेब पर कितना असर पड़ेगा?
अभी कितने हैं जरूरी चीजों के दाम?
उपभोक्ता मामलों के विभाग के 23 अगस्त के अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य के मुताबिक, चावल 45.08 रुपये प्रति किलो रहा। वहीं एक महीने पहले यह 44.81 रुपये और एक साल पहले यह 42.66 रुपये प्रति किलो था।
सरसों तेल: 23 अगस्त को पैक्ड सरसों तेल की औसत खुदरा कीमत 197.82 रुपये प्रति किलो रही। एक महीने पहले यह 195.99 रुपये प्रति किलो और एक साल पहले यह 187.98 रुपये प्रति किलो थी।
मूंगफली तेल: 23 अगस्त को पैक्ड मूंगफली तेल की औसत खुदरा कीमत 205.93 रुपये प्रति किलो रही। एक महीने पहले यह 206.36 रुपये प्रति किलो और एक साल पहले यह 186.77 रुपये प्रति किलो थी। यानी एक साल में इसकी कीमत करीब 19.16 रुपये प्रति किलो बढ़ी है।
चना दाल की औसत खुदरा कीमत 85.88 रुपये प्रति किलो रही। एक महीने पहले यह 86.14 रुपये और एक साल पहले 86.93 रुपये थी। यानी चना दाल पिछले साल के मुकाबले सस्ती है।
आलू की औसत कीमत 21.94 रुपये प्रति किलो रही। एक महीने पहले यह 22.90 रुपये और एक साल पहले 25.57 रुपये थी। यानी आलू भी सालाना आधार पर सस्ता है।
तुअर या अरहर दाल की औसत कीमत 122.11 रुपये प्रति किलो रही। एक महीने पहले यह 123.07 रुपये और एक साल पहले 116.48 रुपये थी।
पैक्ड आयोडाइज्ड नमक की औसत कीमत 22.62 रुपये प्रति किलो रही। एक महीने पहले यह 22.13 रुपये और एक साल पहले 21.19 रुपये थी।
आटे की औसत खुदरा कीमत 37.64 रुपये प्रति किलो रही। एक महीने पहले यह 37.03 रुपये और एक साल पहले 36.80 रुपये थी। वहीं बाजार में आटे का थोक भाव करीब 1,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचने की बात सामने आई है।
चीनी की औसत खुदरा कीमत 63.13 रुपये प्रति किलो रही। एक महीने पहले यह 48.62 रुपये और एक साल पहले 46.30 रुपये थी। कुछ बाजारों में चीनी 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। ये सभी अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमतें हैं। किसी शहर या दुकान में वास्तविक कीमत इससे कहीं ज्यादा है।
प्याज की कीमत में तेजी क्यों?
प्याज की कीमतों में इस समय सबसे ज्यादा तेजी दिखी है। इसका औसत खुदरा मूल्य 42.08 रुपये प्रति किलो है। एक सप्ताह पहले यह 35.85 रुपये, एक महीने पहले 34.91 रुपये और एक साल पहले 28.41 रुपये था। वहीं, दिल्ली में प्याज की खुदरा कीमत 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है, जबकि एक साल पहले यह 35 रुपये थी। चेन्नई में यह करीब 58 रुपये किलो तक बिक रही है, जबकि पिछले साल 33 रुपये किलो थी।
प्याज की महंगाई के पीछे सिर्फ उत्पादन कम होना वजह नहीं है। मार्च-अप्रैल में महाराष्ट्र में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से देर से आने वाली फसल और स्टोर किए गए प्याज को नुकसान पहुंचा। इसके अलावा बाजार में महंगे स्टोर किए गए रबी प्याज की आवक हुई, जिससे उपलब्ध सप्लाई पर दबाव बढ़ा।
कहां होता है प्याज का सबसे ज्यादा उत्पादन?
महाराष्ट्र देश का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक राज्य है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के मुताबिक 2024-25 में देश के कुल प्याज उत्पादन में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 44.07 फीसदी थी। मध्य प्रदेश 14.44 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर रहा। इसलिए महाराष्ट्र में फसल या स्टॉक प्रभावित होने का असर देश के दूसरे बाजारों में भी पड़ता है।
चीनी क्यों हुई महंगी?
चीनी के मामले में घरेलू सप्लाई और मांग दोनों महत्वपूर्ण हैं। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के मुताबिक, मौजूदा तेजी के पीछे उम्मीद से कम घरेलू उत्पादन, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, मौसम से गन्ने की फसल को नुकसान, वैश्विक चीनी सप्लाई में दबाव और कुछ हिस्सों में जमाखोरी जैसे कारण हैं।
कीमतों पर दबाव कम करने के लिए सरकार ने 31 अक्तूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। इसके अलावा चीनी मिलों को घरेलू सप्लाई बढ़ाने के लिए 15 अक्तूबर से पेराई शुरू करने को कहा गया है।
बाजार का क्या है हाल?
उपभोक्ताओं का कहना है कि चीनी की बढ़ती कीमत की वजह से वह कड़वी चाय पीने को मजबूर हैं। वहीं व्यापारियों का कहना है कि 15-20 दिनों के भीतर 1000 रुपये प्रति बोरी चीनी के दाम बढ़ गए हैं। मांग इतनी बढ़ गई है कि चीनी मिलना मुश्किल हो गया है। थोक विक्रेता दुकानदार को बता रहे हैं कि माल कम आ रहा है। साथ ही दुकानदारों का कहना है कि ड्राई फ्रूट के दाम भी आसमान छू रहे हैं, बादाम के दाम में 200 रुपये की बढ़ोतरी हुई है।
दालों में हर जगह महंगाई नहीं
दालों में एक जैसी स्थिति नहीं है। चना दाल की कीमत सालाना आधार पर कम हुई है, जबकि तुअर दाल पिछले साल की तुलना में महंगी है। दालों की कीमत में घरेलू उत्पादन, मंडियों में आवक, मांग और आयात अहम भूमिका निभाते हैं। जिन दालों का घरेलू उत्पादन मांग के मुकाबले कम होता है, उनमें आयात पर निर्भरता बढ़ती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमत और आयात लागत का असर घरेलू बाजार में दिखाई देता है।
आटा और चावल में क्यों बढ़ी कीमत?
चावल और आटे की कीमतों में प्याज या चीनी जैसी तेज बढ़ोतरी नहीं है, लेकिन दोनों की कीमत पिछले साल से कुछ ऊपर है। चावल की कीमत एक साल में 42.66 रुपये से बढ़कर 45.08 रुपये प्रति किलो हुई है। आटा 36.80 रुपये से बढ़कर 37.64 रुपये प्रति किलो हुआ है। इनकी कीमत पर उत्पादन, मंडी आवक, सरकारी खरीद और स्टॉक, मिलिंग, परिवहन व मांग का असर पड़ता है।
जुलाई में खाद्य महंगाई की तस्वीर क्या थी?
अब तक की मौजूदा कीमतों से अलग, जुलाई के सरकारी आंकड़े खाद्य महंगाई की व्यापक तस्वीर दिखाते हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के जुलाई 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई दर 4.45 फीसदी रही, जो जून के 4.38 फीसदी से अधिक थी। वहीं खाद्य महंगाई 5.52 फीसदी रही, जबकि जून में यह 5.32 फीसदी थी। ग्रामीण खाद्य महंगाई 5.79 फीसदी और शहरी खाद्य महंगाई 5.05 फीसदी रही। यानी जुलाई में खाद्य वस्तुओं की कीमतों का दबाव कुल महंगाई में भी दिखाई दिया।
थाली पर कितना असर पड़ा?
क्रिसिल इंटेलिजेंसकी जुलाई रिपोर्ट के मुताबिक, घर पर बनने वाली शाकाहारी थाली की लागत सालाना आधार पर चार फीसदी और मांसाहारी थाली की लागत नौ फीसदी बढ़ी। शाकाहारी थाली पर प्याज, खाद्य तेल और एलपीजी की कीमतों का दबाव रहा। जुलाई में प्याज सालाना आधार पर 20 फीसदी, खाद्य तेल 11 फीसदी और एलपीजी 10 फीसदी महंगा रहा।
हालांकि, कुछ वस्तुओं ने महंगाई को कम करने में मदद की। आलू की कीमत सालाना आधार पर 12 फीसदी और टमाटर की कीमत 2 फीसदी कम रही। आलू की कीमत में कमी रबी उत्पादन में 2-3 फीसदी बढ़ोतरी और रकबे में विस्तार से जुड़ी थी।
महीने के आधार पर जुलाई में शाकाहारी थाली की लागत 2 फीसदी बढ़ी, जबकि मांसाहारी थाली की लागत स्थिर रही। प्याज और आलू की कीमतें क्रमशः 23 फीसदी और 4 फीसदी बढ़ीं, जबकि टमाटर 1 फीसदी सस्ता हुआ।
अभी कीमतें इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि त्योहारों से पहले बढ़ती मांग का असर सबसे ज्यादा उन चीजों पर पड़ सकता है जिनकी कीमत पहले से ही ऊपर है। चीनी, खाद्य तेल, प्याज, आटा और दाल जैसी चीजों की खपत त्योहारों के दौरान बढ़ती है। ऐसे में अगर बाजार में इनकी आवक या सप्लाई पर्याप्त नहीं रहती, तो बढ़ी हुई मांग कीमतों पर और दबाव डाल सकती है। हालांकि, हर खाद्य वस्तु के दाम एक साथ बढ़ेंगे, ऐसा जरूरी नहीं है। सरकार ने चीनी के लिए शुल्क-मुक्त आयात और प्याज के मामले में बफर स्टॉक जैसे कदम उठाकर कीमतें नियंत्रित करने की कोशिश की है।