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रुड़की:  तापमान ही नहीं, भूस्खलन भी बन सकता हिमनद झीलों के टूटने की वजह, वैज्ञानिक के शोध में खुलासा

Fri, 25 Sep 2026 03:40 PM IST
Renu Saklani अंकित गर्ग, संवाद न्यूज एजेंसी, देहरादून
अंकित गर्ग, संवाद न्यूज एजेंसी, देहरादून Published by: Renu Saklani Updated Fri, 25 Sep 2026 03:40 PM IST
सार
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हिमालय की हिमनद झीलों पर मंडरा रहा खतरा अब सिर्फ बढ़ती गर्मी और ग्लेशियरों के पीछे हटने तक सीमित नहीं है। चट्टान या बर्फ गिरने से लेकर भारी बारिश और प्राकृतिक बांध के कटाव तक, कई कारण अचानक झील विस्फोट बाढ़ का खतरा बढ़ा सकते हैं।

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Himalayan Glacial Lakes Expanding Rapidly Landslides and Falling Rocks May Trigger GLOF Risk NIH Study Roorkee
हिमालय में बढ़ता तापमान - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

हिमालय में बढ़ता तापमान और ग्लेशियरों का पीछे हटना हिमनद झीलों के विस्तार की वजह तो बन ही रहा है लेकिन इन झीलों के लिए खतरा केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। पहाड़ों से बर्फ या चट्टान का झील में गिरना, भूस्खलन, अत्यधिक बारिश, पानी का अतिप्रवाह और प्राकृतिक बांध का कटाव भी झीलों को अचानक तोड़ सकता है।

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ऐसी स्थिति में झील का पानी मलबे के साथ तेजी से नीचे की घाटियों की ओर बढ़ सकता है और रास्ते में आने वाली बस्तियों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए खतरा पैदा कर सकता है। यह कहना है हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ (जीएलओएफ) पर अध्ययन कर रहे राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (एनआईएच), रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार लोहानी का।

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उनके अनुसार झीलों के आसपास होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी जरूरी है। हिमनद झीलें सामान्य तौर पर ग्लेशियर के पीछे हटने से बनने या फैलने लगती हैं लेकिन इनके अचानक टूटने की स्थिति अलग-अलग कारणों से पैदा हो सकती है।

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बाढ़ मॉडलिंग का इस्तेमाल
भूस्खलन की स्थिति में बड़ी मात्रा में मलबा झील में पहुंचने से पानी का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। जिससे झील टूट सकती है। ऐसे में केवल पानी ही नीचे नहीं आता, बल्कि मिट्टी, पत्थर और मलबा भी तेज गति से बहता है। यही वजह है कि जीएलओएफ का प्रभाव सामान्य बाढ़ से अलग हो सकता है। एनआईएच की ओर से सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, गढ़वाल हिमालय और भूटान के कुछ बेसिन में हिमनद झीलों का अध्ययन किया गया है।
 

वैज्ञानिकों के लिए यह पता लगाना महत्वपूर्ण है कि झील का आकार कितना बढ़ रहा है, उसमें कितना पानी जमा है। उसका प्राकृतिक बांध कितना मजबूत है और उसके टूटने पर पानी किस दिशा में कितनी गति से पहुंचेगा। इसके लिए सुदूर संवेदन, भौगोलिक सूचना तंत्र (जीआईएस) और बाढ़ मॉडलिंग का इस्तेमाल किया जाता है।

 

676 झीलों में हुआ विस्तार

डॉ. लोहानी के अनुसार इसरो के 1984 से 2023 तक के उपग्रह आंकड़ों में वर्ष 2016-17 में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2431 झीलों की पहचान की गई थी। इनमें से 676 हिमनद झीलों का 1984 के बाद विस्तार हुआ। इनमें 130 झीलें भारत में हैं। 65 झीलें सिंधु, सात गंगा और 58 ब्रह्मपुत्र नदी घाटी में स्थित हैं।

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जोखिम घटाने के लिए जरूरी कदम

झीलों के आकार, जलस्तर और प्राकृतिक बांध में बदलाव पर निगरानी, झील के आसपास भूस्खलन पर नजर, उपग्रह और जीआईएस तकनीक से पहचान करना, पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करना इत्यादि जरूरी है।


 

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