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हिमाचल हाईकोर्ट: सेवामुक्ति सबसे कठोर सजा, बर्खास्तगी के फैसले को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदला

Sun, 23 Aug 2026 05:30 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sun, 23 Aug 2026 05:30 AM IST
सार
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प्रदेश हाईकोर्ट ने कृषि विभाग के एक अधिकारी की सेवा के बाद बर्खास्तगी के फैसले को अनुचित करार देते हुए इसे रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि 19 वर्ष की लंबी सेवा और पारिवारिक परिस्थितियों को देखते हुए विभाग की ओर से दी गई बर्खास्ती की सजा बेहद कठोर और आत्मा को झकझोरने वाली थी। 

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Himachal High Court: Removal from service is the harshest penalty; dismissal order converted to compulsory ret
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कृषि विभाग के एक अधिकारी की सेवा के बाद बर्खास्तगी के फैसले को अनुचित करार देते हुए इसे रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने बर्खास्तगी के आदेश को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में तबदील कर दिया है। अदालत ने माना कि 19 वर्ष की लंबी सेवा और पारिवारिक परिस्थितियों को देखते हुए विभाग की ओर से दी गई बर्खास्ती की सजा बेहद कठोर और आत्मा को झकझोरने वाली थी। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने यह फैसला रक्ष पाल मामले में सुनाया। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सेवामुक्ति सबसे कठोर सजा है, जो न केवल कर्मचारी बल्कि उसके पूरे आश्रित परिवार को आर्थिक और सामाजिक रूप से तबाह कर देती है। इसलिए इसका इस्तेमाल केवल अति-गंभीर मामलों (जैसे भ्रष्टाचार या धोखाधड़ी) में ही किया जाना चाहिए। खंडपीठ ने साथ ही कर्मचारी को सेवामुक्ति की तिथि से नियमानुसार सभी परिणामी वित्तीय लाभ 8 सप्ताह के भीतर प्रदान करने के निर्देश दिए हैं।

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अगस्त 2018 में याचिकाकर्ता का तबादला कांगड़ा जिला के देहरा से लाहौल-स्पीति के काजा किया गया था। अधिकारी ने अपनी पारिवारिक परिस्थितियों और पत्नी के ज्वालामुखी में कार्यरत होने का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी। इस दौरान वे लंबी अवधि तक ड्यूटी पर शामिल नहीं हुए। विभागीय जांच के बाद नवंबर 2019 में अनुशासनिक प्राधिकरण ने उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया, जिसे बाद में एकल जज ने भी बरकरार रखा था। खंडपीठ ने माना कि यद्यपि कर्मचारी को प्रशासनिक आदेशों का पालन करना चाहिए था, लेकिन 19 वर्ष की बेदाग सेवा के बाद सीधे बर्खास्तगी की सजा देना कानून के समानुपातिकता के सिद्धांत के विपरीत है। विभाग के पास वेतन वृद्धि रोकने या लोअर ग्रेड में डिमोशन जैसी अन्य प्रमुख सजाओं का भी विकल्प मौजूद था। अदालत ने पाया कि कर्मचारी के घर में उनकी वृद्ध और बीमार मां, टीबी से पीड़ित सास और गले के कैंसर से जूझ रहा बच्चा था। ऐसे में अदालतों का दरवाजा खटखटाना और ड्यूटी से अनुपस्थित रहना दुर्भावनापूर्ण नहीं, बल्कि पारिवारिक मजबूरियों का परिणाम था।

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