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पंजाब विधानसभा चुनाव: शिअद के लिए इस बार वजूद की लड़ाई, क्या भाजपा से गठबंधन लगा सकता है नैया पार?
Fri, 28 Aug 2026 07:00 AM IST
शाहिल शर्मा
मोहित धुपड़, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, चंडीगढ़
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Fri, 28 Aug 2026 07:00 AM IST
साल 2017 के बाद पार्टी का परंपरागत वोट बैंक खिसका और 2022 में उसकी चुनावी ताकत ऐतिहासिक रूप से सिमट गई। इसी के चलते अब शिअद के सामने पंथक आधार को फिर मजबूत करने की बड़ी चुनौती है।
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भाजपा से गठबंधन के इंतजार में शिअद
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
पंजाब की सियासत में सबसे बड़ी पंथक पार्टी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के लिए इस बार विधानसभा चुनाव वर्चस्व से ज्यादा वजूद की लड़ाई है। पिछले एक साल के भीतर पार्टी ने टूट झेली और आज दो नए पंथक धड़े बतौर राजनीतिक दल शिअद के सामने बड़ी चुनाैती बनकर खडे़ हैं। जाहिर है चुनाव के दौरान शिअद का वोट बैंक बिखरेगा जिसका सीधा नुकसान पार्टी को हो सकता है।
शिरोमणि अकाली दल लंबे समय तक पंजाब की पंथक राजनीति का सबसे मजबूत सियासी दल रहा है। सिख धार्मिक संस्थाओं, खासकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी (एसजीपीसी) पर प्रभाव और पंथक मुद्दों पर पकड़ के चलते उसे सूबे में बड़ा सिख जनाधार मिला। पिछले एक दशक में देखें तो यह पकड़ थोड़ी कमजोर हुई। साल 2017 के बाद पार्टी का परंपरागत वोट बैंक खिसका और 2022 में उसकी चुनावी ताकत ऐतिहासिक रूप से सिमट गई। इसी के चलते अब शिअद के सामने पंथक आधार को फिर मजबूत करने की बड़ी चुनौती है।
साल 2022 में शिरोमणि अकाली दल केवल 3 सीटें जीत पाईं, उनमें से भी दो विधायकों की राह पार्टी लाइन से अलग दिख रही है। एक विधायक मनप्रीत सिंह अयाली तो खुले तौर पर अकाली दल (वारिस पंजाब दे) को समर्थन दे चुके हैं। ऐसी स्थिति शिअद के समक्ष पहली बार बनी है। पार्टी की वर्तमान सियासी हालातों के मद्देनजर शिअद हाईकमान भी इस वक्त अपने वजूद के लिए सधी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है और इसके लिए पार्टी को सबसे बड़ी आस है भाजपा के साथ गठबंधन की।
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शिरोमणि अकाली दल लंबे समय तक पंजाब की पंथक राजनीति का सबसे मजबूत सियासी दल रहा है। सिख धार्मिक संस्थाओं, खासकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी (एसजीपीसी) पर प्रभाव और पंथक मुद्दों पर पकड़ के चलते उसे सूबे में बड़ा सिख जनाधार मिला। पिछले एक दशक में देखें तो यह पकड़ थोड़ी कमजोर हुई। साल 2017 के बाद पार्टी का परंपरागत वोट बैंक खिसका और 2022 में उसकी चुनावी ताकत ऐतिहासिक रूप से सिमट गई। इसी के चलते अब शिअद के सामने पंथक आधार को फिर मजबूत करने की बड़ी चुनौती है।
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साल 2022 में शिरोमणि अकाली दल केवल 3 सीटें जीत पाईं, उनमें से भी दो विधायकों की राह पार्टी लाइन से अलग दिख रही है। एक विधायक मनप्रीत सिंह अयाली तो खुले तौर पर अकाली दल (वारिस पंजाब दे) को समर्थन दे चुके हैं। ऐसी स्थिति शिअद के समक्ष पहली बार बनी है। पार्टी की वर्तमान सियासी हालातों के मद्देनजर शिअद हाईकमान भी इस वक्त अपने वजूद के लिए सधी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है और इसके लिए पार्टी को सबसे बड़ी आस है भाजपा के साथ गठबंधन की।
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गठबंधन के मायने क्या?
साल 1997 से लेकर साल 2022 तक पंजाब में छह विधानसभा चुनावों का ट्रेंड देखें तो तीन बार शिअद ने भाजपा के साथ गठबंधन में सरकार बनाई है। दो बार कांग्रेस और एक बार आम आदमी पार्टी सत्ता में आई। इससे पहले भी शिअद विभिन्न जत्थेबंदियों के दम पर सत्ता में रह चुकी है मगर शहरी वोट बैंक साधने के लिए खासताैर पर ग्रामीण परिवेश की पार्टी माने जाने वाली शिअद को भाजपा से दोस्ती ज्यादा रास आई।
साल 2020 में शिअद ने किसान आंदोलन को समर्थन देते हुए भाजपा से दोस्ती तोड़ दी। नतीजतन साल 2022 के विधानसभा और साल 2024 के लोकसभा चुनाव में शिअद सिमटकर रह गई। अब शिअद नेता चाहते हैं कि भाजपा के साथ दोबारा गठबंधन हो जाए मगर गेंद भाजपा के पाले में हैं। उधर, राजनीतिक मामलों के जानकारी परमजीत सिंह कहते हैं कि यदि यह गठबंधन हो जाता तो शिअद-भाजपा के लिए चाैथी बार सत्ता वापसी की प्रबल संभावनाएं बनती हैं।
रैलियों का दाैर शुरू
भाजपा का साथ मिले या न मिले फिलहाल शिअद ने ‘पंजाब बचाओ’ रैलियों का दूसरा चरण शुरू कर दिया है। पहले चरण में शिअद अध्यक्ष सुखबीर बादल 47 विधानसभा क्षेत्रों में यह रैलियां कर चुके हैं। इस बार शिअद की लड़ाई विरोधी दलों के साथ-साथ पंथक एजेंडों को साथ लेकर चलने वाले शिअद (पुनर सुरजीत) व अकाली दल (वारिस पंजाब दे) से भी है। कांग्रेस और आप को भीशिअद निशाने पर ले रही है मगर भाजपा के खिलाफ बयानबाजी से फिलहाल परहेज कर रही है।
साल 1997 से लेकर साल 2022 तक पंजाब में छह विधानसभा चुनावों का ट्रेंड देखें तो तीन बार शिअद ने भाजपा के साथ गठबंधन में सरकार बनाई है। दो बार कांग्रेस और एक बार आम आदमी पार्टी सत्ता में आई। इससे पहले भी शिअद विभिन्न जत्थेबंदियों के दम पर सत्ता में रह चुकी है मगर शहरी वोट बैंक साधने के लिए खासताैर पर ग्रामीण परिवेश की पार्टी माने जाने वाली शिअद को भाजपा से दोस्ती ज्यादा रास आई।
साल 2020 में शिअद ने किसान आंदोलन को समर्थन देते हुए भाजपा से दोस्ती तोड़ दी। नतीजतन साल 2022 के विधानसभा और साल 2024 के लोकसभा चुनाव में शिअद सिमटकर रह गई। अब शिअद नेता चाहते हैं कि भाजपा के साथ दोबारा गठबंधन हो जाए मगर गेंद भाजपा के पाले में हैं। उधर, राजनीतिक मामलों के जानकारी परमजीत सिंह कहते हैं कि यदि यह गठबंधन हो जाता तो शिअद-भाजपा के लिए चाैथी बार सत्ता वापसी की प्रबल संभावनाएं बनती हैं।
रैलियों का दाैर शुरू
भाजपा का साथ मिले या न मिले फिलहाल शिअद ने ‘पंजाब बचाओ’ रैलियों का दूसरा चरण शुरू कर दिया है। पहले चरण में शिअद अध्यक्ष सुखबीर बादल 47 विधानसभा क्षेत्रों में यह रैलियां कर चुके हैं। इस बार शिअद की लड़ाई विरोधी दलों के साथ-साथ पंथक एजेंडों को साथ लेकर चलने वाले शिअद (पुनर सुरजीत) व अकाली दल (वारिस पंजाब दे) से भी है। कांग्रेस और आप को भीशिअद निशाने पर ले रही है मगर भाजपा के खिलाफ बयानबाजी से फिलहाल परहेज कर रही है।