जीवन धारा: जिसे हम जानते नहीं उससे भय कैसा? डर का सामना करने का सूत्र अपनाना कारगर विकल्प
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हम अक्सर कहते हैं कि हमें अज्ञात से डर लगता है, भविष्य अनिश्चित है, मृत्यु रहस्यमय है, इसलिए हम डरते हैं। लेकिन, क्या यह वास्तव में सच है? यदि आप बहुत ध्यान से अपने मन को देखें, बिना किसी निष्कर्ष और किसी सिद्धांत के, तो पाएंगे कि आपका भय अज्ञात से नहीं है। अज्ञात तो अज्ञात है। उसके बारे में तो आपको कुछ पता ही नहीं है। और, जिसे आप नहीं जानते, तो फिर उससे भय कैसे हो सकता है? भय तो हमेशा किसी ज्ञात स्थिति या वस्तु से जुड़ा होता है, जैसे-किसी स्मृति से या किसी अनुभव से। जब आप कहते हैं कि आपको मृत्यु से भय है, तो क्या वास्तव में आपको मृत्यु से भय होता है? आप मृत्यु को जानते तक नहीं। आपने उसे कभी अनुभव नहीं किया।
आप जिस चीज से डरते हैं, वह है, उन सब चीजों को खो देना, जिन्हें आप जानते हैं-अपना परिवार, नाम, उपलब्धियां व स्मृतियां। यानी, भय मृत्यु का नहीं, ज्ञात के समाप्त हो जाने का है। मन का स्वभाव है, ज्ञात से चिपके रहना। आप एक दुखद रिश्ते में भी वर्षों तक रह सकते हैं, क्योंकि वह परिचित है। यही मनोवैज्ञानिक बंधन है। मन कहता है-मैं जानता हूं कि मैं कौन हूं। लेकिन, क्या आप जानते हैं? आपका ‘मैं’ क्या है? क्या वह स्मृतियों का संग्रह नहीं है। आपका नाम, आपकी सफलताएं और असफलताएं, अनुभव-इन सबका संचय ही आपका ‘मैं’ है। फिर स्वाभाविक रूप से आप इस ‘मैं’ से चिपक जाते हैं। कोई आपकी छवि को नुकसान पहुंचाता है, तो आपको चोट पहुंचती है।
ऐसे में, आप घबरा जाते हैं, क्योंकि ज्ञात, यानी ‘मैं’ हिलने लगता है। जहां सुरक्षा की खोज सत्य की खोज पर हावी हो जाती है, वहीं से भय शुरू हो जाता है। आप नदी में खड़े होकर चाहते हैं कि जल बहना बंद कर दे। पर, नदी का स्वभाव बहना है। इसी तरह जीवन का स्वभाव भी परिवर्तन है। और, मन का स्वभाव पकड़ कर रखना। इन दोनों के बीच संघर्ष ही भय है। क्या आप भय की पूरी संरचना को देख सकते हैं? क्या आप देख सकते हैं कि भय तब उत्पन्न होता है, जब विचार भविष्य में प्रक्षेपित होता है? विचार कहता है कि यदि यह खो गया, तो क्या होगा? यानी भय और विचार गहरे जुड़े हुए हैं। विचार अतीत से आता है। वह स्मृति है, और वही स्मृति भविष्य की कल्पना करती है।
इस प्रकार भय समय की उपज है, मनोवैज्ञानिक समय की। अब बात आती है कि क्या मन बिना कोई निष्कर्ष निकाले भय को देख सकता है? यदि आप ऐसा कर सकें, तो कुछ असाधारण होता है। आप पाते हैं कि देखने वाला और भय अलग-अलग नहीं हैं। जब यह विभाजन समाप्त हो जाता है, तब संघर्ष समाप्त हो जाता है। और, जहां संघर्ष समाप्त होता है, वहां ऊर्जा मुक्त हो जाती है। उस ऊर्जा में एक नई बुद्धिमत्ता जन्म लेती है। तब मन ज्ञात से चिपका नहीं रहता। वह हर क्षण नया होने के लिए तैयार रहता है। उसी दिन भय की जड़ हिलने लगती है। तब पहली बार मन वास्तव में स्वतंत्र होता है, क्योंकि वह अब ज्ञात की जेल में नहीं रह रहा होता।
सूत्र: डर का सामना करें
भय अज्ञात से नहीं, बल्कि ज्ञात को खोने की चिंता से जन्म लेता है। हम स्मृतियों, रिश्तों, पहचान और उपलब्धियों को पकड़कर सुरक्षा खोजते हैं, जबकि जीवन निरंतर परिवर्तन है। जब हम बिना निष्कर्ष निकाले अपने भय को देखते हैं, तो विचार और भय का संबंध समझ में आता है। संघर्ष समाप्त होते ही भीतर की ऊर्जा मुक्त होती है।