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उत्तराखंड: सौर ऊर्जा उत्पादकों को झटका, 4.64 रुपये प्रति यूनिट पुराना टैरिफ देने की मांग खारिज

Tue, 03 Nov 2026 11:54 AM IST
Renu Saklani माई सिटी रिपोर्टर, देहरादून
माई सिटी रिपोर्टर, देहरादून Published by: Renu Saklani Updated Tue, 03 Nov 2026 11:54 AM IST
सार
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मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के तहत सोलर प्लांट लगाने वाले उत्पादकों को अब पुरानी दर का लाभ नहीं मिलेगा। उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने 10 याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि विकासकर्ता तय समयसीमा तक प्लांट तैयार होने का प्रमाण नहीं दे सके।

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Uttarakhand solar producers lose 4.64 Per unit tariff protection regulator rejects 10 petitions read All
सोलर

विस्तार

उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के तहत 200 किलोवाट के सोलर प्लांट लगाने वाले 10 उत्पादकों को बड़ा झटका दिया है। आयोग ने 31 मार्च 2026 की समयसीमा बीतने के बाद भी पुराना 4.64 प्रति यूनिट का टैरिफ देने की मांग वाली सभी 10 याचिकाएं खारिज कर दी हैं। आयोग ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि तय तारीख तक उनके प्लांट वास्तव में बनकर तैयार थे।

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चमोली जिले के 10 सोलर विकासकर्ताओं ने याचिका दाखिल कर दावा किया था कि उनके प्लांट समय पर पूरे हो गए थे। उनका आरोप था कि उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने 11 केवी बिजली निकासी लाइन बिछाने में सुस्ती दिखाई, जिससे प्लांट कमीशन नहीं हो सके। इसलिए उन्हें पुराना आरक्षित टैरिफ ही दिया जाए।

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आयोग के चेयरमैन एमएल प्रसाद, सदस्य विधि अनुराग शर्मा और सदस्य तकनीकी प्रभात किशोर डिमरी की पीठ ने दस्तावेजों की कड़ाई से पड़ताल की, जिसमें विकासकर्ताओं के दावे साफ हो गए। इसके तहत सूरत (गुजरात) से सोलर मॉड्यूल 25 फरवरी से 17 मार्च 2026 के बीच भेजे गए। 1500 किमी की दूरी तय करने में 5-6 दिन लगते हैं। ऐसे में 31 मार्च की समयसीमा से पहले चमोली के लासी गांव में प्लांट खड़ा करना नामुमकिन जैसा था। रिकॉर्ड से सामने आया कि बैंकों से लोन ही जनवरी और फरवरी तक पास हुए।

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विकासकर्ता डिलीवरी चालान, केबल व स्ट्रक्चर खरीद की रसीदें और निर्माण के वक्त की तस्वीरें नहीं दिखा सके। आयोग को जो तस्वीरें दी गईं, वे कट-ऑफ डेट के पांच माह बाद यानी दो सितंबर 2026 की थीं। 10 प्लांट्स के लिए जितने सोलर पैनल्स की जरूरत थी, बिलों में उससे काफी कम क्षमता के मॉड्यूल दर्ज थे।

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नियमों की अनदेखी पड़ी भारी

आयोग ने पाया कि पीपीए के नियमों के तहत ग्रिड से जुड़ने के लिए 60 दिन पहले नोटिस देना जरूरी था, जबकि प्लांट पूरा होने की बात 24 मार्च को कही गई। आयोग ने फैसला दिया कि देरी बिजली निगम की वजह से नहीं बल्कि डेवलपर्स की अपनी लापरवाहियों से हुई। अब इन प्रोजेक्ट्स को कमीशनिंग के वक्त का ही सामान्य टैरिफ मिलेगा।

 

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