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क्या इन बदलावों के लिए दुनिया तैयार है?: 2027 में मौसम की बड़ी आफत का खतरा

Thu, 08 Oct 2026 07:56 AM IST
नितिन गौतम जेफरी शमन, अमर उजाला
जेफरी शमन, अमर उजाला Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 08 Oct 2026 07:56 AM IST
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सार
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मार्च में प्रशांत महासागर की सतह के नीचे से उठी एक विशाल लहर ने भारत सहित पूरी दुनिया में सुपर अल-नीनो जैसी स्थितियां पैदा कर दी हैं। ये कोई काल्पनिक आशंकाएं नहीं, ठोस भविष्यवाणियां हैं, जिन पर दुनियाभर के जलवायु मॉडल एकमत हैं।
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weather el nino effect impact climate change
अल नीनो - फोटो : AI

विस्तार

मार्च में, सैटेलाइट सेंसर ने प्रशांत महासागर की सतह के नीचे भूमध्य रेखा के साथ पूर्व की ओर बढ़ती एक विशाल लहर का पता लगाना शुरू किया। जैसे-जैसे यह लहर दक्षिण अमेरिका के तट की ओर बढ़ी, इसने समुद्र की ऊंचाई और तापमान को बढ़ा दिया और ऊपर की हवा को गर्म व नम कर दिया। इससे जबर्दस्त तूफान उठे, जिससे वातावरण में बड़े पैमाने पर बदलाव आने शुरू हुए। ये लहरें जल्द ही पूरी दुनिया में फैल गईं और तापमान, बारिश तथा तूफानी सिस्टम की चाल को बदलने लगीं। उस विशाल लहर से पैदा हुए अल-नीनो ने तब से मध्य व पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के एक हिस्से को उसके औसत तापमान से तीन डिग्री सेल्सियस से ज्यादा गर्म कर दिया है।


अनुमान बताते हैं कि इस बात की 80 प्रतिशत से अधिक संभावना है कि यह अल-नीनो (जो कुछ वर्षों में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है) साल के बाकी समय में बहुत मजबूत बना रहेगा और शायद अब तक का सबसे शक्तिशाली अल-नीनो बन सकता है। दुनियाभर की एजेंसियों के दो दर्जन से ज्यादा जलवायु मॉडल अल-नीनो की स्थितियों का अनुमान लगाते हैं, और अक्सर उनमें आपस में सहमति नहीं होती। लेकिन, इस साल अल-नीनो की स्थितियां 2026 के आखिर तक बनी रहेंगी, इस अनुमान पर वे पहले से कहीं ज्यादा एकमत हैं। 


इतनी अधिक निश्चितता का मतलब है कि जिन प्रभावों के अनुमान लगाए जा रहे हैं (जैसे कुछ इलाकों में भारी बारिश, तो कुछ में सूखा और जंगलों में आग, साथ ही वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी) उनके होने की आशंका बहुत अधिक है। इसका मतलब यह भी है कि सरकारें, व्यवसाय और समुदाय वैज्ञानिक तौर पर मिली इस असाधारण रूप से स्पष्ट दूरदर्शिता का फायदा उठा सकते हैं। इसलिए, अब भी तैयारी करने का समय है।

पिछली अल-नीनो की घटनाओं से हमें इसके कई संभावित प्रभावों का अंदाजा मिलता है। दक्षिणी अफ्रीका और भारत में बारिश कम होने और सूखे की आशंका है, जिससे खाने-पीने की चीजों की आपूर्ति पर असर पड़ सकता है और पनबिजली उत्पादन में रुकावट आ सकती है। इंडोनेशिया में सूखे के कारण जंगलों में आग लग चुकी है और आने वाले समय में भी इसका खतरा बने रहने की आशंका है। सर्दियों के दौरान दक्षिणी गोलार्ध में आने वाली गर्मियां बहुत गर्म हो सकती हैं, और ऑस्ट्रेलिया तथा ब्राजील के कुछ हिस्सों में हीटवेव (लू) चलने की आशंका ज्यादा है। केन्या, पूर्वी चीन और दक्षिणी अमेरिका जैसे अन्य इलाकों में औसत से ज्यादा बारिश होने की संभावना है। मौजूदा अनुमानों के मुताबिक, अक्तूबर से दिसंबर के बीच दक्षिण-पूर्वी अमेरिका के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश होने की 70 फीसदी से ज्यादा संभावना है, जिससे बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।

अल-नीनो की घटनाओं का संबंध पृथ्वी की सतह के तापमान में अचानक बढ़ोतरी से भी है। पृथ्वी की सतह का 70 प्रतिशत हिस्सा महासागर है, इसलिए महासागर ग्रीनहाउस गैसों से फंसी ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा सोख लेते हैं और नतीजतन गर्म हो जाते हैं। अल-नीनो की घटनाएं उस ऊर्जा के कुछ हिस्से को वापस वायुमंडल में छोड़ने में मदद करती हैं। 1997, 2015 और 2023 में हुई पिछली तीन बड़ी अल-नीनो की घटनाओं के दौरान सतह के तापमान में काफी बढ़ोतरी देखी गई। इनमें से हर साल तब तक का सबसे गर्म साल था और उसके बाद के वर्षों में भी तापमान ज्यादा बना रहा। असल में, बाद के हर साल (1998, 2016 और 2024) का तापमान पिछले रिकॉर्ड-तोड़ तापमान से भी ज्यादा था। तापमान बढ़ने से मौसम और ज्यादा खराब हो सकता है। लू की घटनाएं बढ़ सकती हैं, सूखा और जंगल की आग का खतरा बढ़ सकता है, जबकि तूफानों के कारण भारी व बार-बार बारिश हो सकती है। इससे पूरी दुनिया पर असर पड़ेगा और इसका मतलब है कि 2027 में मौसम और भी खराब हो सकता है।

तथाकथित ‘सुपर अल-नीनो’ से होने वाले बदलाव खेती, ऊर्जा और पानी की सुरक्षा, पारिस्थितिकी तंत्र, आपूर्ति शृंखला, वित्त, यात्रा और सेहत पर बुरा असर डालेंगे। सरकारों, समुदायों और कारोबारियों को ऐसी रुकावटों से निपटने की अपनी क्षमता का आकलन करना चाहिए और उनसे निपटने के लिए जरूरी संसाधन और योजनाएं तैयार रखनी चाहिए। हम मान सकते हैं कि 2027 की गर्मियों में उत्तरी गोलार्ध में बहुत अधिक गर्मी पड़ेगी। इसे देखते हुए, स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और अस्पतालों को लू, दिल और किडनी की समस्याओं वाले मरीजों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए। नगरपालिकाओं को भीषण गर्मी से निपटने के अपने तरीकों की समीक्षा करनी चाहिए। इसमें बुजुर्गों और बीमार लोगों की देखभाल की प्रणाली, सामुदायिक शीतलन केंद्र की योजनाएं और लोगों को तब चेतावनी देने के नियम शामिल होने चाहिए, जब बाहर निकलना जोखिम भरा हो। उन्हें बिजली आपूर्ति को प्रबंधित करने के लिए भी योजनाएं बनानी होंगी। दुनिया के कई हिस्सों में जंगल की आग का खतरा काफी बढ़ सकता है। ऐसे में, अलग-अलग एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल, आग बुझाने वाली टीमों के लिए ज्यादा फंड और खतरे वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए चेतावनी प्रणाली को बेहतर करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। 

राज्य और सरकारें घर के मालिकों को अपनी संपत्ति सुरक्षित रखने के लिए प्रोत्साहित भी कर सकती हैं; जैसे कि झाड़ियों को हटाना या आग-रोधी छतें लगवाना, आदि। आपूर्ति शृंखला में रुकावट आ सकती है और जमाखोरी, मुनाफाखोरी और बाजार में अस्थिरता जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम ने फसल नुकसान की आशंका को देखते हुए अफ्रीका के कुछ इलाकों के लिए पहले ही फंड जारी कर दिया है। कैलिफोर्निया ने भी ‘अल-नीनो’ से जुड़ी बाढ़ की आशंका को देखते हुए अपनी नदियों और तटों पर बाढ़ से निपटने के लिए रेत की बोरियों और पंपों जैसे सामान पहले ही तैनात कर दिए हैं।

अल-नीनो से संबंधित ये अनुमान भविष्य में होने वाली गर्मी के बारे में कोई काल्पनिक बातें नहीं हैं। ये जलवायु और मौसम की स्थितियों के बारे में ठोस भविष्यवाणियां हैं, जिनमें से कुछ अगले 18 महीनों के दौरान बहुत ज्यादा उथल-पुथल मचा सकती हैं। तैयारी करने, योजना बनाने और अपने सिस्टम को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए अब भी समय है। 
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