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खास खबर: जंगल के शिकारी ने पिंजरा सूंघकर समझ ली इंसानी चाल, शिकार छोड़ लौटे; 38 में सिर्फ 9 पकड़े गए

Wed, 26 Aug 2026 11:48 AM IST
Heera जीवन कुमार
जीवन कुमार Published by: Heera Updated Wed, 26 Aug 2026 11:48 AM IST
सार
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तराई पश्चिमी वन प्रभाग में पिछले दो वर्षों में 38 पिंजरे लगाए गए, लेकिन सिर्फ 9 तेंदुए ही पकड़े जा सके। तेंदुए अब पिंजरों से सतर्क हो गए हैं और शिकार को छुए बिना वापस लौट जाते हैं। 

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Leopards became cautious from the cage in kashipur
बाघ - फोटो : amar ujala

विस्तार

 

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जंगल से आबादी की ओर आ रहे बाघ-तेंदुए अब वन विभाग के पिंजरों से भी सतर्क रहने लगे हैं। पिंजरे में रखे शिकार तक पहुंचने के बाद वे हमला किए बिना लौट जा रहे हैं। इसका असर तेंदुओं को पकड़ने के अभियान पर भी दिख रहा है। तराई पश्चिमी वन प्रभाग में पिछले दो वर्षों में 38 पिंजरे लगाए गए, लेकिन सिर्फ नौ तेंदुए ही पकड़े जा सके।

काशीपुर रेंज के गोविषाण टीले के आसपास कई महीनों से दो तेंदुओं की चहलकदमी बनी हुई है। नौ अगस्त को यहां लगाए गए पिंजरे के पास उसी रात कैमरा ट्रैप में दोनों तेंदुए पहुंचे। वे करीब 10 मीटर तक आए, लेकिन पिंजरे में रखे शिकार को नुकसान पहुंचाए बिना लौट गए। गोविषाण, ढकिया, गढ़ीनेगी और प्रतापपुर समेत आसपास के गांवों में पिछले तीन महीनों में तेंदुए 12 मवेशियों का शिकार कर चुके हैं। ग्रामीणों ने पिंजरा पद्धति बदलने और ट्रैंकुलाइज टीम तैनात करने की मांग की है।

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47 हमले, एक भी तेंदुआ नहीं फंसा
काशीपुर, बाजपुर और जसपुर रेंज में पिछले तीन महीनों में मवेशियों पर हमले की 47 घटनाएं दर्ज हुई हैं, लेकिन इस दौरान एक भी तेंदुआ पिंजरे में नहीं आया। वर्ष 2025 में 21 पिंजरे लगाए गए थे, जिनमें पांच तेंदुए पकड़े गए। वर्ष 2026 में अब तक 17 पिंजरे लगाए गए और चार तेंदुए पकड़े गए।

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जंगल से 200-300 मीटर दूर तक पहुंची मूवमेंट
विभागीय रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में तेंदुओं की औसत मूवमेंट जंगल से करीब 1.5 किलोमीटर बाहर तक थी। अब यह घटकर 200 से 300 मीटर रह गई है। यानी तेंदुओं की गतिविधियां आबादी के बेहद करीब पहुंच गई हैं।

पिंजरों की गंध तेंदुए और बाघ पहचान जाते हैं। तराई क्षेत्र में तेंदुओं को पकड़ने के लिए कैमरा ट्रैप और ड्रोन से निगरानी बढ़ाई गई है। लोगों से अपील है कि रात में अकेले न निकलें और मवेशियों को आबादी से दूर न बांधें। - पुनीत तोमर, डीएफओ, तराई पश्चिमी वन प्रभाग

बाघ और तेंदुए अपनी बुद्धिमत्ता, शिकार की शैली और अनुकूलन क्षमता के कारण कुशल शिकारी हैं। पिंजरे के आसपास इंसानों की मौजूदगी और एक ही तरह के शिकार को वे पहचान सकते हैं। यदि किसी तेंदुए ने अपने साथी को पिंजरे में फंसते देख लिया हो तो वह दोबारा उस क्षेत्र में पिंजरे के पास आने से बचता है। - डॉ. साकेत बडोला, निदेशक, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व

 

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