{"_id":"6a8e9441a7d672536800d961","slug":"agra-district-hospital-patients-struggle-as-doctors-remain-absent-from-opd-2026-08-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"जिला अस्पताल बीमार: दोपहर 2 बजे तक डॉक्टरों के कमरे खाली, इलाज की आस में भटकते रहे मरीज; पड़ताल में खुली पोल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जिला अस्पताल बीमार: दोपहर 2 बजे तक डॉक्टरों के कमरे खाली, इलाज की आस में भटकते रहे मरीज; पड़ताल में खुली पोल
Wed, 26 Aug 2026 12:52 PM IST
Dhirendra Singh
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Wed, 26 Aug 2026 12:52 PM IST
आगरा के जिला अस्पताल की ओपीडी में मंगलवार को दोपहर 2 बजे तक कई चिकित्सकों के कक्ष खाली पड़े रहे, जिससे दूरदराज से आए मरीज इलाज के लिए भटकते रहे। एक मरीज के बेहोश होने और बुजुर्ग के सहायता के लिए कक्षों के चक्कर लगाने समेत कई मामलों ने अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े किए हैं।
विज्ञापन
यह सरकारी अस्पताल है
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
यह सरकारी अस्पताल है। होना तो यहां मरीजों का इलाज चाहिए लेकिन यहां की व्यवस्थाएं खुद लाचार हैं। यहां बेबस और बीमार इलाज की आस में आते हैं लेकिन चिकित्सकों की लापरवाही और संवेदनहीनता के चलते मर्ज से पहले मरीज का मनोबल टूट जाता है। मंगलवार को जिला अस्पताल की ओपीडी में दूरदराज से इलाज की आस में आए रोगी इलाज के लिए दर-दर भटकते नजर आए। दोपहर 2 बजे तक संबंधित चिकित्सक के नहीं आने से तमाम लोग बैरंग ही लौट गए।
अचेत पड़ा था बीमार भाई, नहीं किया भर्ती
फतेहपुर सीकरी से आई रेनू के भाई को तेज बुखार था। सुबह 10 बजे पर्चा बनवाने के बाद जांच कराई गई। इस दौरान भाई की तबीयत ज्यादा बिगड़ी तो वह वहीं परिसर में ही बेहोश हो गया। रेनू उसको भर्ती कराने के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे के चक्कर काटती रही। जिस डॉक्टर के कक्ष के बाहर उसे बैठने को कहा गया था, वहां दोपहर 2 बजे तक कोई चिकित्सक नहीं पहुंचा। रोती-बिलखती रेनू सिर्फ एक ही बात कह रही थी कि चाहे किसी की जान चली जाए, यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
अपनों को तरजीह, आम मरीज परेशान
जगदीशपुरा निवासी आशा की गंभीर किडनी रोग से जूझ रही है। वह सुबह 10 बजे ही अस्पताल पहुंच गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि यहां इलाज में भी सिफारिश और सगे-संबंधियों को प्राथमिकता दी जाती है। सामान्य मरीजों को टरका दिया जाता है। आशा ने बताया कि उन्होंने 24 अगस्त को अपनी जांचें कराई थीं। 25 अगस्त को रिपोर्ट दिखाकर आगे की दवाई लेने आई थीं, लेकिन दोपहर 2 बजे तक संबंधित चिकित्सक अपने कक्ष में नहीं पहुंचे। इसके बाद निराश होकर वह बिना परामर्श के ही वापस लौट गईं?
विज्ञापन
भटकते रहे 85 साल के भूरी सिंह
मधु नगर से आए 85 वर्षीय भूरी सिंह की सुनने की क्षमता बेहद कम थी। बातचीत में उन्होंने बताया कि तीन बेटे हैं, लेकिन कोई भी उन्हें पास रखने को तैयार नहीं। लिहाजा उम्र के इस पड़ाव और लाचारी में वह अकेले ही किसी तरह जिला अस्पताल पहुंचे। पर्ची पर लिखे निर्देशों को वह समझ नहीं पा रहे थे। अस्पताल प्रशासन का रवैया इतना गैर-जिम्मेदाराना रहा कि सहायता के लिए न तो उनके साथ कोई वार्ड बॉय भेजा गया और न ही किसी कर्मचारी ने आगे बढ़कर मदद की। बुजुर्ग पर्चा हाथ में लिए अस्पताल के प्रत्येक कक्ष के चक्कर काटते रहे। संवाद
जिला अस्पताल की प्रमुख अधीक्षिका (एसआईसी) डॉ. संगीता राठौर ने बताया कि जिला अस्पताल में स्टाफ की कमी के बावजूद मरीजों की सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाता है। अस्पताल परिसर में यदि किसी मरीज को कोई भी समस्या होती है तो वे सीधे मुझसे संपर्क कर सकते हैं। हर स्थिति में उनकी समस्या का समाधान और संभव मदद की जाएगी।
विज्ञापन
अचेत पड़ा था बीमार भाई, नहीं किया भर्ती
फतेहपुर सीकरी से आई रेनू के भाई को तेज बुखार था। सुबह 10 बजे पर्चा बनवाने के बाद जांच कराई गई। इस दौरान भाई की तबीयत ज्यादा बिगड़ी तो वह वहीं परिसर में ही बेहोश हो गया। रेनू उसको भर्ती कराने के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे के चक्कर काटती रही। जिस डॉक्टर के कक्ष के बाहर उसे बैठने को कहा गया था, वहां दोपहर 2 बजे तक कोई चिकित्सक नहीं पहुंचा। रोती-बिलखती रेनू सिर्फ एक ही बात कह रही थी कि चाहे किसी की जान चली जाए, यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
विज्ञापन
अपनों को तरजीह, आम मरीज परेशान
जगदीशपुरा निवासी आशा की गंभीर किडनी रोग से जूझ रही है। वह सुबह 10 बजे ही अस्पताल पहुंच गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि यहां इलाज में भी सिफारिश और सगे-संबंधियों को प्राथमिकता दी जाती है। सामान्य मरीजों को टरका दिया जाता है। आशा ने बताया कि उन्होंने 24 अगस्त को अपनी जांचें कराई थीं। 25 अगस्त को रिपोर्ट दिखाकर आगे की दवाई लेने आई थीं, लेकिन दोपहर 2 बजे तक संबंधित चिकित्सक अपने कक्ष में नहीं पहुंचे। इसके बाद निराश होकर वह बिना परामर्श के ही वापस लौट गईं?
विज्ञापन
भटकते रहे 85 साल के भूरी सिंह
मधु नगर से आए 85 वर्षीय भूरी सिंह की सुनने की क्षमता बेहद कम थी। बातचीत में उन्होंने बताया कि तीन बेटे हैं, लेकिन कोई भी उन्हें पास रखने को तैयार नहीं। लिहाजा उम्र के इस पड़ाव और लाचारी में वह अकेले ही किसी तरह जिला अस्पताल पहुंचे। पर्ची पर लिखे निर्देशों को वह समझ नहीं पा रहे थे। अस्पताल प्रशासन का रवैया इतना गैर-जिम्मेदाराना रहा कि सहायता के लिए न तो उनके साथ कोई वार्ड बॉय भेजा गया और न ही किसी कर्मचारी ने आगे बढ़कर मदद की। बुजुर्ग पर्चा हाथ में लिए अस्पताल के प्रत्येक कक्ष के चक्कर काटते रहे। संवाद
जिला अस्पताल की प्रमुख अधीक्षिका (एसआईसी) डॉ. संगीता राठौर ने बताया कि जिला अस्पताल में स्टाफ की कमी के बावजूद मरीजों की सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाता है। अस्पताल परिसर में यदि किसी मरीज को कोई भी समस्या होती है तो वे सीधे मुझसे संपर्क कर सकते हैं। हर स्थिति में उनकी समस्या का समाधान और संभव मदद की जाएगी।