फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Udham Singh Nagar News ›   Beat diabetes with a new barley variety

खास खबर: जौ की नई किस्म से मधुमेह को मात...जीबी पंत विवि का बड़ा नवाचार, 12 राज्यों में मिली मंजूरी

Tue, 06 Oct 2026 12:01 PM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, ऊधम सिंह नगर
अमर उजाला नेटवर्क, ऊधम सिंह नगर Published by: Heera Updated Tue, 06 Oct 2026 12:01 PM IST
सार
Register For Event

पंत विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड की पहली छिलका रहित जौ की पंत जौ-11211 प्रजाति विकसित की है। बीते अगस्त में केंद्र सरकार की सेंटर वैरायटी रिलीज कमेटी ने इसे उत्तर पूर्वी जोन के 12 राज्यों में उगाने के लिए जारी किया है।

विज्ञापन
Beat diabetes with a new barley variety
छिलका रहित जौ की पंत जौ-1121 प्रजाति। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मधुमेह रोगियों के लिए जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने नवाचार किया है। यहां के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड की पहली छिलका रहित जौ की पंत जौ-11211 प्रजाति विकसित की है। इसे बीते अगस्त में भारत सरकार के सेंटर वैरायटी रिलीज कमेटी ने देश में उत्तर पूर्वी जोन के 12 राज्यों में उगाने के लिए जारी किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार छिलका रहित जौ की रोटी मधुमेह रोगियों के लिए काफी फायदेमंद मानी जाती है।

विज्ञापन

किसान मेले में नवाचार स्टाॅल पर उपलब्ध छिलका रहित जौ देखने के लिए किसानों की भीड़ उमड़ रही है। छिलका रहित जौ के प्रजनक और कृषि महाविद्यालय के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन के विभाग प्रमुख डाॅ. जेपी जायसवाल और डाॅ. स्वाति ने बताया कि सामान्य जौ में छिलका होने की वजह से उसे प्रोसेसिंग के बाद ही उपयोग किया जा सकता है। वहीं, उनकी ओर से विकसित जौ की छिलका रहित प्रजाति को सीधे उपयोग में लाया जा सकता है।

विज्ञापन

उन्होंने बताया कि इसकी प्रमुख विशेषता है कि इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स (20-28 जीआई), गेहूं की तुलना (60-70 जीआई) में सिर्फ एक तिहाई है। वहीं बीटा ग्लूकन अधिकतम 5-10 ग्राम प्रति सौ ग्राम में पाया जाता है। इसलिए यह मधुमेह के मरीजों के लिए रामबाण है। मेले में किसानों को इसके कुछ बीज उपलब्ध कराए गए हैं। अब किसानों में इसके बीज की भारी मांग है। इसलिए विवि में इसका वृहद स्तर पर बीजोत्पादन किया जाएगा ताकि आने वाले किसान मेलों में किसानों की मांग के अनुरूप इसका बीज उपलब्ध कराया जा सके। 

विज्ञापन
विज्ञापन

पंत जौ-1121 के वानस्पतिक गुण
डाॅ. जायसवाल ने बताया कि इसकी फसल अवधि 125-135 दिन है। पौधे की प्रकृति सुदृढ़ और गिरने के प्रति काफी सहनशील है। यह पीला रतुआ और झुलसा रोग जैसी बीमारियों के प्रति रोधी है। यह विभिन्न प्रकार के पोषक तत्वों (एफई, सीए, जेडएन, एमएन, एमजी, सीयू, एसई व के) से भरपूर है। इसमें बीटा ग्लूकन की प्रचुरता और इससे शत-प्रतिशत पोषक तत्वों का संरक्षण होता है।

 

अब पीजिए मोरिंगा-तुलसी से बना हर्बल कोम्बुचा
जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय स्थित प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के पोस्ट हार्वेस्ट प्रोसेसिंग एंड फूड इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष डाॅ. पीके ओमरे और डाॅ. सचिन कुमार के मार्गदर्शन में एमटेक के छात्र शिवांक भारद्वाज ने मोरिंगा-तुलसी कोम्बुचा नाम से एक अभिनव फर्मेंटेड हर्बल पेय तैयार किया है। यह उत्पाद पारंपरिक भारतीय वनस्पतियों और आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण तकनीक का अभिनव संगम है।

किसान मेले में लगे स्टॉल पर शिवांक ने बताया कि यह पेय मोरिंगा (सहजन) की पत्तियों, तुलसी, चाय, चीनी और स्कोबी (बैक्टीरिया और यीस्ट की सहजीवी संस्कृति) की सहायता से किण्वन प्रक्रिया से तैयार किया जाता है। उन्होंने बताया कि मोरिंगा और तुलसी में प्राकृतिक रूप से विभिन्न पौध-आधारित जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। इन पारंपरिक वनस्पतियों को फर्मेंटेशन तकनीक के साथ जोड़कर एक नया पेय विकल्प विकसित करने का प्रयास किया गया है।

उन्होंने बताया कि यह उत्पाद सामान्य मीठे पेय और कार्बोनेटेड शीतल पेय के मुकाबले एक हर्बल, फर्मेंटेड विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके पोषण, गुणवत्ता और उपभोक्ता स्वीकार्यता का मूल्यांकन आगे के परीक्षणों से किया जा सकता है। यह पहल फर्मेंटेशन टेक्नोलॉजी, हर्बल पेय विकास और कृषि आधारित सामग्री के मूल्य संवर्धन की संभावनाओं को दर्शाती है। इसका उद्देश्य पारंपरिक सामग्री को आधुनिक खाद्य उत्पाद के रूप में विकसित करना और उपभोक्ताओं को एक नए स्वाद का अनुभव देना है।

पशु प्रबंधन के आधुनिक तरीके बताएगा पीएलएफ
बदलते दौर में वैज्ञानिक तौर-तरीकों से पशुपालन करना समय की मांग बन गया है। इसको ध्यान में रखते हुए जीबी पंत कृषि विवि में प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के कंप्यूटर इंजीनियरिंग के शोधार्थियों ने विभागाध्यक्ष डाॅ. एसडी सामंतरे के मार्गदर्शन में प्रिसीजन लाइवस्टाॅक फार्मिंग (पीएलएफ) एप विकसित किया है। यह ऐसी तकनीक है जिसमें सटीक डाटा, सेंसर और डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल कर पशुओं की सेहत, उनके भोजन और व्यवहार का ध्यान रखा जाता है।

किसान मेले में महाविद्यालय के स्टाॅल पर प्रदर्शित एप और उसके बारे में जानकारी देते हुए एमसीए छात्रा सुप्रिया पाठक व अन्य शोधार्थियों ने बताया कि पीएलएफ पशु प्रबंधन का एक तरीका है। इस एप में कई तकनीक और उपकरणों का इस्तेमाल किया गया है जैसे जीपीएस ट्रेकर्स और सेंसर से मवेशियों की लोकेशन, मूवमेंट और सेहत पर नजर रखी जाती है। एआई और एनालिटिक्स से यह समझा जाता है कि किस जानवर को क्या जरूरत है। सेंसर अलग-अलग प्रकार के होते हैं जैसे तापमान सेंसर, हार्ट सेंसर, मूवमेंट सेंसर आदि। इस सेंसरों से मिलने वाले डाटा के आधार पर मवेशियों की सेहत और व्यवहार पर लगातार नजर रखी जा सकती है और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सकती है।

पीएलएफ की यह हैं विशेषताएं
डाॅ. सामंतरे ने बताया कि पीएलएफ में सटीक डेटा पर आधारित प्रबंधन, सेंसर आधारित निरंतर निगरानी, एआई और एनालिटिक्स से विश्लेषण, बीमारियों की शीघ्र पहचान, बेहतर प्रबंधन और समय पर निर्णय, उत्पादन में वृद्धि और लागत में कमी आदि विशेषताएं हैं।

भविष्य की संभावनाएं
डाॅ. सामंतरे ने बताया कि भविष्य में इस प्रणाली को आईओटी सेंसर और पीएलएफ तकनीकों से जोड़ जा सकता है। इस एप को इस तरह डिजाइन किया गया है कि भविष्य में इसे भारत सरकार के नेशनल डिजिटल लाइवस्टाॅक मिशन से जोड़ा जा सके। इससे राष्ट्र डिजिटल पशुपालन पहलों के साथ तालमेल बिठाने में पीएलएफ को लागू करने व आगे बढ़ाने के लिए व्यावहारिक आधार मिल सकेगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed