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आगरा कॉलेज: डिजिटाइजेशन के नाम पर 12 साल पहले ले गए दुर्लभ किताबें, 18 कर दीं गायब

Tue, 03 Nov 2026 10:34 AM IST
Dhirendra Singh अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Tue, 03 Nov 2026 10:34 AM IST
सार
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आगरा कॉलेज की लाइब्रेरी की 32 दुर्लभ पुस्तकों में से रिकॉर्ड मिलान के दौरान 18 उपलब्ध नहीं मिलीं। करीब 12 साल पहले डिजिटाइजेशन के लिए निजी कंपनी को दी गईं किताबें वापस नहीं आईं और डिजिटाइजेशन का काम भी अधूरा रहा।
 

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18 Rare Books Missing from Agra College Library After Digitization Contract
 आगरा कॉलेज - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

 आगरा कॉलेज की ऐतिहासिक लाइब्रेरी में किताबें सुरक्षित रखने के बजाय उनके गायब होने का मामला सामने आया है। करीब 12 साल पहले डिजिटलीकरण के लिए निजी कंपनी को सौंपी गईं दुर्लभ पुस्तकें आज तक वापस नहीं आईं। अब लाइब्रेरी के नए सिरे से डिजिटाइजेशन की तैयारी हुई तो पुराने रिकॉर्ड और पुस्तकों का मिलान किया गया।
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32 दुर्लभ पुस्तकों की सूची में से सिर्फ 14 ही उपलब्ध मिलीं। 18 पुस्तकें गायब बताई जा रही हैं। इनमें इतिहास, फारसी साहित्य, मुगलकालीन दस्तावेज और चित्रकला से जुड़ी महत्वपूर्ण पुस्तकें शामिल हैं। कॉलेज की ऐतिहासिक धरोहर का यह नुकसान वर्षों तक रिकॉर्ड में दबा रहा।
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आगरा कॉलेज के प्राचार्य प्रो. सीके गौतम ने बताया कि कॉलेज की सेंट्रल लाइब्रेरी का करीब एक से डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से पुनर्निर्माण कराया जाना है। इसका जिम्मा लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) को दिया जाएगा। इसके साथ ही लाइब्रेरी में रखी पुस्तकों के डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया शुरू कराई गई है। इसी दौरान दुर्लभ पुस्तकों की सूची का मिलान हुआ तो कई पुस्तकें उपलब्ध नहीं मिलीं।
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करीब 12 साल पहले तत्कालीन प्राचार्य ने पुस्तकों के डिजिटाइजेशन के लिए एक निजी कंपनी को ठेका दिया गया था। कंपनी लाइब्रेरी से महत्वपूर्ण पुस्तकें अपने साथ ले गई लेकिन न तो डिजिटाइजेशन का काम पूरा किया और न ही पुस्तकें वापस कीं।

कॉलेज प्रशासन की ओर से कंपनी को कई बार पत्र भी लिखे गए लेकिन पुस्तकें नहीं लौटाई गईं। उनके बाद बने प्राचार्य ने 4 दुर्लभ किताबें बिना एंट्री के मिलने वाले शोधार्थी को दे दीं। इनमें उर्दू की अकबरनामा के पहले और तीसरे खंड, मास्टर थीसिस, राजपूत वॉल्यूम और रंगीन चित्रकला, शाहनामा-ए-फिरदोसी, जंगीरी उर्दू आदि से संबंधित पुस्तकें हैं।

दुर्लभ किताबों के लिए बनेगा अलग से कक्ष
प्राचार्य ने बताया कि दुर्लभ पुस्तकों का डिजिटलीकरण होने से ऐतिहासिक और शोध संबंधी सामग्री को संरक्षित किया जा सकेगा। इससे नैक मूल्यांकन में भी कॉलेज को बेहतर प्रदर्शन करने में मदद मिल सकती है। इसलिए बची हुईं दुर्लभ किताबों व पांडुलिपियों के लिए अलग से कक्ष तैयार कराएंगे व उनका डिजिटाइजेशन करा रहे हैं।


बाबरनामा की दुर्लभ प्रति के लिए मौलाना आजाद भी पहुंचे थे कॉलेज
राजीव सक्सेना, सिविल सोसायटी आगरा के सदस्य राजीव सक्सेना ने बताया कि आगरा कॉलेज की स्थापना 1823 में हुई थी। पुस्तकालय भी स्थापना के समय का है। लाइब्रेरी में 19वीं सदी के दुर्लभ प्रकाशनों, अप्राप्य पुस्तकों और पांडुलिपियों का एक बड़ा संग्रह रहा है। आगरा कॉलेज की लाइब्रेरी में बाबरनामा (तुजुक-ए-बाबरी) की एक दुर्लभ प्रति थी, उसके पन्नों पर सोने की स्याही का काम और विशेष हस्तलिपि थी। तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद इस पुस्तक को देखने कॉलेज पहुंचे थे। वे इसे दिल्ली ले जाकर संरक्षित कराना चाहते थे, लेकिन कॉलेज प्रबंधन ने इसे अपनी ऐतिहासिक विरासत बताते हुए देने से इन्कार कर दिया था। बाद में किताब लौटाने की शर्त के साथ दी गई। इसकी माइक्रोफिल्म तैयार कराई गई, ताकि दिल्ली में भी इतिहासकार इसका अध्ययन कर सकें।

 
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