गणेश उत्सव: घर की रसोई से एप तक पहुंचा मोदक, बदल गया स्वाद और बाजार
भारत का पैकेज्ड मिठाई बाजार भी इसी परिवर्तन की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करता है। 2025 में इस बाजार का आकार लगभग ₹8,431 करोड़ रुपये आंका गया था और आने वाले वर्षों में इसके तीव्र गति से बढ़ने का अनुमान है। ऑनलाइन बिक्री, आधुनिक खुदरा व्यवस्था और त्वरित वितरण सेवाओं ने इस बदलाव को और गति दी है।
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गणेश चतुर्थी के दिनों में इस बार कितने मोदक बनेंगे, बनेंगे नहीं, मंगवाएंगे। समय ही कहां है घर पर बनाने का? ऐसी बातचीत शायद अब असामान्य नहीं रही। जिस मिठाई को कभी घर की रसोई में परिवार के लोग मिलकर बनाते थे, जिसके लिए चावल का आटा गूंथा जाता था, गुड़ और नारियल की भरावन तैयार होती थी और भाप में पकते मोदक के साथ पूरा घर उत्सव की गंध से भर जाता था, वही मोदक आज मिठाई की दुकानों, आधुनिक भोजनालयों, बड़े खुदरा प्रतिष्ठानों और ऑनलाइन ऐप्स पर उपलब्ध एक ऐसा उत्पाद बन चुका है, जिसकी अपनी कीमत, पैकेजिंग, ब्रांड पहचान और बाजार है।
मोदक एक साथ स्मृति, स्वाद, उत्सव, उपहार और व्यापार का हिस्सा
मोदक का बदलता रूप दरअसल यह बता रहा है कि भारत में परंपरा और बाजार का रिश्ता किस तरह नया आकार ले रहा है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर आज मोदक एक साथ स्मृति, स्वाद, उत्सव, उपहार और व्यापार का हिस्सा बन चुका है।
मुंबई में इस वर्ष गणेशोत्सव के दौरान कुछ प्रमुख विक्रेताओं ने हजारों किलोग्राम मोदक तैयार करने की योजना बनाई है, जबकि पुणे जैसे शहरों में एक ही विक्रेता द्वारा लाखों मोदक तैयार किए जाने की खबरें सामने आई हैं। यह मांग उस बड़े परिवर्तन की ओर संकेत करती है, जिसमें भारतीय त्योहारों से जुड़े पारंपरिक व्यंजन अब घरेलू उपभोग से आगे बढ़कर संगठित खाद्य बाजार का हिस्सा बन रहे हैं।
पैकड मिठाई बाजार तेजी से बढ़ रहा
भारत का पैकेज्ड मिठाई बाजार भी इसी परिवर्तन की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करता है। 2025 में इस बाजार का आकार लगभग ₹8,431 करोड़ आंका गया था और आने वाले वर्षों में इसके तीव्र गति से बढ़ने का अनुमान है। ऑनलाइन बिक्री, आधुनिक खुदरा व्यवस्था और त्वरित वितरण सेवाओं ने इस बदलाव को और गति दी है, क्योंकि अब किसी शहर की पारंपरिक मिठाई उसी शहर की भौगोलिक सीमा में बंद नहीं रहती। एक समय जिस मोदक का स्वाद परिवार और मोहल्ले की स्मृति से जुड़ा था, वह अब देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच सकता है। और शायद यही कारण है कि मोदक भी बदल रहा है।
उकड़ीचे मोदक के साथ अब चॉकलेट, सूखे मेवे, केसर, मावा और अनेक नए स्वादों वाले मोदक दिखाई देते हैं। यह बाजार की उस समझ को दर्शाता है, जिसमें उपभोक्ता परंपरा को छोड़ना नहीं चाहता, लेकिन उसे अपने वर्तमान जीवन और पसंद के अनुरूप देखना चाहता है। त्योहार वही है, गणपति जी वही हैं, लेकिन थाली में रखा मोदक बदल रहा है।
किन्तु जब परंपरा बाजार में प्रवेश करती है, तो क्या वह कमजोर होती है या और अधिक लोगों तक पहुंचने की शक्ति प्राप्त करती है? बाजार किसी परंपरा को जीवित रखने के लिए उसे नया जीवन दे सकता है, लेकिन वही बाजार उसे केवल आकर्षक पैकेजिंग और ऊंची कीमत वाले उत्पाद में भी बदल सकता है। मोदक की कहानी इसी दोराहे पर खड़ी है, जहां एक ओर घर की रसोई की स्मृति है और दूसरी ओर आधुनिक भारत का तेजी से विस्तार करता खाद्य बाजार।
यह बदलाव भारत के व्यापक मिठाई बाजार की दिशा से भी मेल खाता है। जनवरी 2026 के बाजार आकलन के अनुसार, देश में सुपरमार्केट और बड़े खुदरा प्रतिष्ठान मिठाइयों की बिक्री का महत्वपूर्ण हिस्सा संभाल रहे हैं, जबकि ऑनलाइन खुदरा बिक्री इस क्षेत्र में सबसे तेज गति से बढ़ने वाले वितरण माध्यमों में शामिल है। इसका अर्थ केवल इतना नहीं है कि अब मिठाई मोबाइल पर मंगाई जा सकती है; इसका अर्थ यह है कि भारतीय त्योहारों का भोजन पहली बार बड़े पैमाने पर भौगोलिक सीमाओं से मुक्त हो रहा है।
परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब वे समय के साथ संवाद करती हैं
किसी परंपरा का जीवित रहना इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह बिल्कुल उसी रूप में बनी रहे, जिस रूप में वह सौ वर्ष पहले थी; परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब वे समय के साथ संवाद करती हैं। मोदक की यात्रा भी इसी संवाद की कहानी है, जहां मिट्टी के चूल्हे से लेकर आधुनिक रसोई, स्थानीय हलवाई से लेकर बड़े खाद्य प्रतिष्ठान और घर की थाली से लेकर मोबाइल पर दिए गए आदेश तक, एक ही मिठाई ने भारतीय जीवन के बदलते रूपों को अपने भीतर समेट लिया है। इसलिए इस गणेश चतुर्थी पर मोदक खाते हुए शायद एक क्षण के लिए यह सोचना भी उचित होगा कि हम केवल एक मिठाई नहीं खा रहे, बल्कि उस भारत का स्वाद ले रहे हैं, जो अपनी जड़ों को बचाए रखते हुए लगातार नया आकार ले रहा है।
और शायद यही मोदक की सबसे बड़ी मिठास है। उसका असली स्वाद न तो केवल गुड़ और नारियल में है, न चॉकलेट और सूखे मेवों में, बल्कि उस निरंतरता में है, जिसमें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कोई परंपरा अपना रूप बदलती है, लेकिन अपना अर्थ नहीं खोती। बाजार उसे नया आकार दे सकता है, तकनीक उसे दूर-दूर तक पहुंचा सकती है और आधुनिक जीवन उसकी तैयारी का तरीका बदल सकता है, लेकिन जब तक गणेश चतुर्थी के दिन किसी घर में मोदक बनाते या मंगाते हुए कोई व्यक्ति यह कहता रहेगा कि “पहले गणपति को भोग लगेगा”, तब तक यह मिठाई केवल बाजार का उत्पाद नहीं होगी। वह भारतीय उत्सव की जीवित स्मृति बनी रहेगी।
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