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सर्विलांस से बचने का आतंकियों का हाईटेक पैंतरा: 'लोरा' डिवाइस का कर रहे इस्तेमाल, बिना सिम-इंटरनेट के करता काम

Tue, 06 Oct 2026 11:28 AM IST
Nikita Gupta अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर Published by: Nikita Gupta Updated Tue, 06 Oct 2026 11:28 AM IST
सार
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कश्मीर में सक्रिय विदेशी आतंकियों द्वारा सुरक्षाबलों की तकनीकी निगरानी से बचने के लिए बिना सिम, इंटरनेट और मोबाइल टावर के काम करने वाले लोरा डिवाइस इस्तेमाल किए जाने का खुलासा हुआ है। बडगाम समेत कई मुठभेड़ों में ऐसे हैंडसेट बरामद हुए हैं।

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Foreign terrorists in Kashmir are using LoRa devices to evade tracking.
सुरक्षाबल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों के चौतरफा प्रहार और सर्विलांस चक्र से बचने के लिए घाटी में सक्रिय विदेशी आतंकियों ने नया हाईटेक पैंतरा अपनाया है। सुरक्षा एजेंसियों के रडार से छिपने के लिए आतंकी अब बिना सिम कार्ड, मोबाइल नेटवर्क या वाई-फाई के काम करने वाली उन्नत रेडियो तकनीक 'लोरा' यानी लॉन्ग रेंज का इस्तेमाल कर रहे हैं।

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सूत्रों के अनुसार हाल ही में बडगाम जिले में हुई मुठभेड़ों के दौरान इस हाईटेक संचार व्यवस्था का खुलासा हुआ है। 29 सितंबर की रात को बडगाम के यूसमर्ग और दूधपथरी के अश्दर क्षेत्र में सुरक्षाबलों ने लश्कर के टॉप कमांडर मोहम्मद आसिफ उर्फ हाशिम मूसा को ढेर किया था। उसके पास से हथियारों के साथ लोरा अल्ट्रा हैंडसेट बरामद हुआ था।

दूधपथरी में मारे गए विदेशी आतंकी यासिर, बडगाम के गुरवतकलां में हुई मुठभेड़ और दाछीगाम-पहलगाम के ऊंचे जंगलों में चलाए गए ऑपरेशन महादेव के दौरान भी आतंकियों के ठिकानों से यही लोरा उपकरण व बिना सिम वाले बर्नर फोन मिले थे। सुरक्षा विशेष्यज्ञों के अनुसार लोरा एक ऐसी पोर्टेबल और वायरलेस संचार तकनीक है जो बिजली की बेहद कम खपत में बिना किसी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट के काम करती है। यह मुख्य रूप से 868 मेगाहर्ट्ज और 915 मेगाहर्ट्ज जैसे बिना लाइसेंस वाले सब-गीगाहर्ट्ज रेडियो फ्रीक्वेंसी बैंड का उपयोग करती है। इसमें मेश नेटवर्क तकनीक का इस्तेमाल होता है, जिसका मतलब है कि इसमें शामिल हर हैंडसेट खुद एक छोटे नेटवर्क टावर की तरह काम करता है। इसे चालू रखने के लिए न तो सिम कार्ड की जरूरत होती है व न ही इसकी लोकेशन मोबाइल टावर से पिंग होती है।

इन उपकरणों की सबसे बड़ी ताकत इनकी लंबी बैटरी लाइफ और रेंज है। ये इतने कम पावर पर चलते हैं कि एक छोटे लिथियम सेल पर वर्षों तक बिना बंद हुए काम कर सकते हैं। खुले इलाकों में ये 10 से 15 किलोमीटर की दूरी तक और घने जंगलों व मजबूत इमारतों के भीतर भी आसानी से टेक्स्ट मैसेज, जीपीएस लोकेशन, नक्शे और इमरजेंसी एसओएस अलर्ट भेज सकते हैं। लिलीगो टी-डेक या हेल्टेक वी3 जैसी मेश्टैस्टिक तकनीकों के जरिए इन उपकरणों को ब्लूटूथ से स्मार्टफोन से जोड़कर एन्क्रिप्टेड और सुरक्षित संदेश भेजे जाते हैं।

आमतौर पर लोरा तकनीक का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाढ़ या भूकंप में मोबाइल टावर ठप होने, पहाड़ों और जंगलों में ट्रेकिंग, सैन्य सुरक्षा और स्मार्ट शहरों के आईओटी उपकरणों में किया जाता है। हालांकि, नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (एनटीआरओ) द्वारा किए गए फोरेंसिक विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि आतंकियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे ये हैंडसेट स्थानीय रूप से असेंबल नहीं हैं। ये सीमा पार बैठे आकाओं द्वारा पहले से ही कॉन्फिगर और एन्क्रिप्ट कर घाटी में भेजे जा रहे हैं, ताकि भारतीय सुरक्षाबलों के तकनीकी सर्विलांस को चकमा दिया जा सके।

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सुरक्षा एजेंसियों ने भी बदला तरीका
आतंकियों के पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क छोड़कर इन साइलेंट रेडियो पर शिफ्ट होने के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने भी रणनीति री-कैलिब्रेट की है। दक्षिण कश्मीर और घने जंगल वाले इलाकों में लोरा फ्रीक्वेंसी को पकड़ने और ब्लॉक करने के लिए स्पेक्ट्रम स्कैनर्स और जैमर्स को नए सिरे से तैनात किया है। अधिकारियों का कहना है कि अब सिम कार्ड और मोबाइल टावरों का पीछा करने के बजाय इन साइलेंट रेडियो सिग्नलों को ट्रेस कर घाटी में बचे-खुचे विदेशी आतंकियों का खात्मा किया जा रहा है।

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ड्रग्स के पैसों से आधुनिक तकनीक खरीद रहे आतंकी
कश्मीर के यूसमर्ग में मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों के पास से लोरा डिवाइस की बरामदगी पर जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व डीजीपी डॉ. एसपी वैद ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा, आतंकी अब संवाद और ऑपरेशंस के लिए अत्याधुनिक तकनीक का सहारा ले रहे हैं।

वैद ने बताया कि यह बदलाव 4-5 वर्षों में तेजी से आया है। जैसे-जैसे आतंकियों की तकनीक बदलती है, सुरक्षा एजेंसियों को भी अपने स्पेक्ट्रम स्कैनर्स, जैमर्स और तकनीकी प्रतिक्रिया (रिस्पॉन्स) को उसी अनुसार तेजी से कैलिब्रेट और अपग्रेड करना पड़ता है। आतंकियों की ओर से चीनी तकनीक के इस्तेमाल पर कहा कि ड्रग तस्करी से कमाए गए पैसों से आतंकी चीन या अन्य जगहों के हाईटेक उपकरण खरीद लेते हैं जबकि सुरक्षाबलों को किसी भी खरीद के लिए एक लंबी और निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना होता है। उन्होंने 90 के दशक का उदाहरण देते हुए कहा कि जब आतंकियों के पास एके-47 आ चुकी थी, तब पुलिस 303 राइफलों के सहारे लड़ रही थी।

वैद ने आरोप लगाया कि चीन, भारत को परेशान करने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करता है और पाकिस्तानी आतंकी इसका पूरा फायदा उठाते हैं। आतंकियों को चीन से अप्रत्यक्ष मदद मिलने की बात पहले भी कई अभियानों में सामने आ चुकी है।

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