अल्मोड़ा: दो वक्त की रोटी के लिए परदेस आए थे...पहाड़ की आपदा ने छीन ली जान, जीते-जी घर नहीं लौट सके; मातम
दो वक्त की रोटी कमाने के लिए नेपाल से अल्मोड़ा आए दो बेबस मजदूरों की पहाड़ की आपदा ने जान ले ली। वे उम्मीद और मुस्कान लेकर परदेस निकले थे, पर जीते-जी अपने घर नहीं लौट सके। उनकी मौत की खबर से पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई।
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दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए नेपाल से अल्मोड़ा आए दो बेबस मजदूरों की तकदीर ने ऐसा क्रूर मजाक किया जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। जो मजदूर अपने परिवार का पेट पालने के लिए चेहरे पर एक बड़ी उम्मीद और मुस्कान लिए परदेस निकले थे उनकी जिंदगी पहाड़ की बेरहम आपदा ने हमेशा के लिए छीन ली। वह जीते-जी तो खुशियों के साथ अपने घर नहीं लौट सके लेकिन जब उनकी मौत की खबर सीमा पार उनके गांव पहुंची तो पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई।
सोमवार देर रात नेपाली मूल के दो मजूदरों को इस मानसून की आपदा का दंश निगल गया। धार की तूनी क्षेत्र में मस्जिद के पास दिनेश चंद्र पांडे की ओर से बनाई गई एक कच्ची झोपड़ी नुमा टिनशेड में दो नेपाली नागरिक अपना जीवन बसर कर रहे थे। दलीप दर्जी (33) और चकरा दर्जी (32) रोज सुबह हाथों में कुदाल और फावड़ा थामे शहर की सड़कों पर मेहनत-मजदूरी के लिए निकल जाते थे। दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करने और पसीना बहाने के बाद जो चंद रुपये मिलते उन्हें वे बहुत सहेज कर रखते थे ताकि महीने के अंत में घर पैसे भेज सकें। सोमवार को भी दोनों ने दिनभर मेहनत-मजदूरी की और वह दोनों अपनी इसी कच्ची झोपड़ी में पहुंचे।
चूल्हा जलाया, रूखा-सूखा खाना बनाया और एक-दूसरे के साथ सुख-दुख बांटते हुए भोजन किया। इसके बाद अगली सुबह फिर काम पर जाने की बात कहकर दोनों गहरी नींद में सो गए। उन्हें जरा भी अहसास नहीं था कि बंद आंखों के पीछे छिपे उनके सपने, सुबह का सूरज देखने से पहले ही हमेशा के लिए दफन होने वाले हैं। रात के सन्नाटे और मूसलाधार बारिश के बीच अचानक काल ने दबे पांव दस्तक दी। लगातार हो रही बारिश के कारण नमी और पानी के दबाव से झोपड़ी की एक भारी दीवार अचानक भरभराकर ढह गई। जब तक दोनों गहरी नींद से जागते या संभल पाते, तब तक भारी पत्थरों, मलबे का विशाल रेला सीधे उनके ऊपर आ गिरा। मलबे के नीचे दबने से दोनों मजदूरों की मौत हो गई। घटना की सूचना पर जब राहत और बचाव दल मौके पर पहुंचा और मलबा हटाया, तो भीतर दोनों मजदूर मृत पड़े हुए थे।
सीमा पार उजड़ गए आशियाने
हादसे की खबर सुनते ही अल्मोड़ा में रहने वाले अन्य नेपाली प्रवासियों और मजदूरों में शोक की लहर दौड़ गई। दलीप और चकरा की मौत ने नेपाल में बैठे उनके परिवारों को कभी न भरने वाला जख्म दे दिया है। कुदरत की इस बेरुखी और क्रूरता के आगे अब पूरे गांव में एक गहरी उदासी और बेबसी का मातम पसरा हुआ है।