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सुरक्षाबलों की रणनीति रंग लाई: छिपने को जंगल, बचने को पहाड़, आतंकियों की हर चाल हो रही नाकाम

Fri, 18 Sep 2026 12:28 PM IST
अनुज कुमार अभिषेक राज, श्रीनगर
अभिषेक राज, श्रीनगर Published by: अनुज कुमार Updated Fri, 18 Sep 2026 12:28 PM IST
सार
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जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बल आतंकियों की घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ों में छिपे रहने की रणनीति को लगातार विफल कर रहे हैं। उधमपुर के मजालता में दो आतंकियों के खात्मे और यूसमर्ग में लश्कर आतंकी मारा गया। सेना आतंकियों के ठिकानों तक पहुंच रही है।

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Forests for hiding, mountains for escape Army intelligence thwarts every move of the terrorists
आतंक पर प्रहार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जम्मू-कश्मीर के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ों को सुरक्षित ठिकाना बनाकर लंबे समय तक छिपे रहने की आतंकियों की रणनीति को सुरक्षा बल लगातार नाकाम कर रहे हैं। उधमपुर के मजालता में बुधवार देर रात दो आतंकियों के खात्मे से लेकर हाल में यूसमर्ग के दुर्गम पहाड़ी इलाके में लश्कर आतंकी यासिर के मारे जाने तक के अभियानों में सेना की पुख्ता इंटेलिजेंस, स्थानीय सूचना, तकनीकी निगरानी और लगातार जमीनी अभियान ने सफलता दिलाई। इन्हीं कड़ियों को जोड़कर सेना आतंकियों की लोकेशन तक पहुंच रही है।

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उधमपुर में बुधवार देर रात मिली पुख्ता सूचना के आधार पर सेना, पुलिस और सीआरपीएफ ने संयुक्त अभियान शुरू किया। खराब मौसम और कम दृश्यता के बावजूद सुरक्षाबलों ने इलाके की घेराबंदी कर दो आतंकियों को मार गिराया। मुठभेड़ के बाद भी सर्च और सर्विलांस जारी रखा गया, ताकि इलाके में किसी अन्य आतंकी की मौजूदगी की आशंका को खत्म किया जा सके।
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यही रणनीति हाल में कश्मीर के यूसमर्ग के ऊंचाई वाले और बेहद दुर्गम इलाके में भी दिखाई दी। यहां लश्कर के पाकिस्तानी आतंकी यासिर की तलाश तीन से चार महीने तक चली। सुरक्षा बलों ने जंगल और पीर पंजाल के दोनों तरफ उसकी गतिविधियों पर नजर बनाए रखी। अगस्त के अंत में तकनीकी निगरानी के जरिए उसकी लोकेशन का सुराग मिला और इसके बाद अभियान को निर्णायक चरण में पहुंचाया गया। सितंबर की शुरुआत में यासिर को मार गिराया गया। पुलिस के अनुसार वह 2021 से 2024 के बीच पुंछ में सुरक्षा बलों पर हुए कई हमलों से जुड़ा था।
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इन दोनों अभियानों को साथ रखकर देखें तो चुनौती केवल आतंकियों को तलाशने की नहीं है। असली चुनौती उनके बदलते ठिकानों, दुर्गम भूभाग और लंबे समय तक छिपे रहने की क्षमता को तोड़ने की है। मजालता में भी आतंकियों ने घने जंगल और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र को अपना ठिकाना बनाया था। लेकिन खुफिया इनपुट मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने इलाके को घेरा और उन्हें बाहर निकलने का मौका नहीं दिया।

मजालता की कार्रवाई यह भी बताती है कि सुरक्षा एजेंसियों का फोकस अब केवल मुठभेड़ तक सीमित नहीं है। आतंकियों के छिपने के ठिकाने से लेकर उनकी आवाजाही, स्थानीय संपर्क, रसद और हथियारों की सप्लाई तक हर कड़ी को जोड़कर नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश हो रही है। यही वजह है कि दुर्गम इलाके अब आतंकियों के लिए स्थायी सुरक्षा कवच नहीं रह गए हैं।

यूसमर्ग में महीनों की तलाश और तकनीकी निगरानी के बाद यासिर तक पहुंचना हो या उधमपुर में पुख्ता इंटेलिजेंस के आधार पर तत्काल संयुक्त कार्रवाई, दोनों ऑपरेशन बताते हैं कि जंगल और पहाड़ बदलने से सुरक्षा बलों की नजर से बचना अब आसान नहीं है। सुरक्षा एजेंसियों का संदेश भी साफ है...तुम भाग सकते हो, बच नहीं सकते।


ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) राजिंदर सिंह जमवाल बताते हैं कि अब उधमपुर ऑपरेशन की अगली कड़ी मारे गए आतंकियों के पीछे सक्रिय नेटवर्क तक पहुंचना है। उनके हथियारों और रसद का स्रोत, स्थानीय संपर्क और आतंकियों की आवाजाही से जुड़ी कड़ियां इस ऑपरेशन की आगे की जांच का केंद्र होंगी। यही पड़ताल बताएगी कि जंगल में छिपे इन आतंकियों के पीछे कितना बड़ा नेटवर्क सक्रिय था।

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