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Gonda News: अवैध खनन मामले में सांसद करण भूषण को बड़ी राहत
Fri, 21 Aug 2026 11:22 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Fri, 21 Aug 2026 11:22 PM IST
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गोंडा। कैसरगंज से भाजपा सांसद करण भूषण सिंह को अवैध खनन के सात वर्ष पुराने मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने उनकी फर्म मेसर्स नंदिनी इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगे पांच करोड़ रुपये के जुर्माने और रॉयल्टी जमा करने के तत्कालीन जिलाधिकारी के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने बुधवार को सांसद की याचिका पर यह फैसला सुनाया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अविनाश चंद्रा, आशीष कुमार सिंह और मृगाक्षी नमन ने बताया कि मामला जनवरी 2019 का है। गोंडा के खनन निरीक्षक और भूतत्व एवं खनिकर्म कार्यालय अयोध्या के सर्वेयर ने तरबगंज तहसील के दुर्गागंज में खनन पट्टे का स्थलीय निरीक्षण किया था। इसमें स्वीकृत पट्टे से 1.72 लाख घन मीटर अधिक खनन मिला था। तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. नितिन बंसल ने 15 जून 2019 को फर्म पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। साथ ही बालू की रॉयल्टी और खनिज मूल्य के रूप में 4,88,83,810 रुपये 15 दिन के भीतर जमा करने का आदेश दिया था।
इस आदेश के खिलाफ तत्कालीन आयुक्त की अदालत में अपील की गई, जिसे उन्होंने छह मई 2025 को खारिज कर दिया। इसके बाद सांसद ने शासन में निगरानी याचिका दायर की। भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग की विशेष सचिव जे. रीभा ने 29 मई 2026 को इसे भी निरस्त कर दिया। इसके बाद प्रकरण हाईकोर्ट पहुंचा।
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अधिवक्ता मृगाक्षी नमन के अनुसार, अदालत में दलील दी गई कि जुर्माना गलत तरीके से लगाया गया है। ऐसे मामलों में दंड का आदेश प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को देना चाहिए, जबकि जिलाधिकारी प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट नहीं हैं। न्यायालय ने अन्य तथ्यों के अलावा इस बात पर विशेष गौर किया।
अदालत के अनुसार, ‘यह निर्विवाद है कि प्रतिवादी संख्या पांच (जिलाधिकारी) प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट का न्यायालय नहीं है, जो अकेले इस मामले का संज्ञान ले सकता था। अतः 1963 के नियमों के नियम 57 के अंतर्गत जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेश क्षेत्राधिकार के बिना है और रद्द किए जाने योग्य है।’ वर्तमान मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों के आलोक में रिट याचिका स्वीकृत की जाती है तथा तीनों आदेश रद्द किए जाते हैं। (संवाद)
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याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अविनाश चंद्रा, आशीष कुमार सिंह और मृगाक्षी नमन ने बताया कि मामला जनवरी 2019 का है। गोंडा के खनन निरीक्षक और भूतत्व एवं खनिकर्म कार्यालय अयोध्या के सर्वेयर ने तरबगंज तहसील के दुर्गागंज में खनन पट्टे का स्थलीय निरीक्षण किया था। इसमें स्वीकृत पट्टे से 1.72 लाख घन मीटर अधिक खनन मिला था। तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. नितिन बंसल ने 15 जून 2019 को फर्म पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। साथ ही बालू की रॉयल्टी और खनिज मूल्य के रूप में 4,88,83,810 रुपये 15 दिन के भीतर जमा करने का आदेश दिया था।
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इस आदेश के खिलाफ तत्कालीन आयुक्त की अदालत में अपील की गई, जिसे उन्होंने छह मई 2025 को खारिज कर दिया। इसके बाद सांसद ने शासन में निगरानी याचिका दायर की। भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग की विशेष सचिव जे. रीभा ने 29 मई 2026 को इसे भी निरस्त कर दिया। इसके बाद प्रकरण हाईकोर्ट पहुंचा।
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अधिवक्ता मृगाक्षी नमन के अनुसार, अदालत में दलील दी गई कि जुर्माना गलत तरीके से लगाया गया है। ऐसे मामलों में दंड का आदेश प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट को देना चाहिए, जबकि जिलाधिकारी प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट नहीं हैं। न्यायालय ने अन्य तथ्यों के अलावा इस बात पर विशेष गौर किया।
अदालत के अनुसार, ‘यह निर्विवाद है कि प्रतिवादी संख्या पांच (जिलाधिकारी) प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट का न्यायालय नहीं है, जो अकेले इस मामले का संज्ञान ले सकता था। अतः 1963 के नियमों के नियम 57 के अंतर्गत जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेश क्षेत्राधिकार के बिना है और रद्द किए जाने योग्य है।’ वर्तमान मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों के आलोक में रिट याचिका स्वीकृत की जाती है तथा तीनों आदेश रद्द किए जाते हैं। (संवाद)