यूपी: 50 हजार से 22.22 करोड़ तक पहुंचा जौहर ट्रस्ट का चंदा, सपा सरकार में चंदे में तेजी से हुई बढ़ोतरी
मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और जौहर विश्वविद्यालय के वित्तीय लेनदेन की ईडी और आयकर विभाग जांच कर रहे हैं। सपा नेता आजम खां द्वारा स्थापित ट्रस्ट को 1995-96 में 50 हजार रुपये मिले थे। यह रकम 2015-16 तक बढ़कर 22.22 करोड़ रुपये हो गई।
विस्तार
महज 50 हजार रुपये की शुरुआती पूंजी से शुरू हुआ मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट वक्त के साथ करोड़ों रुपये के चंदे और बड़े शैक्षिक संस्थान के संचालन तक पहुंच गया। सपा नेता आजम खां के राजनीतिक रसूख के बीच सपा सरकार में ट्रस्ट को मिलने वाले चंदे में तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई।
ईडी के रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 1995-96 में ट्रस्ट को मिला 50 हजार रुपये का चंदा वर्ष 2015-16 में बढ़कर 22.22 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसी दौर में रामपुर में जौहर विश्वविद्यालय का विस्तार हुआ। अब ट्रस्ट और विश्वविद्यालय से जुड़े वित्तीय लेनदेन, निर्माण खर्च तथा धन के स्रोत को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और आयकर विभाग की जांच ने पूरे मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है। जांच का अहम सवाल यही है कि ट्रस्ट की आर्थिक गतिविधियों का दायरा कैसे बढ़ा और विभिन्न स्रोतों से मिली रकम का इस्तेमाल किन कार्यों में हुआ। मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट का गठन वर्ष 1990 में हुआ था। सपा नेता आजम खां इसके संस्थापक और अध्यक्ष बने। ट्रस्ट के गठन का उद्देश्य शैक्षिक और सामाजिक गतिविधियों को आगे बढ़ाना था। शुरुआती दौर में इसकी आर्थिक गतिविधियां सीमित थीं, लेकिन समय के साथ ट्रस्ट का दायरा बढ़ता गया।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 1995-96 में ट्रस्ट को 50 हजार रुपये का चंदा मिला था। वर्ष 2005-06 में यह रकम बढ़कर 1.47 करोड़ रुपये और वर्ष 2012-13 में 5.28 करोड़ रुपये हो गई। वर्ष 2015-16 में चंदे की रकम 22.22 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। चंदे के इन आंकड़ों में आया अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस अवधि में आजम खां प्रदेश सरकार में मंत्री रहे और रामपुर में यूनिवर्सिटी सहित कई संस्थागत गतिविधियों का विस्तार हुआ। हालांकि, चंदे में बढ़ोतरी अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण यह है कि रकम किन लोगों, संस्थाओं या कंपनियों से मिली, उसका लेखा-जोखा किस तरह रखा गया और उसे किन मदों में खर्च किया गया।
जौहर यूनिवर्सिटी के विस्तार के साथ बढ़ा खर्च
रामपुर में जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना ट्रस्ट की गतिविधियों का सबसे बड़ा पड़ाव रही। वर्ष 2012 में विश्वविद्यालय को राज्य विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। इसके बाद परिसर में शैक्षिक भवनों और अन्य सुविधाओं का विस्तार हुआ। विश्वविद्यालय के निर्माण में बड़ी रकम खर्च होने का दावा किया गया, लेकिन अब इसी खर्च के हिसाब को लेकर जांच एजेंसियां सवाल उठा रही हैं। ईडी की ओर से दर्ज मामले में यूनिवर्सिटी के निर्माण पर हुए खर्च और ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड के बीच अंतर का आरोप लगाया गया है। जांच से जुड़े विवरणों में 59 भवनों का मूल्यांकन करीब 494.46 करोड़ रुपये बताया गया है, जबकि 416.14 करोड़ रुपये के खर्च का हिसाब उपलब्ध नहीं होने का आरोप सामने आया है। यह जांच एजेंसी का आरोप है। जांच एजेंसियों की पड़ताल के बाद इस प्रकरण की जांच कराई जा रही है।
सरकारी ठेकों और धन के इस्तेमाल पर भी सवाल
जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण को लेकर जांच में ठेकेदारों और सरकारी विभागों से जुड़े लेनदेन का पहलू भी सामने आया है। ईडी की जांच में आरोप लगाया गया है कि सरकारी ठेके हासिल करने वाले ठेकेदारों के माध्यम से यूनिवर्सिटी के निर्माण में सामग्री पहुंचाई गई। ठेकेदारों के बयानों और उपलब्ध वित्तीय रिकॉर्ड के आधार पर एजेंसी धन के प्रवाह की पड़ताल कर रही है।
सरकारी भवनों की लीज और जमीनों के विवाद भी जुड़े
ट्रस्ट और यूनिवर्सिटी का विवाद केवल वित्तीय लेनदेन तक सीमित नहीं रहा। रामपुर में जौहर शोध संस्थान सहित कुछ सरकारी भवनों को लीज पर दिए जाने और उनके इस्तेमाल को लेकर विवाद हुआ। प्रशासन ने लीज की शर्तों से जुड़े मामलों में कार्रवाई करते हुए भवन वापस लेने की प्रक्रिया अपनाई। विश्वविद्यालय के लिए किसानों की जमीनों, शत्रु संपत्ति और खादर की भूमि से संबंधित मामलों में भी आजम खां और उनके परिवार के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए। इन मामलों की कानूनी स्थिति अलग-अलग है। हालांकि, इन विवादों ने ट्रस्ट और विश्वविद्यालय के संचालन, सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल तथा भूमि संबंधी फैसलों को लगातार चर्चा में बनाए रखा।
जौहर ट्रस्ट की शुरुआत से लेकर यूनिवर्सिटी के विस्तार तक की कहानी में चंदे की रकम, संस्थागत विकास और सरकारी संपत्तियों से जुड़े विवाद प्रमुख रहे हैं। अब ईडी और आयकर विभाग की जांच में वित्तीय रिकॉर्ड, दानदाताओं, निर्माण खर्च और लेनदेन की कड़ियां अहम हो गई हैं। चंदे में हुई बढ़ोतरी के आंकड़े ट्रस्ट की आर्थिक गतिविधियों के विस्तार को दिखाते हैं, लेकिन रकम के स्रोत और उसके इस्तेमाल पर अंतिम निष्कर्ष जांच के साक्ष्यों से ही निकलेगा।
जौहर ट्रस्ट का सफर
1990: मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट का गठन।
2012: राज्य सरकार ने यूनिवर्सिटी को दर्जा दिया।
2019: यूनिवर्सिटी के लिए किसानों की जमीन हड़पने और शत्रु संपत्ति पर कब्जे के दर्जनों मामले दर्ज।
2019-2021: यूपी सरकार ने लीज पर दी गई 170 एकड़ जमीन वापस ली, जिस पर हाईकोर्ट ने भी मुहर लगाई।
सितंबर 2022: यूनिवर्सिटी परिसर से नगर पालिका की करोड़ों रुपये की सफाई मशीनें जमीन में दबी मिलीं।
2023: आयकर विभाग के छापे में 60 करोड़ के बजाय लगभग 800 करोड़ रुपये के संदिग्ध खर्च और टैक्स चोरी का खुलासा हुआ।
अप्रैल 2024: आजम खां, उनकी पत्नी और बेटे समेत 13 लोगों पर किसानों की जमीन कब्जाने के 22 मामलों में आरोप तय।
जुलाई 2024: प्रशासन ने यूनिवर्सिटी की 13.8 हेक्टेयर लीज की जमीन पर कब्जा लिया।
अक्तूबर 2024: सुप्रीम कोर्ट ने जौहर ट्रस्ट को दी गई सरकारी जमीनें वापस लेने के फैसले पर मुहर लगाई।
यह बोले विधायक-
जौहर ट्रस्ट के गठन के बाद से लेकर करोड़ों रुपये का चंदा लिया गया। यूनिवर्सिटी के निर्माण में सरकारी धन का इस्तेमाल किया गया। ईडी से इस मामले की शिकायत की गई थी। शिकायत के बाद ईडी इस प्रकरण की जांच कर रही है। जांच में जो तथ्य आए हैं। उसके आधार पर मामला दर्ज किया गया है। आजम के दामन पर दाग लग चुका है। काला धन जमा कर आजम खां ने अपना साम्राज्य खड़ा किया है। आजम ने भ्रष्टाचार का नया इतिहास रचा है। उनको किए की सजा कानून के हिसाब से मिलेगी। कानून अपना काम कर रहा है। -आकाश सक्सेना, शहर विधायक