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यूसीसी पर बिहार में बड़ा सवाल: भाजपा का एजेंडा चलेगा या सहयोगियों का मैथेमेटिक्स?
अमित शाह के यूसीसी लागू करने के ऐलान ने बिहार की नई भाजपा सरकार के सामने गठबंधन की पहली बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। भाजपा यूसीसी को अपने वैचारिक एजेंडे के तौर पर आगे बढ़ाना चाहती है, लेकिन उसके सहयोगी दलों का सामाजिक आधार और उनकी राजनीतिक मजबूरियां अलग हैं। नीतीश की जदयू ने सावधानी बरती है, चिराग ने हितधारकों की राय की जरूरत बताई है और कुशवाहा ने भी आपत्ति जताई है। ऐसे में सवाल सिर्फ यूसीसी लागू करने का नहीं, बल्कि यह है कि क्या भाजपा अपने सहयोगियों के वोट बैंक और राजनीतिक हितों को साधते हुए बिहार में इस मुद्दे पर सहमति बना पाएगी? फिलहाल सहमति की राह आसान नहीं दिखती, लेकिन अंतिम तस्वीर विधेयक के प्रावधान और एनडीए के भीतर होने वाली बातचीत से तय होगी।
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यूसीसी
- फोटो : Amarujala.com/AI
विस्तार
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू करने के ऐलान ने बिहार की राजनीति में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। बिहार इसलिए खास है क्योंकि यहां पहली बार भाजपा के नेतृत्व में सरकार है, लेकिन सरकार का राजनीतिक आधार सिर्फ भाजपा नहीं है।
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जदयू, लोजपा (रामविलास), राष्ट्रीय लोक मोर्चा और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा जैसे सहयोगी दल भी सत्ता के समीकरण का हिस्सा हैं। ऐसे में यूसीसी पर भाजपा का रुख और सहयोगियों की राजनीतिक जमीन आमने-सामने आती दिख रही है।
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भाजपा के लिए यूसीसी वैचारिक मुद्दा
यूसीसी भाजपा के प्रमुख वैचारिक मुद्दों में रहा है। अमित शाह ने अब इसे 2029 से पहले एनडीए शासित राज्यों में लागू करने का लक्ष्य सामने रख दिया है। इसका सीधा अर्थ है कि बिहार में भी इस मुद्दे पर सरकार को आगे बढ़ना पड़ सकता है। लेकिन बिहार की राजनीति में सवाल सिर्फ कानून बनाने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या गठबंधन के सभी घटक इसके लिए तैयार हैं?
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यहीं से भाजपा के सामने चुनौती शुरू होती है। क्योंकि जिन दलों के साथ मिलकर सरकार चल रही है, उनके अपने सामाजिक आधार, राजनीतिक हित और मतदाता समूह हैं। यूसीसी जैसे संवेदनशील विषय पर वे भाजपा के राष्ट्रीय एजेंडे के साथ कितनी दूर तक चलेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
नीतीश कुमार की जदयू ने दिखाई सावधानी
अमित शाह के बयान के बाद जदयू ने तत्काल हां कहने के बजाय सावधानी का रास्ता चुना। पार्टी ने कहा कि पहले कानून के प्रावधान सामने आने चाहिए और उसके बाद उनका अध्ययन करके फैसला किया जाएगा। जदयू के वरिष्ठ नेता और उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि अगर प्रावधान तार्किक होंगे तो पार्टी बिना वजह विरोध नहीं करेगी। साथ ही पार्टी के भीतर यह भी कहा गया है कि बिहार की सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा।
इस रुख को सीधे समर्थन या विरोध की श्रेणी में रखना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना साफ है कि भाजपा के ऐलान के बावजूद जदयू ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति बनाए रखी है। यही इस मुद्दे को महत्वपूर्ण बनाता है।
नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर फैसले लेते रहे हैं। इसलिए यूसीसी पर उनकी पार्टी के लिए सवाल केवल वैचारिक नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आधार को लेकर भी है।
चिराग का संदेश- समानता भी, विविधता भी
लोजपा (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने भी तत्काल समर्थन नहीं दिया। उन्होंने भारत के सामाजिक ताने-बाने की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग वर्गों की अपनी नागरिक परंपराएं और रीति-रिवाज हैं। उन्होंने संविधान में कुछ समुदायों और क्षेत्रों के लिए मौजूद विशेष प्रावधानों का भी उल्लेख किया। उनका कहना है कि प्रस्ताव और उसके प्रावधान सामने आने के बाद पार्टी अपना रुख तय करेगी।
चिराग पासवान का यह रुख बताता है कि भाजपा के सहयोगी दल यूसीसी को सिर्फ भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसके वास्तविक प्रावधानों को देखकर फैसला करना चाहते हैं।
उपेंद्र कुशवाहा ने भी दरवाजा बंद नहीं किया
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का रुख भी इसी तरह सावधानी वाला है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और अलग-अलग राज्यों की ओर से प्रस्ताव सामने आने के बाद ही उनकी पार्टी इस पर टिप्पणी करेगी। यानी कुशवाहा ने न तो अभी समर्थन की घोषणा की है और न ही विरोध का ऐलान किया है।
यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि कुशवाहा की पार्टी भी बिहार एनडीए का हिस्सा है। उनका बयान यह संकेत देता है कि सहयोगी दल अंतिम निर्णय से पहले यूसीसी के वास्तविक स्वरूप को देखना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में, भाजपा ने लक्ष्य घोषित कर दिया है, लेकिन सहयोगियों ने अभी यह तय नहीं किया है कि उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे किस हद तक साथ चलेंगे।
जीतनराम मांझी की चुप्पी भी चर्चा में
इस बीच हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के नेता जीतनराम मांझी का रुख भी चर्चा का विषय है। हालिया रिपोर्टों में एचएएम को यूसीसी पर भाजपा के रुख के समर्थन में बताया गया है। लेकिन राजनीतिक रूप से दिलचस्प बात यह है कि मांझी की ओर से ऐसा कोई विस्तृत सार्वजनिक हस्तक्षेप सामने नहीं आया है, जैसा जदयू या चिराग की ओर से दिखाई दिया। इसलिए उनकी स्थिति को सिर्फ चुप्पी के आधार पर विरोध या समर्थन की किसी नई व्याख्या में बदलना उचित नहीं होगा।
फिलहाल उपलब्ध संकेत यही बताते हैं कि एचएएम भाजपा के पक्ष के ज्यादा करीब है, जबकि जदयू, चिराग और कुशवाहा ने प्रस्ताव देखने के बाद निर्णय लेने की बात कही है। यानी बिहार एनडीए के भीतर यूसीसी को लेकर तस्वीर एक जैसी नहीं है।
सवाल वोट बैंक का भी है
यहीं इस पूरे विवाद का राजनीतिक पक्ष सामने आता है। भाजपा के लिए यूसीसी एक घोषित वैचारिक मुद्दा है। लेकिन सहयोगी दलों के लिए हर बड़े फैसले का असर उनके अपने सामाजिक आधार पर भी पड़ता है।
जदयू को बिहार के व्यापक सामाजिक समीकरणों को देखना होगा। चिराग पासवान को अपने राजनीतिक आधार और सामाजिक विविधता के बीच संतुलन बनाना होगा। कुशवाहा की पार्टी को भी अपने प्रभाव वाले सामाजिक समूहों को ध्यान में रखना होगा। एचएएम के लिए परिस्थिति अलग हो सकती है, क्योंकि उसका राजनीतिक रुख फिलहाल भाजपा के करीब दिखाई देता है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि सहयोगी दल भाजपा के साथ हैं या नहीं। सवाल यह है कि वे भाजपा के यूसीसी एजेंडे के साथ कितनी दूर तक जाने को तैयार हैं।
क्या सरकार की सेहत पर असर पड़ेगा?
यूसीसी पर मतभेद सामने आने भर से बिहार सरकार के अस्तित्व पर तत्काल संकट मान लेना उचित नहीं होगा। गठबंधन सरकारों में कई मुद्दों पर सहयोगी दलों के अलग-अलग विचार होते हैं। असली परीक्षा तब होगी जब यूसीसी का ठोस मसौदा सामने आएगा और बिहार में उसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू होगी।
अगर मसौदे में ऐसे प्रावधान होते हैं जिन पर सहयोगियों को आपत्ति नहीं होती, तो बातचीत के जरिए रास्ता निकल सकता है। लेकिन अगर सहयोगियों को लगे कि इससे उनके सामाजिक या राजनीतिक आधार पर सीधा असर पड़ेगा, तो असहमति ज्यादा गंभीर हो सकती है।
फिलहाल जदयू ने बातचीत का रास्ता चुना है और उसके नेता संजय झा के अमित शाह से चर्चा की संभावना है। इससे संकेत मिलता है कि एनडीए के भीतर संवाद की प्रक्रिया अभी बाकी है।
पहली भाजपा सरकार की पहली बड़ी परीक्षा?
बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाली नई सरकार के सामने यूसीसी इसलिए बड़ा मुद्दा है क्योंकि यह सरकार के शुरुआती दौर में ही भाजपा की वैचारिक प्राथमिकता और सहयोगियों की राजनीतिक जरूरतों के बीच संतुलन का सवाल लेकर आया है। एक तरफ अमित शाह का स्पष्ट लक्ष्य है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार की जदयू ने सावधानी बरती है, चिराग पासवान ने व्यापक चर्चा की बात कही है और उपेंद्र कुशवाहा ने प्रस्ताव सामने आने तक फैसला सुरक्षित रखा है।
जीतनराम मांझी का पक्ष फिलहाल भाजपा के ज्यादा करीब बताया जा रहा है, लेकिन उनकी ओर से इस मुद्दे पर वैसी मुखरता नहीं दिखी है। बहरहाल, बिहार में यूसीसी की राह केवल विधानसभा की संख्या का गणित नहीं होगी। यह एनडीए के भीतर सहमति का गणित भी होगी।
और यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल है- बिहार में पहली बार भाजपा के मुख्यमंत्री वाली सरकार अपने सहयोगियों के सामाजिक आधार और भाजपा के वैचारिक एजेंडे के बीच कितना संतुलन बना पाती है? फैसला यूसीसी के मसौदे और उस पर होने वाली बातचीत से निकलेगा।
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