{"_id":"6ac701546385eb5d3301a587","slug":"indian-space-sector-isro-importance-start-up-pm-modi-2026-10-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"एक चुनौती, जो हमें दी गई: जब भारतीय स्टार्टअप ने अंतरिक्ष में खुद की राह बनाई","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
एक चुनौती, जो हमें दी गई: जब भारतीय स्टार्टअप ने अंतरिक्ष में खुद की राह बनाई
Thu, 08 Oct 2026 08:05 AM IST
नितिन गौतम
अनिरुद्ध शर्मा, तनवीर अहमद, अमर उजाला
अनिरुद्ध शर्मा, तनवीर अहमद, अमर उजाला
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 08 Oct 2026 08:05 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
हम उस पीढ़ी का हिस्सा हैं, जो प्रधानमंत्री मोदी के सार्वजनिक सेवा में 25 वर्षों के दौरान बड़ी हुई और उनकी प्रेरणा से ऐसी चीजें बना रही है, जिन्हें कभी दूसरे देशों से खरीदना पड़ता था।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सैटेलाइट (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो :
फ्रीपिक
विस्तार
एक खास तरह का आत्मविश्वास किसी देश में तभी आता है, जब वह खुद के लिए चीजें बनाना शुरू करता है। सही मायनों में आत्मनिर्भरता का मतलब है, ऐसे हालात बनाना, जहां कोई युवा जोखिम ले सके, लड़खड़ाए, सीखे, फिर से शुरुआत और कोशिश करने के बाद भी उसकी पहचान सिर्फ उस कोशिश से तय न हो। प्रधानमंत्री मोदी ने भी विफलता को सफलता के रास्ते का एक पड़ाव माना है। कई मायनों में ‘दिगंतारा’ इसी सोच का परिणाम है।हमारी कहानी की शुरुआत 2018 में हुई। मैं पंजाब में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहा था। स्कूल के मेरे दोस्त तनवीर अहमद बंगलूरू में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे और एक स्टूडेंट सैटेलाइट पर काम कर रहे थे। एक साल बाद, एक सैटेलाइट, जिसमें हमारे आपूर्ति किए गए कल-पुर्जे लगे थे, अंतरिक्ष मलबे से टकरा गया। कक्षा की विशालता में यह एक छोटी-सी घटना थी, लेकिन इसने हमें एक बहुत बड़ी बात सिखाई कि हमारे ग्रह के आस-पास का अंतरिक्ष इतनी तेजी से मलबे से भर रहा था कि कोई भी उसका हिसाब नहीं रख पा रहा था और किसी न किसी को तो यह करना ही था।
2020 की शुरुआत में, मैंने कॉलेज छोड़ दिया और हम उस विचार पर पूरी तरह से काम करने के लिए बंगलूरू चले गए। जून तक, अपने प्रस्ताव को कई बार बेहतर बनाने के बाद, हमें भारतीय विज्ञान संस्थान के इनक्यूबेशन प्रोग्राम में जगह मिल गई। उसी महीने, हमें पता भी नहीं था कि नई दिल्ली में एक ऐसा फैसला लिया गया, जिसने हमारे आगे के सभी कामों की दिशा तय कर दी। पांच दशकों तक, अंतरिक्ष का काम सिर्फ सरकार के हाथ में था; 2014 में, भारत में सिर्फ एक पंजीकृत अंतरिक्ष स्टार्टअप था। जून 2020 में, महामारी के दौरान, सरकार ने इस क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया और इसे बढ़ावा देने और मंजूरी देने के लिए इन-स्पेस का गठन किया।
2022 में, दिगंतारा उन पहली दो निजी कंपनियों में से एक बनी, जिन्हें इन-स्पेस ने मंजूरी दी, और हमारा पहला पेलोड कक्षा में पहुंचा। उसी साल, तनवीर और मैं इन-स्पेस के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री से मिले, जिन्होंने बाद में ‘मन की बात’ में इस मुलाकात का जिक्र किया। उन्होंने हमें एक ऐसे स्टार्टअप के तौर पर बताया, जो अंतरिक्ष में कचरे की माप (मैपिंग) करने की कोशिश कर रहा है, और देश को बताया कि उन्होंने हमें एक चुनौती दी है: ऐसी तकनीक विकसित करना, जो अंतरिक्ष में कचरे की समस्या को हल कर सके। इसके बाद 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति ने पूरी मूल्य-शृंखला को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया, और 2024 के नियमों व दिशा-निर्देशों ने प्रक्रियाओं को और स्पष्ट कर दिया।
यह स्पष्टता किसी भी अनुदान से ज्यादा मायने रखती थी। इसकी ही बदौलत चार वर्षों में भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी निवेश लगभग छह गुना बढ़ गया। जनवरी 2025 में, हमने भारत का पहला स्वदेशी अंतरिक्ष निगरानी मिशन स्कॉट लॉन्च किया। हमारे लिए, यह उस चुनौती का पहला पूरा जवाब था, जो उन्होंने तीन साल पहले दी थी।
भारत के फ्रेमवर्क की विश्वसनीयता और अपनी नई कंपनियों को दुनिया के सामने लाने की सरकार की तैयारी ने हमें दक्षिण-पूर्व एशिया के सहयोगी देशों, जिनमें सिंगापुर और थाईलैंड शामिल हैं, तक पहुंचाया, जबकि वैश्विक प्लेटफॉर्म ने हमारे काम को यूरोपीय बाजारों से परिचित कराया। फरवरी 2025 में, जब प्रधानमंत्री मोदी वाशिंगटन जाने की तैयारी कर रहे थे, हमने कोलोराडो में नए संचालन शुरू करने की घोषणा की-एक ऐसा कदम, जिसमें शायद कई साल लग जाते, लेकिन जो काफी हद तक उनकी यात्रा से मिले भरोसे पर टिका था। इस साल अगस्त में, जब हम बीस अंतरिक्ष स्टार्टअप्स के संस्थापकों के साथ प्रधानमंत्री से मिलने गए और उन्हें अपना दूसरी पीढ़ी का ऑप्टिकल पेलोड दिखाया, तो वह मुस्कुराए और पूछा, ‘क्या यह मेरे लिए है?’ यह एक हल्की-फुल्की बात थी, जिसमें एक गंभीर भरोसा छिपा था।
प्रधानमंत्री मोदी के सार्वजनिक सेवा में पच्चीस साल पूरे होने पर, उनके द्वारा किए गए सुधारों और निर्मित अवसंरचनाओं के बारे में बहुत कुछ लिखा जाएगा। हम उस पीढ़ी का हिस्सा हैं, जो इन पच्चीस वर्षों में बड़ी हुई। उनकी प्रेरणा से, आज हममें से कई लोग अब ऐसी चीजें बना रहे हैं, जिन्हें देश को कभी दूसरे देशों से खरीदना पड़ता था। -लेखक वैश्विक अंतरिक्ष खुफिया और रक्षा कंपनी ‘दिगंतारा’ के संस्थापक हैं।