बारिश का मौसम अपने साथ कई तरह की बीमारियों का खतरा लेकर आता है। मच्छरों के काटने से होने वाली बीमारियां इन दिनों में काफी बढ़ जाती हैं। बारिश के दिनों में घर के आसपास जमा पानी मच्छरों के प्रजनन को बढ़ावा देने वाला माना जाता है, यही कारण है कि इन दिनों में डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा अधिक होता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को बारिश के दिनों में मच्छरों से बचाव करते रहने की सलाह देते हैं।
World Mosquito Day: छोटा सा मच्छर दे सकता है जीवनभर की बाद बड़ी बीमारी, थोड़ी देर चलना भी हो जाता है मुश्किल
फाइलेरिया को आम बोलचाल में हाथीपांव भी कहा जाता है। यह कोई साधारण सूजन नहीं, बल्कि परजीवी कृमियों से होने वाली बीमारी है, जो संक्रमित मच्छर के काटने से फैलती है। इसके कारण आपका चलना-फिरना तक मुश्किल हो सकता है।
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मच्छरों के कारण फाइलेरिया होने का खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, मच्छरों को हमेशा डेंगू-मलेरिया फैलने तक सीमित रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। फाइलेरिया के कारण पैरों में गंभीर तरह से सूजन हो जाता है, यह कोई साधारण सूजन नहीं, बल्कि परजीवी कृमियों से होने वाली बीमारी है, जो संक्रमित मच्छर के काटने से फैलती है।
- संक्रमण होने के बाद लंबे समय तक व्यक्ति को कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देता, इसलिए इसे ज्यादा चिंता का कारण माना जाता है।
- ये बीमारी बाद में पैरों, हाथों या शरीर के दूसरे हिस्सों में सूजन, त्वचा के मोटा होने और पुरुषों में अंडकोश में सूजन जैसी समस्याएं पैदा कर सकती है।
भारत में भी फाइलेरिया एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। आंकड़ों से पता चलता है कि दुनिया भर में लिम्फैटिक फाइलेरियासिस (हाथीपांव) के कुल मामलों में से लगभग 40% से 62% मामले भारत में हैं, जो इसे इस बीमारी का सबसे बड़ा केंद्र बनाते हैं।
फाइलेरिया की बीमारी के बारे में जानिए
फाइलेरिया एक परजीवी संक्रमण है, जिसे लिम्फैटिक फाइलेरिया भी कहा जाता है। आम बोलचाल की भाषा में इसे हाथीपांव कहा है।
- संक्रमित मच्छर जब किसी को काटता है तो परजीवी के लार्वा त्वचा के रास्ते शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। ये परजीवी समय के साथ लिम्फैटिक सिस्टम तक पहुंचते हैं।
- जब यह तंत्र प्रभावित होता है तो शरीर के किसी हिस्से में तरल जमा होने लगता है और धीरे-धीरे सूजन बढ़ सकती है।
- अक्सर लोगों में संक्रमण के शुरुआती दौर में कोई लक्षण नहीं दिखता, लेकिन अंदर ही अंदर लसीका तंत्र को नुकसान पहुंचता रहता है। इसी वजह से फाइलेरिया को शुरुआती स्तर पर पहचानना कठिन हो सकता है।
फाइलेरिया की पहचान कैसे की जा सकती है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बरसात के मौसम में जगह-जगह पानी जमा होने का खतरा अधिक रहता है है। यही जमा पानी कई मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल जगह बन सकता है। कूलर, गमलों, टायर, टूटे बर्तनों, छतों और नालियों में जमा पानी भी मच्छरों को बढ़ावा देकर इसके कारण होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है।
फाइलेरिया की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शुरुआती संक्रमण कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के रहता है। आप बाहर से बिल्कुल स्वस्थ दिखाई दे सकते हैं, जबकि लिम्फैटिक सिस्टम को अंदर से नुकसान पहुंच रहा होता है।
- बाद के चरणों में प्रभावित हिस्से में सूजन, दर्द या भारीपन महसूस हो सकता है।
- कुछ लोगों में अचानक बुखार, ठंड लगने और प्रभावित हिस्से में दर्द या लालिमा के साथ गंभीर सूजन का खतरा हो सकता है।
- बीमारी बढ़ने पर पैरों में हाथी के पांव की तरह सूजन दिखाई दे सकती है। त्वचा मोटी और सख्त होने लगती है।
- फाइलेरिया के कारण कुछ पुरुषों के अंडकोश में सूजन यानी हाइड्रोसील भी हो सकती है।
पैरों में सूजन हो तो क्या यह फाइलेरिया ही है?
डॉक्टर कहते हैं, वैसे तो पैरों में दिखने वाले सूजन को हर बार फाइलेरिया नहीं माना जा सकता है। हालांकि अगर लंबे समय से एक या दोनों पैरों में सूजन है, त्वचा मोटी होने लगी है और बार-बार दर्द के साथ बुखार रहता है तो डॉक्टर से जांच जरूर कराएं।
- फाइलेरिया से बचाव के लिए मच्छरों से बचना जरूरी है। घर के आसपास पानी जमा न होने दें।
- बरसात के दिनों में कूलर, टंकी-गमलों, पुराने टायर तथा बेकार पड़े बर्तनों में जमा पानी को नियमित रूप से साफ करें।
- रात में सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और जरूरत के अनुसार मच्छर भगाने वाले साधनों का इस्तेमाल करें।
- पूरी बाजू के कपड़े पहनना भी मच्छर के काटने से बचाव में मदद कर सकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।