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खुल रहे रहस्य: सोते समय भी दिमाग चलता रहता है... आंखों और चेहरे के इशारों से की जा सकती है सपनों में बातचीत

Sat, 22 Aug 2026 07:18 AM IST
Jyoti Bhaskar ज्योति भास्कर
Updated Sat, 22 Aug 2026 07:18 AM IST
सार
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  • सोते समय भी दिमाग में पहेली हल करने की क्षमता... आंखों और चेहरे के इशारों से की जा सकती है सपनों में बातचीत।
  • हार्वर्ड, कैम्ब्रिज और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने सपनों की दुनिया से उठाया पर्दा।

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Study brain remains active even during sleep communication in dreams possible through eye and facial sign
नींद में भी सक्रिय होता है दिमाग - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सदियों से यह एक पहेली ही रहा है कि इंसान सपने क्यों देखता है। दुनियाभर के न्यूरोसाइंटिस्ट अब इस रहस्य को सुलझाने के बेहद करीब पहुंच गए हैं। हार्वर्ड, कैम्ब्रिज और नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक अभूतपूर्व अध्ययन में दावा किया है कि सोते हुए दिमाग में भी पहेली हल करने की क्षमता होती है और आंखों व चेहरे के इशारों के जरिए सपनों में बातचीत भी की जा सकती है।

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कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता करेन कोंकोली और उनकी टीम ने एक अनूठा प्रयोग किया। इसमें सोए व्यक्ति को बाहरी संकेतों, जैसे रोशनी, आवाज और कंपन के माध्यम से निर्देश दिए गए, जिसके जवाब में उसने पहले से तय इशारों (जैसे गाल हिलाना) में प्रतिक्रिया भी दी। इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि सपने के दौरान इंसान बाहरी दुनिया से काफी हद तक जुड़ा रह सकता है।

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सपनों पर बड़ा रहस्य खुला...

कोंकोली और उनके साथियों ने दिखाया कि सोए लोग आंखों के इशारों से गणित के कठिन सवालों के जवाब दे सकते हैं। नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर केन पॉलर के हालिया अध्ययन में दावा किया कि लोगों ने सपने में पहेलियां भी सुलझाईं। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर रॉबर्ट स्टिकगोल्ड के अनुसार, बेहोशी या गहरी नींद में भी दिमाग दिनभर की यादों को दोबारा प्रोसेस करता है।

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ऐसे किया गया प्रयोग

प्रयोगशाला में सोने वाले व्यक्ति के सिर पर इलेक्ट्रोड लगी टोपी और अंगुलियों में सेंसर लगाए जाते हैं। सोते समय व्यक्ति की पहले से तय इशारे पर दी जाने वाली प्रतिक्रिया को देखा जाता है। मकसद यह जानना है कि सपने के दौरान इंसान बाहरी दुनिया से किस हद तक जुड़ा रह सकता है। यह तकनीक ल्यूसिड ड्रीमिंग यानी ऐसे सपनों पर आधारित है, जिसमें सोया हुआ व्यक्ति यह जान लेता है कि वह सपना देख रहा है और घटनाओं को नियंत्रित भी कर सकता है। ल्यूसिड ड्रीमिंग शब्द पहली बार 1913 में एक वैज्ञानिक शोधपत्र में इस्तेमाल हुआ था।

  • दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी ने जीवन में कभी न कभी ल्यूसिड ड्रीम देखा है, जबकि 23% लोग इसका नियमित अनुभव करते हैं।

बौद्ध भिक्षुओं पर होगा अगला शोध...

शोधकर्ताओं का मानना है कि हर सपने का मकसद अलग होता है, चाहे वह डरावना हो या उड़ने का। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए प्रो. केन पॉलर अब भूटान जाने वाले हैं, जहां वे उन बौद्ध भिक्षुओं पर अध्ययन करेंगे जो साधना के रूप में ल्यूसिड ड्रीमिंग का अभ्यास करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में यह शोध मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त बढ़ाने और दिमागी रोगों के इलाज में क्रांतिकारी साबित हो सकता है।

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