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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Issue: Where should pedestrians go and how will they find their way?

मुद्दा: पैदल यात्री आखिर कहां जाएं, कैसे निकलेगी राह

Fri, 21 Aug 2026 08:13 AM IST
Pavan डॉ. पी के बाजपेयी
डॉ. पी के बाजपेयी Published by: Pavan Updated Fri, 21 Aug 2026 08:13 AM IST
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सार
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जब लोगों के पास पैदल चलने की जगह ही न हो, तो क्या उन्हें आवागमन की आजादी है? सुप्रीम कोर्ट ने इसे मूल अधिकार माना है, फिर भी देश में 60 फीसदी फुटपाथ चलने योग्य नहीं हैं।
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Issue: Where should pedestrians go and how will they find their way?
पैदल यात्री आखिर जाएं तो जाएं कहां - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

फिनलैंड की अपनी यात्रा के दौरान मैंने देखा कि वहां प्रत्येक चौराहे पर सड़क पार करने के लिए एक निश्चित अंतराल पर सायरन बजता था और एक मिनट तक यातायात रुक जाता था, ताकि पैदल यात्रियों व दिव्यांगजनों को सड़क पार करने का रास्ता मिल सके। हमें भी पैदल चलने वालों, राहगीरों और दिव्यांगजनों को रास्ता देना होगा तथा सड़कों को पार करने एवं फुटपाथों पर चलने के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना होगा।


विडंबना यह है कि आज भारत के अधिकांश शहरों और कस्बों में पैदल चलना कठिन हो गया है। 19 जून, 2026 को मनियार इलियास, शेख रियाज व अन्य बनाम पी अय्यप्पन व अन्य के मामले में दिए गए एक ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 19(1)(d) के अंतर्गत निर्धारित पैदल पथ पर चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया। यह मामला एक दर्दनाक घटना के बाद सामने आया, जब पांच साल का एक बच्चा अपने पिता के साथ पैदल स्कूल जा रहा था और टैंकर की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई। सड़क पर न तो फुटपाथ था और न ही सड़क पार करने की कोई व्यवस्था।


न्यायालय ने इसे महज सड़क दुर्घटना न मानकर एक बड़े सांविधानिक प्रश्न को उठाया कि जब किसी नागरिक के पास सुरक्षित रूप से पैदल चलने के लिए कोई स्थान ही न हो, तो क्या उसे वास्तव में आवागमन की स्वतंत्रता प्राप्त है? न्यायालय ने कहा कि एक निर्धारित व सुव्यवस्थित फुटपाथ उपलब्ध कराना संबंधित प्राधिकरण का दायित्व है। शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और यहां तक कि पंचायतों को भी इसके लिए जिम्मेदार प्राधिकरण के रूप में चिह्नित किया गया है।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 2023 में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों में 20.4 प्रतिशत पैदल यात्री थे, जो 2022 के मुकाबले 7.3 प्रतिशत ज्यादा है। वहीं, 2024 में पैदल यात्रियों की मौत की संख्या बढ़कर सड़क दुर्घटनाओं में हुई कुल मौतों का 20.6 प्रतिशत हो गई। 2025 में भारत के 20 शहरी फुटपाथों के हिस्सों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 19 से 95 प्रतिशत हिस्सों में निरंतरता का अभाव था। वहीं, 60 प्रतिशत फुटपाथ भारतीय सड़क कांग्रेस के मानकों के अनुसार पर्याप्त चौड़े नहीं थे। अध्ययन में शामिल 20 हिस्सों में से 60 प्रतिशत पैदल चलने के लिए अनुकूल नहीं पाए गए।

भारत के 66 शहरों के विशेषज्ञों को शामिल करके किए गए एक शोध में पाया गया कि 42.8 प्रतिशत शहरों में फुटपाथ सभी के लिए सुगम नहीं थे, जबकि इसके लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देश पहले से मौजूद हैं। भारत में नीतियों की कमी नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और प्रभावी क्रियान्वयन की कमी है। जिम्मेदारी तय करने के बजाय केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच दोषारोपण चलता रहता है। शहरी विकास के दिशानिर्देशों में सड़कों के साथ फुटपाथ उपलब्ध कराने का स्पष्ट प्रावधान है। हमें सुनिश्चित करना होगा कि जहां पैदल यात्रियों की आवाजाही अपेक्षित है, वहां सड़क के साथ अवरोध-मुक्त, सुरक्षित व सुगम पैदल मार्ग उपलब्ध हो। फुटपाथ पर्याप्त चौड़े हों, उनकी सतह समतल और सुरक्षित हो। वे सुरक्षित क्रॉसिंग से जुड़े हों तथा  पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था हो और पार्किंग व अतिक्रमण से सुरक्षित हों। सरकारी विभागों को खोदाई करने, निर्माण सामग्री और उपकरणों से पैदल मार्ग को अवरुद्ध करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
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