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'तुम कुछ नहीं कर सकती': 10वीं मंजिल से गिरकर 7वीं कक्षा की छात्रा की मौत, डायरी में रितिसा लिख गई पूरा सच

Mon, 28 Sep 2026 06:32 PM IST
अनुज कुमार अमर उजाला नेटवर्क, साहिबाबाद (गाजियाबाद)
अमर उजाला नेटवर्क, साहिबाबाद (गाजियाबाद) Published by: अनुज कुमार Updated Mon, 28 Sep 2026 06:32 PM IST
सार
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गुलमोहर ग्रीन सोसायटी की 10वीं मंजिल से गिरकर 7वीं कक्षा की छात्रा रितिसा (13) की मौत हो गई। इस घटना के बाद उसकी डायरी में स्कूल की गणित की शिक्षिका द्वारा परेशान करने की जानकारी मिली है।

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Class 7 student falls from 10th floor and dies diary mentions harassment by teacher
छात्रा रितिसा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गुलमोहर ग्रीन सोसायटी की 10वीं मंजिल से गिरकर 7वीं कक्षा की छात्रा की मौत हो गई। इस घटना के बाद उसकी डायरी में स्कूल की गणित की शिक्षिका के परेशान करने की जानकारी मिली। इसके बाद परिवार ने शिक्षिका से परेशान होकर किशोरी के आत्महत्या करने का आरोप लगाया है। एसीपी अमित सक्सेना ने बताया कि बच्ची की पहचान रितिसा(13) के रूप हुई है। बच्ची के पिता अमर मौर्या मूल रूप से गोरखपुर के रहने वाले हैं। वह पत्नी दीपा, बड़ी में लायसा और रितिसा के साथ सोसायटी के 10वीं मंजिल के फ्लैट पर रहते हैं। उनका प्रिंटिंग का कारोबार है। शनिवार शाम करीब साढ़े पांच रितिसा के गिरने की सूचना मिली। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज मामले की जांच की जा रही है।
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खेलने जाने की बात कर निकली थी
पुलिस के अनुसार छोटी बेटी रितिसा (13) सातवीं कक्षा में राजेंद्र नगर राजबाग रोड स्थित एक नामचीन स्कूल में पढ़ती थी। इसी स्कूल में उनकी बड़ी भी पढ़ाई करती है। परिजन ने बताया कि शनिवार करीब पांच बजे रितिका अपनी मां को दिमाग खराब और खेलने की बात कहकर फ्लैट से निकली थी। कुछ देर बाद वह 10वीं मंजिल से नीचे गिरी मिली। ग्राउंड फ्लोर पर आकर गिरी छात्रा को लहूलुहान देखकर गार्ड ने हल्ला मचा दिया, जिसके बाद पास के फ्लैट में रहने वाले डॉ. मयंक जैन बाहर आए। उन्होंने बच्ची को सीपीआर दिया, उसकी हालत गंभीर देख उसे पास के निजी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां डॉक्टर ने बताया कि बच्ची के सिर, फेफड़े फटने के कारण उसकी उपचार के दौरान मौत हो गई।
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टीचर ने डांटते हुए कान में कहा, तुम कुछ नहीं कर सकती
बड़ी बहन लायसा ने बताया कि गणित की शिक्षिका ने रितिसा को कई बार परेशान किया। कुछ दिन पहले उसे कक्षा से बाहर ले जाकर उसके कान में कहा था कि तुम कुछ नहीं कर सकती हो। पढ़ने में बिल्कुल अच्छी नहीं हो। जो उसने बहन को बताया था। इसके बाद परिजनों ने बच्ची की निजी डायरी देखी। बच्ची अक्सर डायरी में लिखती रहती थी, लेकिन किसी को पढ़ने नहीं देती थी। घटना के बाद अभिभावकों ने डायरी को देखा तो जुलाई से अब तक कई पेज पर बच्ची ने टीचर के टॉर्चर की बातें लिखी थीं। 

बच्ची ने एक बार घर में टीचर के बारे में बताया भी था। तब जुलाई से स्कूल की पैरेंट टीचर मीटिंग में परिजन ने स्कूल प्रबंधन से टीचर की शिकायत की थी। डायरी में एक स्थान पर बच्ची ने टीचर का नाम भी लिखा, अन्य स्थानों पर गणित टीचर के नाम से संबोधित किया गया था। पेपर में कम नंबर आने के लिए भी छात्रा ने टीचर को ही दोषी ठहराया था। घटना के बाद घर पहुंची रितिसा की बेस्ट फ्रेंड ने बताया कि हाल में स्कूल में आंतरिक परीक्षा हुई थी, जिनकी कॉपी शुक्रवार को सभी बच्चों को दी गई थीं। इसमें रितिसा के 30 नंबर आए थे, जिन्हें देखकर उसने सहेली से कहा था कि सोमवार को स्कूल आने पर टीचर उसकी हालत खराब कर देंगी।

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अंकों की दौड़ में कहीं खो न जाए बचपन
एक बच्ची के लिए गणित के कुछ सवाल कितने भारी पड़ सकते हैं? साहिबाबाद के गुलमोहर अपार्टमेंट में सातवीं की छात्रा की मौत ने पढ़ाई के इस दबाव और बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा से जुड़े सवाल फिर सामने ला दिए हैं। पढ़ाई में कमजोर होना किसी बच्चे की पहचान नहीं हो सकता, लेकिन अंकों की दौड़, तुलना और अपेक्षाओं का दबाव कई बार उसके भीतर डर और चुप्पी पैदा कर देता है। बच्चा कब सवाल पूछना छोड़ देता है, कब स्कूल से घबराने लगता है और कब खुद को दूसरों से कम समझने लगता है, यह परिवार और स्कूल को कई बार पता ही नहीं चलता। ऐसे में सवाल सिर्फ एक स्कूल, एक शिक्षिका या एक परिवार का नहीं, बल्कि उस सोच का भी है, जिसमें बच्चे के भविष्य को अंकों की सूची से नापा जाने लगता है।

एमएमजी अस्पताल के मनकक्ष की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. चंदा यादव का कहना है कि बच्चा गणित में कमजोर है तो उसे और गणित चाहिए, डर नहीं। उसे गलती सुधारने का मौका चाहिए, अपमान नहीं। उसे समझाने वाला शिक्षक चाहिए, लगातार तुलना करने वाला माहौल नहीं। इसके बावजूद स्कूलों में कई बार कमजोर विषय को लेकर बच्चों पर अपेक्षाओं का बोझ बढ़ता जाता है। कक्षा में पिछड़ने वाला बच्चा धीरे-धीरे सवाल पूछना बंद कर देता है और अचानक चुप रहने लगता है।

स्कूल जाने से घबराना, पढ़ाई से दूरी बनाना, लगातार उदास या चिड़चिड़ा रहना, नींद और खानपान में बदलाव, दोस्तों और परिवार से अलग रहना या बार-बार खुद को बेकार बताना ऐसे संकेत हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। सबसे जरूरी है कि बच्चे की बात बीच में काटे बिना सुनी जाए। यदि बच्चा जीवन खत्म करने, मरने या जीने की इच्छा न होने जैसी बात करता है तो उसे मजाक, जिद या ध्यान खींचने की कोशिश समझकर टालना खतरनाक हो सकता है। डॉ. चंदा ने बताया कि टेली-मानस की 14416 हेल्पलाइन पर 24 घंटे मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध है।

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हर बच्चे की प्रतिभा अलग, हतोत्साहित नहीं प्रोत्साहित करें
डॉ. चंदा का कहना है कि अभिभावकों की भूमिका भी यहीं से शुरू होती है। अच्छे अंक खुशी दे सकते हैं, लेकिन कम अंक बच्चे की असफलता का प्रमाण नहीं हैं। हर बच्चे की सीखने की गति अलग होती है। किसी की गणित अच्छी हो सकती है तो किसी की भाषा, खेल, कला या किसी दूसरी गतिविधि में रुचि और क्षमता अधिक हो सकती है। बच्चे को हर बार दूसरे बच्चों से आगे निकालने की कोशिश के साथ यह समझना भी जरूरी है कि वह भीतर से किस दबाव से गुजर रहा है। स्कूलों में भी पढ़ाई के साथ बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा को उतनी ही गंभीरता से लेना होगा। शिक्षक की डांट कब सामान्य अनुशासन से आगे बढ़कर बच्चे के लिए भय का कारण बन रही है, इसे पहचानने की व्यवस्था होनी चाहिए।

कम अंक छात्र का जीवन और भविष्य तय नहीं करते
वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. संजीव त्यागी के अनुसार बच्चे को यह भरोसा मिलना जरूरी है कि किसी एक विषय में कमजोरी या कम अंक उसके पूरे जीवन और भविष्य को तय नहीं करते। समय पर बातचीत, परिवार का सहयोग और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद बच्चे को गंभीर मानसिक दबाव से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बच्चों से सिर्फ यह पूछना काफी नहीं कि कितने नंबर आए। कभी यह भी पूछना होगा कि आज स्कूल में कैसा लगा, किस बात से डर लगा और क्या कोई ऐसी बात है, जो वह किसी से कह नहीं पा रहा।

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