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एक्सप्लेनर: 22,000 करोड़ का मामला 6.5 करोड़ में निपटा, सुभाष चंद्रा मामले में कैसे चली देनदारी पर कैंची?
Sat, 29 Aug 2026 09:57 AM IST
Devesh Tripathi
बोनस डेस्क, नई दिल्ली
बोनस डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 29 Aug 2026 09:57 AM IST
नुकसान सहने का उदाहरण हाल में बैंक ऑफ बड़ौदा मामले में भी देखने को मिला था। यूएई के चर्चित एनएमसी हेल्थकेबर घोटाले में 4 अरब डॉलर का कर्ज छुपाने के आरोप लगे थे। आइए जानते हैं कि कॉरपोरेट विवादों को बट्टे खाते में डालने पर क्यों उठ रहे हैं सवाल? आखिर एचडीएफसी बैंक क्यों कर रहा है विरोध?
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सुभाष चंद्रा मामाला
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/PTI
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विस्तार
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की दिल्ली बेंच द्वारा एस्सेल समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा के पर्सनल इनसॉल्वेंसी मामले में दिए गए ताजा आदेश ने भारतीय बैंकिंग और कॉरपोरेट जगत के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इसके बाद देश की नियामकीय प्रक्रियाओं को लेकर नई बहस छिड़ गई है। क्या भारत में नुकसान सहकर ऐसे मामले दबाने की परंपरा बनती जा रही है?
कॉरपोरेट देनदारियों और भारी नुकसान पर समझौते का यह कोई पहला मामला नहीं है। भारतीय बैंकिंग तंत्र में विवादों और चूक को भारी रकम चुकाकर निपटाने की एक लंबी परिपाटी रही हैं।
पूरा मामला कैसे शुरू हुआ?
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने सुभाष चंद्रा के खिलाफ कर्जदाताओं के 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के इनसॉल्वेंसी दावे को मात्र 6.5 करोड़ रुपये में सेंटल करने का आदेश दिया। यह इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के इतिहास का सबसे बड़ा हेयरकट (करीब 99.97%) है। रीपेमेंट प्लान के पक्ष में 80 फीसदी से अधिक कर्जदाताओं ने बोट देकर इसे स्वीकार किया।
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6.5 करोड़ रुपये का टोकन क्यों?
दिवालिया कानून के तहत पर्सनल गारंटी को कॉरपोरेट डिफॉल्ट से अलग रखकर डील करने का प्रावधान है। सुभाष चंद्रा ने इस कानूनी व्यवस्था का लाभ उठाया। अपनी व्यक्तिगत संपत्ति से मात्र 6.5 करोड़ रुपये का टोकन भुगतान देकर वे हजारों करोड़ की पर्सनल गारंटी की देनदारी से कानूनी तौर पर बरी हो गए।
नुकसान किसका हुआ?
डूबी हुई रकम आम जनता और जमाकर्ताओं की बचत थी, जो बैंकों के जरिये कर्ज के रूप में दी गई थी। बैंकों को इस भारी नुकसान की भरपाई अपनी पूंजी से प्रोविजनिंग के माध्यम से करनी पड़ेगी।
बैंकिंग और दिवालिया कानून के लिए क्या खतरे?
यह फैसला अन्य बड़े डिफॉल्टर प्रमोटरों के लिए एक रास्ता खोलता है, जहां कंपनी का प्रमोटर या सीईओ भारी कर्ज के बदले पर्सनल गारंटी देकर बाद में नाममात्र की रकम चुकाकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है। यह फैसला दिखाता है कि जिस पर्सनल गारंटी को बैंक सबसे बड़ा सुरक्षा कवच मानते थे, वह व्यावहारिक रूप से बेअसर साबित हो रही है। यदि सरकार कानून में संशोधन नहीं करती या उच्च अदालतें इस पर दखल नहीं देती हैं, तो यह क्रेडिट अनुशासन और बैंकिंग व्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगा।
एचडीएफसी और एलआईसी क्यों कर रहे विरोध?
एचडीएफसी बैंक, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, केनरा बैंक, एक्सिस बैंक, यूनियन बैंक और आरबीएल बैंक इसके विरोध में हैं। तर्क है कि अगर हजारों करोड़ के बकाये पर पर्सनल गारंटर से महज चंद करोड़ ही वसूले जाएंगे, तो भविष्य में पर्सनल गारंटी लेने का कोई व्यावहारिक या कानूनी मतलब नहीं रह जाएगा।
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कॉरपोरेट देनदारियों और भारी नुकसान पर समझौते का यह कोई पहला मामला नहीं है। भारतीय बैंकिंग तंत्र में विवादों और चूक को भारी रकम चुकाकर निपटाने की एक लंबी परिपाटी रही हैं।
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पूरा मामला कैसे शुरू हुआ?
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने सुभाष चंद्रा के खिलाफ कर्जदाताओं के 22,000 करोड़ रुपये से अधिक के इनसॉल्वेंसी दावे को मात्र 6.5 करोड़ रुपये में सेंटल करने का आदेश दिया। यह इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के इतिहास का सबसे बड़ा हेयरकट (करीब 99.97%) है। रीपेमेंट प्लान के पक्ष में 80 फीसदी से अधिक कर्जदाताओं ने बोट देकर इसे स्वीकार किया।
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6.5 करोड़ रुपये का टोकन क्यों?
दिवालिया कानून के तहत पर्सनल गारंटी को कॉरपोरेट डिफॉल्ट से अलग रखकर डील करने का प्रावधान है। सुभाष चंद्रा ने इस कानूनी व्यवस्था का लाभ उठाया। अपनी व्यक्तिगत संपत्ति से मात्र 6.5 करोड़ रुपये का टोकन भुगतान देकर वे हजारों करोड़ की पर्सनल गारंटी की देनदारी से कानूनी तौर पर बरी हो गए।
नुकसान किसका हुआ?
डूबी हुई रकम आम जनता और जमाकर्ताओं की बचत थी, जो बैंकों के जरिये कर्ज के रूप में दी गई थी। बैंकों को इस भारी नुकसान की भरपाई अपनी पूंजी से प्रोविजनिंग के माध्यम से करनी पड़ेगी।
बैंकिंग और दिवालिया कानून के लिए क्या खतरे?
यह फैसला अन्य बड़े डिफॉल्टर प्रमोटरों के लिए एक रास्ता खोलता है, जहां कंपनी का प्रमोटर या सीईओ भारी कर्ज के बदले पर्सनल गारंटी देकर बाद में नाममात्र की रकम चुकाकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है। यह फैसला दिखाता है कि जिस पर्सनल गारंटी को बैंक सबसे बड़ा सुरक्षा कवच मानते थे, वह व्यावहारिक रूप से बेअसर साबित हो रही है। यदि सरकार कानून में संशोधन नहीं करती या उच्च अदालतें इस पर दखल नहीं देती हैं, तो यह क्रेडिट अनुशासन और बैंकिंग व्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगा।
एचडीएफसी और एलआईसी क्यों कर रहे विरोध?
एचडीएफसी बैंक, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, केनरा बैंक, एक्सिस बैंक, यूनियन बैंक और आरबीएल बैंक इसके विरोध में हैं। तर्क है कि अगर हजारों करोड़ के बकाये पर पर्सनल गारंटर से महज चंद करोड़ ही वसूले जाएंगे, तो भविष्य में पर्सनल गारंटी लेने का कोई व्यावहारिक या कानूनी मतलब नहीं रह जाएगा।