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शिअद (पुनर्सुरजीत) में खींचतान: भाजपा से गठबंधन में जनभावना का डर, वारिस पंजाब दे से ध्रुवीकरण का खतरा

Sat, 05 Sep 2026 03:13 PM IST
Nivedita सुशील कुमार, संवाद, सुनाम
सुशील कुमार, संवाद, सुनाम Published by: Nivedita Updated Sat, 05 Sep 2026 03:13 PM IST
सार
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पारंपरिक अकाली दल से अलग होकर अपना वजूद तलाश रही पुनर्सुरजीत अकाली दल के लिए यह फैसला केवल एक चुनाव का नहीं, बल्कि उसके भविष्य का है। एक तरफ मुख्यधारा की राजनीति है, तो दूसरी तरफ पंथक पहचान का दबाव।

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SAD punarsurjit BJP alliance Waris Punjab De giani harpreet singh
असमंजस में शिअद पुनर्सुरजीत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब में सियासी जमीन तलाश रहा शिअद पुनर्सुरजीत वर्तमान में एक बड़े सियासी भंवर में फंसा नजर आ रहा है। राज्य में रोजाना बदलते सियासी समीकरणों के बीच पार्टी तय नहीं कर पा रही है कि वह राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा बने या पंथक उभार की लहर पर सवार वारिस पंजाब दे के साथ हाथ मिलाए। 

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पार्टी के वरिष्ठ नेता ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा है कि पंजाब और पंथक हितों के आधार पर पार्टी के लिए भाजपा और वारिस पंजाब दे दोनों से समझौते के विकल्प खुले हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि 1996 की तरह बिना शर्त आत्मसमर्पण करने के बजाय इस बार शर्तें तय की जाएंगी और किसी भी कीमत पर बादल परिवार के साथ कोई समझौता नहीं होगा। 
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ज्ञानी हरप्रीत सिंह के बयानों में अक्सर यह स्पष्ट किया जाता है कि वे किसी व्यक्तिगत सत्ता के लिए नहीं बल्कि पंथक प्राथमिकताओं (जैसे बंदी सिंहों की रिहाई, पंजाब के पानी का मुद्दा) की शर्त पर ही किसी राजनीतिक समझौते के पक्षधर हैं। 
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अंदरूनी खींचतान और वैचारिक द्वंद्व पार्टी नेतृत्व की यह खुली नीति केवल सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर संगठनात्मक स्तर पर भी खींचतान बढ़ा रही है। एक तरफ जहां जमीनी कार्यकर्ता और उग्र पंथक धड़ा वारिस पंजाब दे के साथ जाने का दबाव बना रहा है, वहीं शीर्ष नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा से जुड़कर मुख्यधारा की सत्ता का ढांचा हासिल करना चाहता है। 

एनडीए का विकल्प: सत्ता और राष्ट्रीय ढांचे का लाभ, पर जनभावना का डर 
भाजपा ( एनडीए ) के साथ जाने से पार्टी को चुनाव में एक मजबूत ढांचा और केंद्र का समर्थन मिल सकता है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती बंदी सिंहों की रिहाई, चंडीगढ़ पर पंजाब का हक और जल बंटवारे जैसे प्रांतीय मुद्दे हैं। यदि केंद्र इन मुद्दों पर ठोस भरोसा नहीं देता, तो भाजपा के साथ जाने से ग्रामीण व पंथक मतदाताओं में नकारात्मक संदेश जाने का बड़ा जोखिम है। 

वारिस पंजाब दे का रुख: पंथक जमीन का आधार, पर ध्रुवीकरण का डर 
दूसरी ओर वारिस पंजाब दे और अन्य पंथक गुटों के साथ जाने से पार्टी को युवाओं और कट्टर सिख समर्थकों का सीधा साथ मिल सकता है। पंथक सोच के खालीपन को भरने के लिए यह रास्ता मुफीद माना जा रहा है। हालांकि, इस गुट के कड़े रुख के कारण मुख्यधारा के आम और शहरी मतदाताओं को साधना शिअद (पुनर्सुरजीत) के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। 


पारंपरिक अकाली दल से अलग होकर अपना वजूद तलाश रही पुनर्सुरजीत अकाली दल के लिए यह फैसला केवल एक चुनाव का नहीं, बल्कि उसके भविष्य का है। एक तरफ मुख्यधारा की राजनीति है, तो दूसरी तरफ पंथक पहचान का दबाव। जब तक पार्टी इस दुविधा से निकलकर अपनी दिशा तय नहीं करती, तब तक पंजाब के चुनावी रण में उसकी स्थिति डगमगाती ही दिखाई देगी।  

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