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मौलिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के आलोक में प्रदर्शनकारियों के अधिकार और पुलिस की कार्रवाई!

Mon, 12 Oct 2026 07:32 PM IST
राहुल कुमार रजनीश कपूर
रजनीश कपूर Published by: राहुल कुमार Updated Mon, 12 Oct 2026 07:32 PM IST
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Protesters’ Rights and Police Action: Balancing Fundamental Rights and Public Order
सीजेपी के प्रदर्शन(फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

हाल के दिनों में दिल्ली में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ या युवा-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर पुलिस की कार्रवाई और नागरिकों के विरोध के अधिकार के बीच संतुलन को सवालों के घेरे में ला दिया है। ये प्रदर्शन मुख्य रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) के खिलाफ थे, जिसके तहत मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए जाने का आरोप लगाया गया। अक्टूबर 2026 में जंतर-मंतर पर प्रस्तावित रैली से पहले दिल्ली को लगभग ‘किले’ में बदल दिया गया, मेट्रो स्टेशन बंद किए गए, ट्रेनें रद्द हुईं और हजारों लोगों को रोका या हिरासत में लिया गया। आंदोलन के नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को मुंबई से दिल्ली पहुंची एयर इंडिया की उड़ान के लैंड होने के बाद विमान में ही हिरासत में ले लिया गया। 

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यह घटना न केवल विरोध के अधिकार की चर्चा को नया आयाम देती है, बल्कि विमान के अंदर पुलिस प्रवेश के प्रोटोकॉल पर भी सवाल उठाती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक तथा बिना हथियारों के सभा करने का मौलिक अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में (जैसे रामलीला मैदान मामले) यह स्पष्ट किया है कि राज्य को शांतिपूर्ण सभा को केवल सहन नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे सुविधा भी देनी चाहिए। हालांकि, ये अधिकार असीमित नहीं हैं। अनुच्छेद 19(3) सार्वजनिक व्यवस्था, संप्रभुता और अखंडता के हित में उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है। प्रदर्शन के लिए आमतौर पर स्थानीय नियमों के अनुसार अनुमति आवश्यक होती है और जंतर-मंतर जैसे स्थानों को निर्दिष्ट किया जाता है।
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छोटे मामलों में 24 घंटे में रिहाई जरूरी
पुलिस की शक्तियां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता से आती हैं, जो पुराने दंड प्रक्रिया संहिता की जगह आई है। धारा 163 (पुरानी धारा 144 जैसी) के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका पर लिखित आदेश जारी कर सभाओं पर प्रतिबंध लगा सकता है। यह निवारक उपाय है। धारा 148 अवैध सभा या सार्वजनिक शांति भंग करने वाली पांच या अधिक लोगों की सभा को तितर-बितर करने का अधिकार देती है। धारा 170 के तहत यदि पुलिस को संज्ञेय अपराध करने की योजना का पता हो और उसे अन्यथा रोका न जा सके, तो बिना वारंट गिरफ्तारी संभव है। धारा 172 उन लोगों को हिरासत में लेने या हटाने की अनुमति देती है जो वैध निर्देशों की अवहेलना करें। इन मामलों में व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना या छोटे मामलों में 24 घंटे के भीतर रिहा करना आवश्यक है।
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हिरासत औपचारिक गिरफ्तारी नहीं
यहां ‘हिरासत’ और ‘गिरफ्तारी’ में अंतर महत्वपूर्ण है। हिरासत अक्सर निवारक होती है। जैसे- लोगों को रैली तक पहुंचने से रोकना, अस्थायी रूप से रोकना या बसों में डालना। यह औपचारिक गिरफ्तारी नहीं मानी जाती, इसलिए अनुच्छेद 22 के पूर्ण संरक्षण तुरंत लागू नहीं होते। औपचारिक गिरफ्तारी में व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताने, वकील से परामर्श करने और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का अधिकार होता है। दिल्ली की हालिया घटनाओं में हजारों लोगों की हिरासत को पुलिस ने अनुमति न मिलने और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने से जोड़ा, जबकि आलोचकों ने इसे असंतुलित और दमनकारी बताया। जुलाई 2026 के पिछले CJP-नेतृत्व वाले प्रदर्शनों में अम्नेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने पुलिस द्वारा पेलेट गन, आंसू गैस और अन्य बल प्रयोग के आरोप लगाए थे, जिसकी जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पैनल गठित किया।

वहीं, विमान से हिरासत का मामला और भी जटिल है। मुंबई से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की उड़ान लैंड होने के बाद उसे रिमोट बे पर पार्क किया गया, जहां CISF और दिल्ली पुलिस पहले से मौजूद थीं। विशेष पास के साथ पुलिसकर्मी विमान में चढ़े और सीजेपी के नेताओं को उनकी सीटों से ही हिरासत में ले लिया। उल्लेखनीय है कि एयरक्राफ्ट (सिक्योरिटी) रूल्स, 2023 के नियम 22 के अनुसार एयरोड्रोम में प्रवेश केवल अधिकृत व्यक्तियों (वैध यात्री, प्रवेश परमिट या BCAS/केंद्र सरकार की लिखित अनुमति) को ही है। दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को विशेष पास दिए गए। नियम 36 विमान तक पहुंच का नियंत्रण एयरलाइन ऑपरेटर पर डालता है। नियमों में लैंडिंग के बाद पार्क किए गए विमान में पुलिस के प्रवेश की स्पष्ट प्रक्रिया नहीं है। 

पायलट की अधिकार सीमा क्या है? 
पूर्व पुलिस और CISF अधिकारियों के अनुसार, पुलिस एयरलाइन और पायलट-इन-कमांड के साथ समन्वय के बाद ही प्रवेश कर सकती है। ऐसे में एयरलाइन कैप्टन को सूचित करती है और कैप्टन दरवाजा खोलकर अनुमति देता है। विमान को ‘इन फ्लाइट’ तब तक माना जाता है जब तक दरवाजे बंद रहते हैं। दरवाजे खुलने के बाद पायलट की अंतिम अधिकारिता समाप्त हो जाती है और भगोड़े अपराधियों जैसे गंभीर मामलों में सुरक्षा एजेंसियां प्रवेश कर सकती हैं। स्थानीय पुलिस की भूमिका एविएशन अपराधों में सीमित है। एयरक्राफ्ट एक्ट के तहत ऐसी शिकायत अधिकृत अधिकारियों से की जा सकती है। लेकिन सामान्य कानून-व्यवस्था या निवारक कार्रवाई के लिए समन्वय के साथ प्रवेश संभव है।

बड़ा सवाल
यह घटना दिखाती है कि तकनीकी रूप से समन्वय और विशेष पास के साथ प्रवेश संभव था, लेकिन ‘विमान के अंदर ही’ हिरासत को कई लोगों ने अत्यधिक और प्रतीकात्मक रूप से दमनकारी माना। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि वे बाहर उतरने के बाद भी हिरासत में लिए जा सकते थे। पुलिस की ओर से यह कहा गया कि यह गिरफ्तारी नहीं, बल्कि निवारक हिरासत थी और इन नेताओं को धरने की अनुमति अस्वीकृत होने की जानकारी भी दी गई थी। लेकिन गौरतलब है कि क्या ये नेता एयरपोर्ट जैसे सुरक्षित स्थान से भाग सकते थे? 

कुल मिलाकर देखा जाए तो, संविधान विरोध के अधिकार को मान्यता तो देता है, लेकिन उसे सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन रखता है। पुलिस को निवारक शक्तियां दी गई हैं, परंतु इनका प्रयोग आनुपातिक, गैर-मनमाना और न्यायिक समीक्षा के योग्य होना चाहिए। बड़े पैमाने पर हिरासत, विमान तक पहुंच और पूर्व अनुमति अस्वीकार जैसी कार्रवाइयां तब उचित मानी जाती हैं जब वे वास्तविक खतरे पर आधारित हों, न कि असहमति को दबाने के लिए। लोकतंत्र में विरोध का स्थान है और राज्य का कर्तव्य है कि वह इसे कानून के दायरे में सुविधा दे, न कि अनावश्यक रूप से बाधित करे। पारदर्शिता, व्यक्तिगत आधार पर कार्रवाई और न्यायालय की निगरानी ही इस संतुलन को बनाए रख सकती है। हालिया घटनाएं इस बात की याद दिलाती हैं कि मौलिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था दोनों ही लोकतंत्र के स्तंभ हैं, किसी एक को कमजोर करने से दूसरा भी कमजोर पड़ता है।


अस्वीकरण: यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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