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सुप्रीम कोर्ट की चिंताएं: कठघरे में सरकार, कानून व्यवस्था से लेकर शिक्षा तक एकसाथ पांच से अधिक मामले

Wed, 30 Sep 2026 09:51 AM IST
न्यूज डेस्क अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: न्यूज डेस्क Updated Wed, 30 Sep 2026 09:51 AM IST
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सार
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सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग पीठों ने कानून व्यवस्था से लेकर शिक्षा तक एकसाथ पांच से अधिक मामलों में चिंताएं जताकर सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
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Supreme Court concerns Govt in dock more than five cases simultaneously from law and order to education issues
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

शिक्षा से लेकर कानून व्यवस्था तक सुप्रीम कोर्ट को बेहद चिंतनीय परिदृश्य नजर आ रहा है। जहां स्वतः संज्ञान लेकर दिल्ली-एनसीआर में सामने आ रही दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न की घटनाओं पर शीर्ष अदालत ने कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर सरकार व केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को निर्देश भी दे दिया गया है।



दिल्ली मामले में अदालत ने सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में तंत्र की विफलता पर गहरी चिंता जताने के साथ ही निर्भया मामले का संदर्भ देते हुए पुलिस मशीनरी पर कठोर टिप्पणी की है। जहां संसद, सर्वोच्च न्यायालय और देश की सर्वोच्च पुलिस-प्रशासनिक व्यवस्था मौजूद है, उस राजधानी में अगर महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करें, तो यह पूरी व्यवस्था की ही नाकामी कही जाएगी। इस क्रम में ट्रैफिक चालान से जुड़ा सुझाव भी दिलचस्प है।


अदालत ने हजारों करोड़ रुपयों के लंबित चालानों की वसूली को बिजली के बिल से जोड़ने का सुझाव दिया है, जिससे बकाया वसूली आसान होने के साथ नागरिकों में भी नियमों के प्रति जिम्मेदारी का भाव पैदा होगा। हालांकि, इस सुझाव को लागू करने से पहले व्यवस्थागत व व्यावहारिक पहलुओं पर विचार करना होगा। इसी तरह, यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने पर अदालत ने स्पष्टीकरण चाहा है।

डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के नाम पर अगर आम आदमी पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंकाएं उठने लगती हैं, तो इस डर का निवारण भी जरूरी है कि कहीं नीति अपना उद्देश्य ही न खो दे। दूसरी तरफ, बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच पर न्यायालय की चिंता आज के समय की एक बड़ी सामाजिक चुनौती की ओर संकेत करती है। इसी तरह, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों में स्पष्ट चेतावनी वाले लेबल लगाए जाने में देरी पर न्यायालय ने सवाल उठाए हैं।

आखिर हर उपभोक्ता को यह अधिकार होना ही चाहिए कि वह जो खा रहा है, वह स्वास्थ्य के लिहाज से कितना जोखिम भरा है। अदालत ने एक बार फिर कैंसर की दवाओं की बिक्री पर अनुचित लाभ उठाने की कड़ी निंदा की है। जहां तक शिक्षा के क्षेत्र में कक्षा छह के विद्यार्थियों को त्रिभाषा व्यवस्था में लाने का प्रश्न है, न्यायालय ने निर्देश दिया है कि इस साल उन्हें भी वही छूट मिले, जो कक्षा सातवीं, आठवीं और नौवीं के छात्रों को दी गई है।

इन सभी मामलों को एकसाथ देखने पर साझा प्रश्न उभरता है कि क्या हमारी व्यवस्थाएं ठीक होने के लिए अब भी किसी और निर्देश का इंतजार करेंगी? कानून, नियम व नीतियां बनाने के बाद उनके प्रभावी क्रियान्वयन की भी उतनी ही चिंता होनी चाहिए, जितनी उन्हें बनाते वक्त परिकल्पित की जाती है।

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