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बच्चों को इंटरनेट से दूर करना ठीक नहीं: हानिकारक ऑनलाइन सामग्री से बचाना, डिजिटल दुनिया से बाहर करने में अंतर
न्यायालय का तर्क है कि बच्चों को हानिकारक ऑनलाइन सामग्री से बचाना और उन्हें पूरी तरह से डिजिटल दुनिया से बाहर कर देना, इन दोनों में फर्क है।
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ऑनलाइन खतरों से निपटने के उपाय पर गंभीरता से विचार करना होगा (सांकेतिक)
- फोटो : Adobe Stock
विस्तार
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण इंटरनेट तक पहुंच पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय, हानिकारक सामग्री, जवाबदेही और उचित सुरक्षा उपायों पर केंद्रित है। सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों की इंटरनेट, विशेष रूप से सोशल मीडिया तक पहुंच को उम्र के आधार पर सीमित करने की प्रवृत्ति पर विचार करते हुए ऑनलाइन खतरों से निपटने के उपाय के तौर पर ऐसी पाबंदियों का समर्थन करने से इन्कार कर दिया।
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न्यायालय का तर्क है कि बच्चों को हानिकारक ऑनलाइन सामग्री से बचाना और उन्हें पूरी तरह से डिजिटल दुनिया से बाहर कर देना, इन दोनों में फर्क है। न्यायालय ने माना कि इंटरनेट, अपने मौजूदा रूप में, बच्चों के लिए बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। न्यायालय की चिंता यह थी कि बच्चों की सुरक्षा के उपायों में नुकसान की जड़ पर ध्यान दिया जाना चाहिए, न कि उस नुकसान का बोझ खुद बच्चों पर डाल दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री तैयार करने, प्रसारित करने, फैलाने, बेचने या खोजने वालों के साथ-साथ, इसे पहचानने और हटाने में नाकाम रहने वाले मध्यस्थों को भी दोषी माना। न्यायालय का तर्क था कि बच्चों को इंटरनेट से दूर रखने का मतलब होगा पीड़ित को ही समस्या मान लेना।
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न्यायालय ने चिंता जताई कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के उपायों में अनिवार्य रूप से उपयोगकर्ताओं की पहचान करना और उनकी उम्र का पता लगाना, संवेदनशील डाटा इकट्ठा करना और उसकी निगरानी करना शामिल होता है। इससे डाटा के दुरुपयोग और निगरानी का जोखिम पैदा हो जाता है। ये चिंताएं निजता के अधिकार के तहत मिलने वाली सुरक्षा के विपरीत हैं।
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न्यायालय ने दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए, सीखने के स्रोत के रूप में इंटरनेट के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह एक ऐसा माध्यम है, जिसके जरिये विशेष जरूरतों वाले बच्चे, समान अनुभवों वाले अन्य लोगों से जुड़ सकते हैं। इसलिए इंटरनेट तक पहुंच पर पाबंदियां केवल सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं रहतीं। इनका असर बच्चों की जानकारी पाने, सीखने और अपनी बात व्यक्त करने की क्षमता पर भी पड़ सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पाबंदियों को खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि उम्र के आधार पर कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए। बच्चों तक पहुंचने वाले कंटेंट को नियंत्रित करने की जरूरत है, लेकिन माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी जरूरी है। साथ ही, सोशल मीडिया अकाउंट्स के लिए एक विशेष ‘चाइल्ड मोड’ बनाने की बात भी कही गई। इसमें अकाउंट को डिफॉल्ट रूप से ‘प्राइवेट’ रखना, अनजान वयस्कों से संपर्क और संदेशों पर रोक लगाना, और बच्चों तक पहुंचने वाले विज्ञापनों व कंटेंट को नियंत्रित करना शामिल है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे उपाय 13 साल से कम उम्र के बच्चों पर भी लागू किए जा सकते हैं, बशर्ते माता-पिता की सहमति की उचित तरीके से पुष्टि की जाए। इन उपायों को कैसे लागू किया जाए, यह न्यायालय ने केंद्र सरकार पर छोड़ दिया है। इन निर्देशों से केंद्र सरकार को इसलिए नहीं रोका गया है कि वह बच्चों को कुछ खास तरह के कंटेंट या सेवाओं तक पहुंचने से रोके, जो उनके लिए हानिकारक हैं।
इन उपायों का उद्देश्य हानिकारक सामग्री की पहचान और उसे हटाने की प्रक्रिया में सुधार करना, तथा कानूनी दायित्वों का पालन सुनिश्चित करना है। इसका मतलब यह नहीं कि केवल तकनीकी साधनों के जरिये ही बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाया जा सकता है। साथ ही, यह आदेश अपने सभी प्रस्तावित नीतिगत उपायों को अपने-आप लागू होने वाला नहीं बनाता है। कई पहलुओं के लिए दिशा-निर्देशों, मानक संचालन प्रक्रियाओं या केंद्र सरकार द्वारा आगे और कार्रवाई किए जाने की जरूरत है।
इसका मतलब न तो यह है कि हर ऑनलाइन सेवा तक निर्बाध पहुंच होनी चाहिए, और न ही यह सभी सुरक्षात्मक सीमाओं को खारिज करता है। यह एक अधिक सटीक दृष्टिकोण की मांग करता है, जिसमें निजता, जानकारी तक पहुंच और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
(लेखक पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)