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Lucknow News: माहू कीटों को खाए बिना भी उनकी आबादी घटाएंगी लेडीबर्ड बीटल, लविवि में होगा अनूठा शोध
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डॉ. तृप्ति यादव का लेडीबर्ड पर शोध।
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लखनऊ। फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले माहू कीटों को नियंत्रित करने के लिए जरूरी नहीं कि उनके प्राकृतिक शिकारी उन्हें खाएं भी। उनकी सिर्फ मौजूदगी, गंध और व्यवहार का दबाव भी माहू की आबादी को नियंत्रित कर सकता है। इसी अनछुए पहलू पर लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग में शोध होगा। विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. तृप्ति यादव को इस महत्वपूर्ण अध्ययन के लिए उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (सीएसटीयूपी) ने शोध परियोजना स्वीकृत की है। इसके लिए तीन साल की अवधि तक वित्तीय सहायता दी जाएगी।
शोध का विषय 'बायोलॉजिकल कंट्रोल बियॉन्ड प्रीडेशन : नॉन-कंजम्पटिव इफेक्ट्स ऑफ लेडीबर्ड बीटल्स ऑन एफिड्स' है। इसमें लेडीबर्ड बीटल यानी सामान्य भाषा में लेडीबर्ड भृंग और माहू कीटों के बीच के ऐसे संबंधों का अध्ययन किया जाएगा, जिनमें शिकारी कीट अपने शिकार को खाए बिना ही उसके व्यवहार और जीवनचक्र को प्रभावित करता है।
शिकारी की मौजूदगी से बदलेगा माहू का व्यवहार
अब तक लेडीबर्ड बीटल को माहू का प्राकृतिक शिकारी माना जाता रहा है। यह माहू को खाकर उसकी संख्या कम करती है। लेकिन इस शोध में यह पता लगाया जाएगा कि लेडीबर्ड की मौजूदगी, उसकी गंध और उससे पैदा होने वाले खतरे के एहसास का माहू पर क्या असर पड़ता है। क्या इसके कारण माहू की प्रजनन क्षमता घटती है? क्या वह भोजन करना कम कर देता है या अपनी सामान्य गतिविधियां बदल देता है? इन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे।
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कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने की उम्मीद
इस अध्ययन का सीधा संबंध खेती और किसानों से है। वर्तमान में माहू जैसे हानिकारक कीटों से फसलों को बचाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे खेती की लागत बढ़ने के साथ पर्यावरण और खेतों में मौजूद मित्र कीटों को भी नुकसान पहुंचता है। शोध से यह समझने में मदद मिल सकती है कि प्राकृतिक शिकारी कीटों के व्यवहार का उपयोग बिना उन्हें शिकार करने की जरूरत के भी फसल सुरक्षा में कैसे किया जा सकता है।
इससे भविष्य में कीट प्रबंधन के ऐसे तरीके विकसित करने की राह खुल सकती है, जिनमें रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल कम हो। साथ ही मधुमक्खियों और दूसरे उपयोगी कीटों के संरक्षण तथा कृषि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है।
खेती से लेकर जनस्वास्थ्य तक जुड़े हैं शोध के नतीजे
रासायनिक कीटनाशकों का कम इस्तेमाल होने पर खाद्यान्न और सब्जियों में उनके अवशेषों का खतरा घटाने में मदद मिल सकती है। वहीं, छोटे और सीमांत किसानों की कीटनाशकों पर होने वाली लागत कम करने की दिशा में भी यह अध्ययन उपयोगी साबित हो सकता है। हालांकि, इसके व्यावहारिक परिणाम शोध पूरा होने और उसके निष्कर्षों के आधार पर ही सामने आएंगे।
शोध का विषय 'बायोलॉजिकल कंट्रोल बियॉन्ड प्रीडेशन : नॉन-कंजम्पटिव इफेक्ट्स ऑफ लेडीबर्ड बीटल्स ऑन एफिड्स' है। इसमें लेडीबर्ड बीटल यानी सामान्य भाषा में लेडीबर्ड भृंग और माहू कीटों के बीच के ऐसे संबंधों का अध्ययन किया जाएगा, जिनमें शिकारी कीट अपने शिकार को खाए बिना ही उसके व्यवहार और जीवनचक्र को प्रभावित करता है।
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शिकारी की मौजूदगी से बदलेगा माहू का व्यवहार
अब तक लेडीबर्ड बीटल को माहू का प्राकृतिक शिकारी माना जाता रहा है। यह माहू को खाकर उसकी संख्या कम करती है। लेकिन इस शोध में यह पता लगाया जाएगा कि लेडीबर्ड की मौजूदगी, उसकी गंध और उससे पैदा होने वाले खतरे के एहसास का माहू पर क्या असर पड़ता है। क्या इसके कारण माहू की प्रजनन क्षमता घटती है? क्या वह भोजन करना कम कर देता है या अपनी सामान्य गतिविधियां बदल देता है? इन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे।
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कीटनाशकों पर निर्भरता घटाने की उम्मीद
इस अध्ययन का सीधा संबंध खेती और किसानों से है। वर्तमान में माहू जैसे हानिकारक कीटों से फसलों को बचाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे खेती की लागत बढ़ने के साथ पर्यावरण और खेतों में मौजूद मित्र कीटों को भी नुकसान पहुंचता है। शोध से यह समझने में मदद मिल सकती है कि प्राकृतिक शिकारी कीटों के व्यवहार का उपयोग बिना उन्हें शिकार करने की जरूरत के भी फसल सुरक्षा में कैसे किया जा सकता है।
इससे भविष्य में कीट प्रबंधन के ऐसे तरीके विकसित करने की राह खुल सकती है, जिनमें रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल कम हो। साथ ही मधुमक्खियों और दूसरे उपयोगी कीटों के संरक्षण तथा कृषि पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है।
खेती से लेकर जनस्वास्थ्य तक जुड़े हैं शोध के नतीजे
रासायनिक कीटनाशकों का कम इस्तेमाल होने पर खाद्यान्न और सब्जियों में उनके अवशेषों का खतरा घटाने में मदद मिल सकती है। वहीं, छोटे और सीमांत किसानों की कीटनाशकों पर होने वाली लागत कम करने की दिशा में भी यह अध्ययन उपयोगी साबित हो सकता है। हालांकि, इसके व्यावहारिक परिणाम शोध पूरा होने और उसके निष्कर्षों के आधार पर ही सामने आएंगे।

डॉ. तृप्ति यादव का लेडीबर्ड पर शोध।