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पहले ढांचागत सुधारों पर बात हो: भारतीयों को बेहतर प्रतिनिधित्व की जरूरत, लेकिन अभी केवल राजनीतिक कमी पूरी होगी
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इसमें कोई शक नहीं कि भारतीयों को बेहतर प्रतिनिधित्व की जरूरत है। लेकिन, समस्या यह है कि बगैर ढांचागत सुधारों के सांसदों की संख्या बढ़ाने से राजनीतिक कमी तो पूरी हो सकती है, किंतु विकास की कमी नहीं।
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संसद में सीटें बढ़ाने पर जोर
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
संसद के मानसून सत्र में 19 बैठकों में 11 बिल पास किए गए। इनमें से दस बिलों पर लोकसभा में कुल मिलाकर 64 मिनट का समय लगा। नौ बिलों के मामले में, सिर्फ उन्हें पेश करने वाले मंत्री ने ही बात की और कोई बहस नहीं हुई। निचले सदन में पूरे सत्र के दौरान प्रश्नकाल सिर्फ नौ मिनट चला, जो तय समय का महज एक प्रतिशत ही था, और मौखिक जवाब के लिए सूचीबद्ध किए गए 380 सवालों में से सिर्फ दो के जवाब दिए गए। इस खराब रिकॉर्ड की वजह से सांसदों की संख्या बढ़ाने की कोशिशों पर ध्यान गया है।
अजीब बात यह है कि इस सत्र में सरकार जिस एक बिल को पेश नहीं कर पाई, वह संसद के विस्तार से जुड़ा था, यानी ‘परिसीमन बिल, 2026’। यह बिल लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने वाला था, लेकिन यह राजनीति और आंकड़ों के फेर में उलझकर रह गया। लोगों के बीच चर्चा खर्च को लेकर है। इसमें अतिरिक्त सांसदों का खर्च (जिसका अनुमान 1,500 करोड़ रुपये या उससे अधिक है) रहने-सहने का खर्च, बजट आवंटन में बढ़ोतरी और निश्चित रूप से विधायकों की संख्या बढ़ने से होने वाला अतिरिक्त खर्च वगैरह शामिल हैं। राज्यों को अलग-थलग महसूस कराने का खर्च भी है, क्योंकि वे इसे मुख्यधारा से खुद को दूर करने वाला कदम मानते हैं।
सबसे बड़ी बात तो यह है, जो हर सत्र के बाद उठती है कि क्या सांसद लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं या पार्टियों का? क्या इससे कुछ बेहतर होगा?
चुनाव क्षेत्रों की संख्या बढ़ाने के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि छोटे चुनाव क्षेत्रों का मतलब है-लोगों का ज्यादा करीबी प्रतिनिधित्व, और करीबी प्रतिनिधित्व का मतलब है बेहतर शासन-व्यवस्था। इस बात का पहला हिस्सा तो गणितीय है। दूसरा हिस्सा प्रतिनिधित्व से जुड़ा एक अनुभव-आधारित दावा है (चाहे वह लोगों का प्रतिनिधित्व हो या महिलाओं के अधिकारों का) और यह मौजूदा ढांचे तथा अब तक के कामकाज के रिकॉर्ड के आधार पर जो संभव है, उससे कहीं ज्यादा का दावा करता है। आखिर एक अतिरिक्त सदस्य असल में क्या कर सकता है! 7वीं अनुसूची रक्षा, विदेश मामले, मुद्रा, बैंकिंग और रेलवे को केंद्र के अधिकार क्षेत्र में रखती है, जबकि सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, भूमि और स्थानीय सरकार राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। 10वीं अनुसूची उस सदस्य को अयोग्य ठहराती है, जो अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट करता है। दखल देने की गुंजाइश उस समय के राजनीतिक माहौल से सीमित होती है-इस सत्र में ‘ध्यानाकर्षण प्रस्ताव’ और ‘स्थगन प्रस्ताव’ की संख्या शून्य रही है।
माना जाता है कि बहुत छोटे इलाकों (स्थानीय निर्वाचन क्षेत्रों) में राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने से कामकाज बेहतर होता है। लेकिन, बेहतर नतीजों की यह धारणा बहस का विषय है। एनबीईआर के वेदा नरसिम्हन और जेफरी वीवर ने 1.5 लाख स्थानीय सरकारों (पंचायतों) में 12 लाख बेहद स्थानीय प्रतिनिधियों का अध्ययन किया। नतीजा यह निकला कि मुख्य कामों, जैसे कार्यक्रम लागू करना और सरकारी पैसे की देखरेख, पर कोई खास असर नहीं दिखा। डेनिलो फ्रेरे की अगुआई में और ब्रिटिश जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस में छपे कई अध्ययनों के विश्लेषण में पाया गया कि इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं है कि विधायिका का आकार सरकारी बजट को किसी भी दिशा में बदलता है। ज्यादा प्रतिनिधित्व की बात को अध्ययनों और शासन के ढांचे से चुनौती मिलती है।
संसद के हर सत्र में मंत्री खराब सेवाओं के लिए जवाबदेही से बचते हुए दिखते हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, कानून-व्यवस्था, शहर, पानी, खेती, जमीन और लेबर परमिट राज्य के विषय हैं। 307 और सांसदों के आने से नतीजों में कोई बदलाव नहीं आएगा। वे वही सवाल 307 बार पूछेंगे और उन्हें वही जवाब मिलेगा। कानून बनाने की शक्ति के साथ-साथ खर्च करने की शक्ति भी होती है। सबसे ज्यादा पैसा उन कामों के लिए रखा गया है, जो राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। असल में, 191 बड़ी योजनाओं में से ज्यादातर (जिनमें प्रधानमंत्री से जुड़ी 29 योजनाएं भी शामिल हैं, जिन पर चार लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च होना है) राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विषयों से जुड़ी हैं। नागरिकों की जिंदगी और रोजी-रोटी से जुड़ी लगभग हर परेशानी का समाधान राज्यों को करना चाहिए। लापता कॉन्स्टेबल, जर्जर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, बिना शिक्षकों वाले सरकारी स्कूल, जमीन के रिकॉर्ड में गड़बड़ी, खाली पद, दूषित पानी की समस्या, कस्बों में झुग्गी-बस्तियां, शहरों में बाढ़, खराब पानी आपूर्ति का फायदा उठाने वाला टैंकर माफिया, और म्युनिसिपल कस्बों में गाद और कचरा-ये सभी राज्यों से जुड़े मामले हैं।
850 सांसदों की मांग, मौजूदा 543 सांसदों के कामकाज के रिकॉर्ड के बिल्कुल उलट है। संविधान बनाने वालों ने केंद्र सरकार को संघ को मजबूत करने की शक्तियां दी थीं और राज्यों को विकास करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। समस्या यह है कि सत्ता की चाबी संसाधनों पर कब्जे में निहित है। केंद्र की सरकारों ने एक के बाद एक कई संशोधन किए (जिनमें 42वां संशोधन सबसे बुरा था) और राज्यों को लगभग अपना उपनिवेश बना लिया। नीतियां दिल्ली में बनती हैं, और उन्हें लागू करने का काम राज्यों का होता है। खराब शासन की जड़ अधिकार और जवाबदेही के बीच का अलगाव है। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीयों को बेहतर प्रतिनिधित्व की जरूरत है। जमीनी स्तर पर प्रतिनिधित्व की जरूरत कहीं अधिक है। भारत की तरक्की का अगला चरण ढांचागत सुधारों पर निर्भर करता है। शुरुआत 42वें संशोधन को पलटने और 7वीं अनुसूची को उस मूल रूप में बहाल करने से होनी चाहिए, जिसकी कल्पना बाबा साहेब आंबेडकर व अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर ने की थी।
हर बड़ा सुधार और कल्याणकारी विचार राज्यों से ही आया है। सरकार के तीसरे स्तर को फंड, काम और कर्मचारी देकर मजबूत करें। जब यह आधार तैयार हो जाएगा, तभी किसी भी स्तर पर ज्यादा प्रतिनिधियों की बात को सही ठहराया जा सकेगा। बिना ढांचागत सुधारों के सांसदों की संख्या बढ़ाने से राजनीतिक कमी तो पूरी हो सकती है, लेकिन विकास की कमी नहीं। प्रतिनिधित्व कोई संख्या नहीं है, यह एक शक्ति है। बिल में जो पेश किया जा रहा है, वह सिर्फ एक संख्या है।