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फिर करीब आ रहे भाजपा-अकाली: पंजाब में गठबंधन की चर्चा तेज, बीजेपी इस बार बड़े भाई की भूमिका के लिए तैयार
Tue, 01 Sep 2026 09:33 AM IST
Nivedita
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर
Published by: Nivedita
Updated Tue, 01 Sep 2026 09:33 AM IST
पंजाब और अकाली दल के बीच पंजाब में 1996 से 2020 तक गठबंधन रहा था। उस समय अकाली दल 94 और भाजपा 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। इस गठबंधन ने 1997, 2007 और 2012 में पंजाब में सरकार बनाई। 2020 में कृषि कानूनों पर गठजोड़ टूट गया था।
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भाजपा-अकाली दल गठबंधन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
पंजाब की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच दोबारा गठबंधन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। करीब छह साल पहले कृषि कानूनों के मुद्दे पर यह पुराना रिश्ता टूट गया था। इस बार सीटों के बंटवारे और दोनों दलों की बदली राजनीतिक हैसियत सबसे बड़ा सवाल है। सूत्रों के अनुसार, भाजपा गठबंधन में लगभग 60 विधानसभा सीटों पर दावा करने की तैयारी में है।
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यह नया तरीका 1996 से 2020 तक चले पुराने समीकरण से बिल्कुल अलग होगा। उस समय अकाली दल 94 और भाजपा 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। 1996 में मोगा सम्मेलन के बाद अकाली-भाजपा गठबंधन पंजाब का सबसे मजबूत चुनावी समीकरण बना था। अकाली दल ग्रामीण और सिख क्षेत्रों में मजबूत था, जबकि भाजपा शहरी हिंदू मतदाताओं में।
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अकाली दल केंद्र में एनडीए का हिस्सा रहा और अटल बिहारी वाजपेयी तथा नरेंद्र मोदी की सरकारों में भी शामिल था। इस पूरे दौर में भाजपा गठबंधन में लगातार छोटे साझेदार की भूमिका में रही। सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के विवाद के कारण अकाली दल ने भाजपा से नाता तोड़ दिया। इससे करीब 24 साल पुराना औपचारिक गठबंधन समाप्त हो गया।
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बदली भाजपा की राजनीतिक हैसियत
गठबंधन टूटने के बाद भाजपा को पंजाब में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तैयार करने की चुनौती मिली। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी के साथ गठबंधन किया। पार्टी केवल दो सीटें जीत सकी और उसका वोट फीसदी करीब 6.6 रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव ने तस्वीर काफी हद तक बदल दी। भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ते हुए भले ही कोई सीट नहीं जीती पर उसका वोट फीसदी बढ़कर 18.56 तक पहुंच गया। पहली बार पंजाब में भाजपा का वोट फीसदी अकाली दल से अधिक रहा।
भाजपा का बढ़ता आधार और आत्मविश्वास
इस प्रदर्शन ने भाजपा को विश्वास दिया कि वह अब केवल शहरी सीटों तक सीमित नहीं है। 2026 के निकाय चुनावों में भी भाजपा ने शहरी क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने का दावा किया। अबोहर और पठानकोट जैसे क्षेत्रों में पार्टी ने अपनी मौजूदगी दिखाई। भाजपा ने कांग्रेस और अकाली दल के कई बड़े नेताओं को अपने साथ जोड़ा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह, सुनील जाखड़ और मनप्रीत सिंह बादल जैसे नेता भाजपा में आए। इससे पार्टी को पंजाब की ग्रामीण और सिख राजनीति में भी आधार बढ़ाने का अवसर मिला।
सीट बंटवारे पर नई चुनौती
भाजपा संगठन में भी सिख चेहरों को प्रमुखता देने की रणनीति दिख रही है। केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब भाजपा अध्यक्ष बनाया जाना इसी रणनीति का हिस्सा है। यही बदली हुई राजनीतिक स्थिति अब संभावित गठबंधन के सीट बंटवारे में दिख रही है। भाजपा पुराने 94-23 तरीके पर लौटने के बजाय बराबरी के राजनीतिक साझेदार के रूप में बातचीत करना चाहती है। अकाली दल के लिए भी भाजपा के साथ गठबंधन आसान नहीं होगा। 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा में उसका प्रदर्शन कमजोर रहा है।
गठबंधन टूटने के बाद भाजपा को पंजाब में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तैयार करने की चुनौती मिली। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी के साथ गठबंधन किया। पार्टी केवल दो सीटें जीत सकी और उसका वोट फीसदी करीब 6.6 रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव ने तस्वीर काफी हद तक बदल दी। भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ते हुए भले ही कोई सीट नहीं जीती पर उसका वोट फीसदी बढ़कर 18.56 तक पहुंच गया। पहली बार पंजाब में भाजपा का वोट फीसदी अकाली दल से अधिक रहा।
भाजपा का बढ़ता आधार और आत्मविश्वास
इस प्रदर्शन ने भाजपा को विश्वास दिया कि वह अब केवल शहरी सीटों तक सीमित नहीं है। 2026 के निकाय चुनावों में भी भाजपा ने शहरी क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने का दावा किया। अबोहर और पठानकोट जैसे क्षेत्रों में पार्टी ने अपनी मौजूदगी दिखाई। भाजपा ने कांग्रेस और अकाली दल के कई बड़े नेताओं को अपने साथ जोड़ा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह, सुनील जाखड़ और मनप्रीत सिंह बादल जैसे नेता भाजपा में आए। इससे पार्टी को पंजाब की ग्रामीण और सिख राजनीति में भी आधार बढ़ाने का अवसर मिला।
सीट बंटवारे पर नई चुनौती
भाजपा संगठन में भी सिख चेहरों को प्रमुखता देने की रणनीति दिख रही है। केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब भाजपा अध्यक्ष बनाया जाना इसी रणनीति का हिस्सा है। यही बदली हुई राजनीतिक स्थिति अब संभावित गठबंधन के सीट बंटवारे में दिख रही है। भाजपा पुराने 94-23 तरीके पर लौटने के बजाय बराबरी के राजनीतिक साझेदार के रूप में बातचीत करना चाहती है। अकाली दल के लिए भी भाजपा के साथ गठबंधन आसान नहीं होगा। 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा में उसका प्रदर्शन कमजोर रहा है।