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नौरता संस्कृति: पहचान सिमट रही, गांवों में अब भी कायम है उत्साह, आज भी रंग भर रहीं गांव की बेटियां

Mon, 12 Oct 2026 06:29 PM IST
Chaman Kumar Sharma रिंकू शर्मा, अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़
रिंकू शर्मा, अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़ Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Mon, 12 Oct 2026 06:29 PM IST
सार
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बदलती जीवनशैली के बीच नौरता जैसी लोक परंपराओं का जिक्र कम होता जा रहा है। शहरों में इसकी मौजूदगी कम दिखाई देती है और गांवों में भी ऐसे परिवार कम नजर आते हैं, जहां बेटियां मिलकर इसे मनाती हों।

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Village Girls Keep Naurta Folk Tradition Alive in Braj
केशोपुर जोफरी में नौरता की आकृति बनातीं युवतियां - फोटो : संवाद

विस्तार

अलीगढ़ और आसपास के ब्रज क्षेत्र की नौरता-नौरती परंपरा धीरे-धीरे सिमट रही है। शहरों में इसके आयोजन कम दिखाई देते हैं। गांवों में भी गिनती के आंगनों में बेटियां इस लोकपरंपरा को सहेज रही हैं। बदलते समय के बीच नौरता के रंग आज भी गांव की बेटियों के हाथों में जिंदा हैं। रविवार को लोधा क्षेत्र के केशोपुर गांव की अंशिका, प्राची, गुंजन और राशि ने बताया कि उन्हें हर साल नौरता का इंतजार रहता है। 

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हालांकि, गांव में भी अब बहुत कम घर बचे हैं, जहां सहेलियां मिलकर नौरता-नौरती बनाती और परंपरा निभाती हैं। राशि कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने के लिए शहर जाती हैं। वह बताती हैं कि जब अपनी कक्षा की दूसरी सहेलियों से नौरता की बातें साझा करती हैं, तो वे हैरानी से देखती हैं। उनकी प्रतिक्रिया से लगता है कि जैसे उनके लिए यह परंपरा किसी अनसुनी बात से कम नहीं है।

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भोर में लोकगीतों के साथ शुरू होता है उत्सव
बुंदेलखंड के साथ अलीगढ़ और आगरा मंडल के क्षेत्रों में नौरता-नौरती की परंपरा रही है। नवरात्र के दौरान कन्याएं घर के आंगन में नौरतिया, उसके भाई और सहेली की आकृतियां बनाती हैं। उन्हें सजाती हैं और अपने हाथों से रंग भरती हैं। इसके बाद सुबह तारों की छांव में नौ दिन तक गौरा की पूजा की जाती है। इन दिनों केशोपुर गांव में सूरज निकलने से पहले सहेलियों की टोलियां इस परंपरा को निभाती दिखाई दे रही हैं। उनके लोकगीतों से सुबह का सन्नाटा टूटता है—

सूरज सविता खोलो न किवाड़,
बेटियां ठाड़ी हैं दरबार।
हमनाय खोलेंगे किवाड़,
बिटियां लौट घर जाओ।
तुम्हारी गौर को टीका लाए,
तुम्हारी गौर को बिंदी लाए।
सूरज सविता खोलो न किवाड़,
बेटियां ठाड़ी हैं दरबार।

लोकगीतों, पूजा और सामूहिक उल्लास के बीच नौ दिन तक चलने वाला यह उत्सव विजयदशमी पर संपन्न होता है। नौरता केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सहेलियों के साथ जुड़ने और पीढ़ियों से चली आ रही लोकसंस्कृति को जानने का अवसर भी है। बुजुर्ग महिलाओं से सीखे गए गीत और रीति-रिवाज बेटियों के जरिये अगली पीढ़ी तक पहुंचते हैं।

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अपने हाथों से सजाती हैं परंपरा के रंग
नौरता की खासियत है कि इसकी तैयारी में बेटियां खुद जुटती हैं। आंगन में चौक बनाना, आकृतियों को आकार देना और उनमें रंग भरना उनके लिए उत्साह से भरा काम है। सहेलियां मिलकर इन्हें सजाती हैं और फिर पारंपरिक गीतों के साथ पूजा करती हैं। इस दौरान घर-आंगन रंगों और लोकगीतों से भर उठता है। यह ऐसा उत्सव है, जिसमें सजावट के साथ लोकसंस्कृति भी अगली पीढ़ी तक पहुंचती है।

पहचान सिमट रही, गांवों में अब भी कायम है उत्साह
बदलती जीवनशैली के बीच नौरता जैसी लोक परंपराओं का जिक्र कम होता जा रहा है। शहरों में इसकी मौजूदगी कम दिखाई देती है और गांवों में भी ऐसे परिवार कम नजर आते हैं, जहां बेटियां मिलकर इसे मनाती हों। केशोपुर की अंशिका, प्राची, गुंजन और राशि जैसी लड़कियां इस परंपरा को पूरे उत्साह से निभा रही हैं। उनके लिए नौरता पुरानी रस्म भर नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और सहेलियों के साथ जुड़ने का अवसर है। नौरता के सजे चौक और भोर में गूंजते लोकगीत बताते हैं कि लोक संस्कृति आज भी गांवों के आंगनों में सांस ले रही है, लेकिन इस परंपरा को सहेजने की जरूरत भी उतनी ही है, ताकि आने वाली पीढ़ियां नौरता को केवल बुजुर्गों के किस्सों में न सुनें, बल्कि इसके रंगों और गीतों को अपने जीवन में भी महसूस कर सकें।

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